नंबर के जरिए बोलती है लिवर की सेहत, जानें क्या है एएलटी टेस्ट, क्यों है जरूरी
नई दिल्ली, 8 जून (आईएएनएस)। लिवर शरीर का बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो कई जरूरी कार्य एक साथ करता है। इसे शरीर की केमिकल फैक्ट्री भी कहा जाता है, क्योंकि यह लगातार शरीर को स्वस्थ रखने में काम करता रहता है। ऐसे में लिवर की सेहत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय लिवर स्वास्थ्य को लेकर लोगों को जागरूक करते हुए एएलटी टेस्ट के बारे में जानकारी देता है।
लिवर न केवल भोजन को पचाने बल्कि शरीर से विषाक्त पदार्थ निकालने और कई जरूरी प्रोटीन बनाने का काम करता है, इसलिए लीवर को स्वस्थ रखना पूरे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है। स्वास्थ्य मंत्रालय का साफ संदेश है कि “चेतावनी वाले संकेतों का इंतजार न करें। अपना एएलटी के साथ अपनी सेहत जानें। मंत्रालय ने लोगों से अपील की है कि वे नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं, खासकर वे लोग जो मोटापे से ग्रस्त हैं, डायबिटीज के मरीज हैं या ज्यादा शराब पीते हैं।
मंत्रालय के अनुसार, लिवर एक खास नंबर एएलटी के जरिए अपनी स्थिति बताता है। लक्षण दिखने से बहुत पहले ही यह नंबर लिवर की समस्या का संकेत दे सकता है।
एएलटी का पूरा नाम एलेनाइन एमिनो ट्रांस्फरेज है। इसे एसजीपीटी भी कहा जाता है। यह लिवर में पाया जाने वाला एक एंजाइम है। जब लिवर में कोई समस्या होती है, जैसे फैट जमा होना, सूजन या कोई दबाव पड़ना, तो यह एंजाइम खून में बढ़ जाता है। सामान्य एएलटी लेवल आमतौर पर 7 से 56 यू/एल तक होता है। अगर यह स्तर बढ़ जाए तो यह लिवर स्ट्रेस या फैटी लीवर की शुरुआती चेतावनी हो सकती है।
हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार, आजकल की व्यस्त और अनियमित लाइफस्टाइल की वजह से लिवर संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। मोटापा, ज्यादा शराब का सेवन, अनहेल्दी खान-पान और कम व्यायाम लिवर पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि लिवर की कई समस्याएं शुरुआत में कोई साफ लक्षण नहीं दिखातीं। जब लक्षण दिखते हैं, तब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है।
हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि एक साधारण ब्लड टेस्ट से एएलटी लेवल आसानी से पता चल जाता है। यह टेस्ट सस्ता, आसान और हर जगह उपलब्ध है। समय पर एएलटी लेवल जानकर व्यक्ति अपनी डाइट, व्यायाम और लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव कर सकता है। इससे गंभीर बीमारियों जैसे फैटी लीवर, हेपेटाइटिस या सिरोसिस से पहले ही बचाव संभव हो जाता है।
--आईएएनएस
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Explainer: भारत के परमाणु हथियारों की संख्या में हुआ इजाफा, जाने क्यों इनका रखरखाव होता है बहुत खर्चीला?
Explainer: भारत के पास कितने परमाणु हथियार हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो देश का हर एक व्यक्ति जानने में इच्छुक है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत में परमाणु हथियारों की संख्या बढ़कर अब 190 हो चुकी है. वहीं, पिछले साल भारत के पास करीब 180 परमाणु हथियार थे. रिपोर्ट के अनुसार, भारत लगातार अपने परमाणु कार्यक्रमों को आधुनिक बना रहा है. नई तकनीकों के जरिए रणनीतिक क्षमता को मजबूत कर रहा है.
SIPRI Yearbook 2026 के अनुसार, दुनिया परमाणु प्रतिस्पर्धा के नए दौर में प्रवेश कर रही है. अमेरिका, रूस, चीन, भारत और पाकिस्तान सहित सभी परमाणु संपन्न देश अपने हथियारों और डिलीवरी सिस्टम को तेजी से अपग्रेड कर रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का परमाणु आधुनिकीकरण मुख्य रूप से चीन को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. चीन अपने परमाणु भंडार का लगातार विस्तार कर रहा है. चीन के पास अब करीब 620 परमाणु हथियार हैं. वहीं, पाकिस्तान भी अपने परमाणु कार्यक्रम को मजबूत कर रहा है. SIPRI का कहना है कि भारत एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर संतुलित रणनीतिक क्षमता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.
MIRV और लंबी दूरी की मिसाइलों पर फोकस
रिपोर्ट के अनुसार, नई पीढ़ी की परमाणु तकनीकों पर भारत अब तेजी से काम कर रहा है. इनमें सबसे जरूरी है- MIRV तकनीक. इसके बावजूद एक ही बैलिस्टिक मिसाइल कई परमाणु वारहेड लेकर जा सकती है. अलग-अलग लक्ष्यों को इससे निशाना बनाया जा सकता है. इसके अलावा, भारत कैनिस्टाइज्ड मिसाइल सिस्टम भी डेवलप कर रहा है, जिससे मिसाइलों को तेजी से लॉन्च किया जा सकता है. उनकी सुरक्षा में भी इससे इजाफा होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मिसाइली बेड़े में पृथ्वी-2, अग्नि-1, अग्नि-2, अग्नि-3, अग्नि-4, अग्नि-5 जैसी मिसाइलें शामिल हैं. नई अग्नि-पी मिसाइल को अधिक सटीक मानते हुए आधुनिक माना जा रहा है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की समुद्री परमाणु क्षमता को बेहद अहम माना जा रहा है. भारत की परमाणु पनडुब्बियां खासकर आईएनएस अरिहंत अब देश की सेकंड स्ट्राइक क्षमता का बड़ा आधार बन रहीं हैं. भारत अब शांति काल में भी सीमित संख्या में परमाणु हथियारों को बैलिस्टिक मिसाइल, पनडुब्बियों पर तैनात करने लगा है. दुश्मन के पहले हमले के बावजूद जवाबी कार्रवाई की क्षमता बनी रहती है.
पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के पास लगभग 170 परमाणु हथियार हैं. पाकिस्तान छोटे और सामरिक परमाणु हथियारों पर अधिक ध्यान दे रही है. भारत लंबी दूरी और सुरक्षित जवाबी हमले करने की क्षमता भी विकसित कर रहा है. दुनिया में बढ़ रहा परमाणु खतरा
दुनिया भर में 12,187 परमाणु हथियार मौजूद
SIPRI ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों का खतरा फिर बढ़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 तक दुनिया में कुल 12,187 परमाणु हथियार मौजूद थे. इनमें से हजारों हथियार तत्काल इस्तेमाल की स्थिति में हैं. SIPRI के निदेशक करीम हग्गाग का कहना है कि देशों की बढ़ती परमाणु निर्भरता भविष्य में बड़े संकट और गलत आंकलन का कारण बन सकती हैं.
दुनिया भर में परमाणु हखियार की बढ़ती संख्या के फायदे भी हैं और नुकसान भी. फायदा ये है कि अधिक परमाणु हथियार होने से सुरक्षा और निवारक क्षमता बढ़ती है, जो बड़े युद्धों को रोकता है. वहीं, इसका सबसे बड़ा नुकसान- आक्समिक परमाणु युद्ध, मानवता का विनाश और विनाशकारी रेडियोधर्मी विकिरण है. आइये विस्तार से समझते हैं परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ने के फायदे और नुकसान…
परमाणु हथियारों के बढ़ने के फायदे
- परमाणु बम के डर की वजह से परमाणु देशों पर हमला करने से उसके दुश्मन डरते हैं.
- इतिहास गवाह है कि परमाणु क्षमता वाले देशों में सीधा और पारंपरिक तरीके से युद्ध नहीं होता है.
- खास बात है कि छोटे और कमजोर देश भी अपने देश की सुरक्षा और संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं.
- इन हथियारों के दम पर इंटरनेशनल कूटनीति में देश का रुतबा बढ़ता जा रहा है.
परमाणु हथियारों के बढ़ने के नुकसान
- खास बात है कि परमाणु बम का एक ही धमाका पूरे शहर को मिटा सकता है.
- रेडिएशन से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं. प्रभावित इलाके की कई पीढ़ियां एक ही धमाका बर्बाद कर सकती है.
- परमाणु हथियारों का निर्माण और रखरखाव बहुत ज्यादा खर्चीला होता है.
- टेक्निकल खराबी या फिर गलतफहमी की वजह से भयानक तबाही हो सकती थी.
- नए-नए देश भी इसे बनाने के लिए खुद को प्रेरित होते हैं. इससे तनाव बढ़ जाता है.
क्यों महंगा है परमाणु हथियारों का रखरखाव
परमाणु हथियारों का रखरखाव बहुत ज्यादा खर्चीला होता है. इनमें अत्यधिक संवेदनशील रेडियोधर्मी सामग्री होती है. इसमें खास उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है, जिस वजह से इसकी सुरक्षा के कड़े नियम लागू होते हैं. आइये जानते हैं उन वजहों को जिस वजह से परमाणु हथियारों का रखरखाव बहुत महंगा है.
- परमाणु हथियारों में मौजूद रेडियोधर्मी सामाग्री प्राकृतिक रूप से खत्म होने लगती है. नियमित रूप इसे बदलना पड़ता है, जो बहुत महंगी प्रक्रिया है.
- इन हथियारों की कार्यप्रणाली को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए भारी-भरकम अनुसंधान केंद्रों और हजारों वैज्ञानिकों की आवश्यकता पड़ती है.
- इन हथियारों की वर्किंग को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए भारी-भरकम अनुसंधान केंद्रं और हजारों वैज्ञानिकों की आवश्यकता होती है.
- दुर्घटना या फिर चोरी रोकने के लिए हथियारों के पुर्जों को अलग-अलग और आधुनिक सुरक्षा डिपो में रखा जाता है. इस स्टोरेज इंफ्रा का खर्चा बहुत ज्यादा होता है.
- मिसाइल, पनडुब्बी और लड़ाकू विमान, जो भी इन हथियारों को लेकर जाते हैं, उनका नियमित रूप से हाईटेक रखरखाव करते हैं.
- पुराने हो रहे हथियारों को समय के साथ अपग्रेड करने और नई तकनीक से लैस करने पर हर साल अरबों डॉलर रुपये खर्च होते हैं.
ईरान-अमेरिका में परमाणु कार्यक्रम की वजह से तनाव
अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के परमाणु स्थलों और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को निशाना बनाकर किए गए हमलों के बाद से ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है. इसका मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियारों को हासिल करने से रोकना है. दोनों देशों के बीच ईरान के मिसाइल कार्यक्रमों की वजह से तनाव व्याप्त है. दोनों पक्षों के बीच परमाणु वार्ता भी चल रही है, जिससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोका जा सके.
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