New Drug Rules: कफ सिरप की ओवर-द-काउंटर बिक्री पर रोक, अब बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलेगी दवा
भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश के फार्मास्युटिकल और हेल्थकेयर सेक्टर को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने आम तौर पर सर्दी-खांसी होने पर मेडिकल स्टोर से सीधे खरीद ली जाने वाली कफ सिरप की ओवर-द-काउंटर बिक्री को हमेशा के लिए बंद करने का मन बना लिया है।
इसके लिए औषधि और प्रसाधन सामग्री नियमावली में एक बड़ा संशोधन करते हुए एक कड़ा मसौदा प्रस्ताव तैयार किया गया है। नए नियमों के पूरी तरह लागू हो जाने के बाद देश के किसी भी हिस्से में बिना पंजीकृत डॉक्टर की वैध पर्ची के कफ सिरप की बिक्री करना पूरी तरह से गैर-कानूनी माना जाएगा।
कफ सिरप को शेड्यूल-एच के तहत लाने के लिए राजपत्र अधिसूचना का मसौदा जारी
दवाओं के विनियमन और नियंत्रण को कड़ा करने के उद्देश्य से सरकार ने इस नए संशोधन का मसौदा जारी कर दिया है। इस नए प्रशासनिक बदलाव के तहत सभी प्रकार के कफ सिरप, विशेष रूप से वे जिनमें नशीले या कड़े साल्ट्स मौजूद होते हैं, उन्हें नियमों के 'शड्यूल-एच' (Schedule H) के दायरे में ला दिया जाएगा।
वर्तमान नियमों के मुताबिक शेड्यूल-एच में शामिल किसी भी दवा को कोई भी फार्मासिस्ट या केमिस्ट अपनी मर्जी से किसी मरीज को सीधे नहीं बेच सकता है। इस मसौदे पर आम जनता, डॉक्टरों और दवा निर्माताओं से अगले कुछ दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं, जिसके बाद इसे पूरे देश में अंतिम रूप से लागू कर दिया जाएगा।
कोडीन के बढ़ते नशे और युवाओं में दुरुपयोग को रोकना मुख्य उद्देश्य
स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया द्वारा यह कड़ा कदम उठाने के पीछे सबसे बड़ी वजह कफ सिरप का बढ़ता सामाजिक दुरुपयोग है। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों, विशेष रूप से सीमावर्ती और युवा बहुल इलाकों से यह गंभीर शिकायतें मिल रही थीं कि कई कफ सिरप का उपयोग लोग खांसी के इलाज के बजाय एक नशे के विकल्प के रूप में बड़े पैमाने पर कर रहे थे।
युवा और छात्र बिना किसी चिकित्सीय परामर्श के मेडिकल स्टोर्स से थोक में ये सिरप खरीदकर नशे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, जो स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका था। इसी नशे के सिंडिकेट को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने प्रिस्क्रिप्शन को अनिवार्य करने की चोट की है।
मेडिकल स्टोर्स के लिए कड़ा प्रोटोकॉल और उल्लंघन पर लाइसेंस होगा रद्द
नए नियमों के धरातल पर उतरने के बाद देश के सभी रिटेल और होलसेल दवा काउंटरों के लिए एक कड़ा प्रोटोकॉल निर्धारित किया गया है। अब केमिस्ट को कफ सिरप बेचने के साथ ही डॉक्टर द्वारा दिए गए प्रिस्क्रिप्शन की मूल कॉपी को देखना होगा और अपने पास उस बिक्री का पूरा लिखित या डिजिटल रिकॉर्ड दर्ज करना होगा।
इसके अलावा, केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) और राज्य की ड्रग इंस्पेक्टर्स टीमों को नियमित औचक निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। अगर किसी भी मेडिकल स्टोर पर बिना पर्ची के कफ सिरप बेचते हुए कोई संचालक पकड़ा जाता है, तो उसे नियमों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए दुकान का लाइसेंस तुरंत प्रभाव से निरस्त करने और विधिक कार्रवाई करने का प्रावधान किया गया है।
स्क्रीन-फ्री बचपन, फायदे-नुकसान का अध्ययन बाकी:मोबाइल से दूरी के लिए स्मार्ट खिलौने; पैरेंट्स की चिंता घटी पर मशीनों से बढ़ा लगाव
आज के माता-पिता एक अजीब दुविधा में फंसे हैं। एक तरफ बच्चों का स्क्रीन-टाइम बढ़ने का डर, दूसरी ओर काम और व्यस्त जीवन। इसी खाली जगह में एंट्री कर रहे हैं नए जमाने के एआई आधारित, ‘स्क्रीन-फ्री’ खिलौने। दावा है कि बच्चों के दोस्त भी हैं, शिक्षक भी और स्क्रीन की लत से बचाने का सुरक्षित रास्ता भी। लेकिन क्या तकनीक से लैस ये खिलौने सच में स्क्रीन-फ्री हैं या सिर्फ माता-पिता के अपराधबोध को कम करने का नया तरीका भर हैं? अमेरिका और यूरोप में तेजी से ऐसे खिलौने आ रहे हैं, जो दिखने में सॉफ्ट टॉय हैं, लेकिन अंदर एआई है। ये खिलौने बच्चों से बात करते हैं। सवालों के जवाब देते हैं। कहानियां सुनाते हैं और यहां तक कि होमवर्क में भी मदद करते हैं। कंपनियों का दावा है कि इनमें कोई स्क्रीन नहीं है। ना मोबाइल, टैबलेट, ना टीवी। बाजार में एक ऐसा स्मार्ट खिलौना आ गया है, जो 27 भाषाओं में बात करता है। इसकी कीमत करीब 28 हजार रु. है। माता-पिता के लिए इसमें एक एप भी है, जिससे वे बच्चे और खिलौने में हुई बातचीत भी देख सकते हैं। माता-पिता को क्यों पसंद हैं ये खिलौने बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ‘आज के माता-पिता खुद स्क्रीन के दौर में पले हैं और अब बच्चों को उससे बचाना चाहते हैं। लेकिन पूरी तरह समय देना हर किसी के लिए संभव नहीं। ऐसे में यह खिलौने ‘सुरक्षित साथी’ का भ्रम देते हैं। माता-पिता का अपराध बोध कम होता है।’ टेक विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन न होना और टेक्नोलॉजी न होना, दो अलग बातें हैं। इन खिलौनों में वही कंप्यूटिंग पावर है, जो स्मार्ट डिवाइस में होती है। बस इंटरफेस बदला है। ऐसे खिलौने स्क्रीन-फ्री जरूर हैं, लेकिन डिजिटल इंटरएक्शन से मुक्त नहीं हैं। यानी स्क्रीन न दिखे, पर एल्गोरिद्म, डेटा और एआई मौजूद हैं। खतरा - दिमाग मशीन की नकल करने लगता है डिजिटल पैरेंटिंग पर काम करने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे बच्चों की कल्पनाशीलता और इंसानी बातचीत पर असर पड़ सकता है। इसका फायदा यह है कि बच्चे लंबे समय तक मोबाइल नहीं पकड़ते। खतरा है कि भावनात्मक जुड़ाव मशीन से बनने लगता है। बच्चों का मानसिक स्तर इंसानी होने के बजाय मशीन की नकल करने लगता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स कह चुका है कि बच्चों के लिए तकनीक का उपयोग कम, उद्देश्यपूर्ण और माता-पिता की मौजूदगी में होना चाहिए। बच्चे से मानवीय बातचीत, खेल और इंसानी संबंधों का होना जरूरीं है।
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