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क्या होती है ‘पॉलिमर करेंसी’? भारत में कब तक आ सकती है, कितने देशों में चल रही है और क्या हैं इसके फायदे?

Explainer: दुनिया तेजी से तकनीक और डिजिटल इकोनॉमी की ओर बढ़ रही है, लेकिन नकदी यानी करेंसी का महत्व अब भी कम नहीं हुआ है. भारत जैसे बड़े देश में आज भी करोड़ों लोग रोजमर्रा के लेनदेन के लिए नोटों पर निर्भर हैं. इसी बीच 'पॉलिमर करेंसी' या प्लास्टिक नोटों को लेकर चर्चा तेज हो गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समय-समय पर पॉलिमर नोटों को लेकर विचार करता रहा है और अब एक बार फिर इनके इस्तेमाल की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है.

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पॉलिमर करेंसी क्या होती है? यह सामान्य नोटों से कितनी अलग है? दुनिया के कितने देश इसका इस्तेमाल कर रहे हैं और भारत में इसके आने की संभावना कब तक है? आइए इन सभी सवालों को विस्तार से समझते हैं.

क्या होती है पॉलिमर करेंसी?

पॉलिमर करेंसी ऐसे नोट होते हैं जो सामान्य कागज की बजाय एक विशेष प्रकार के प्लास्टिक पदार्थ 'बाय-एक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन' (BOPP) से बनाए जाते हैं. इन्हें आम भाषा में 'प्लास्टिक नोट' कहा जाता है. हालांकि ये नोट सामान्य प्लास्टिक की तरह कठोर नहीं होते, बल्कि काफी लचीले होते हैं और सामान्य करेंसी नोटों की तरह ही मोड़े जा सकते हैं. इन नोटों में विशेष सुरक्षा फीचर लगाए जाते हैं, जिससे इन्हें नकली बनाना बेहद मुश्किल हो जाता है.

भारत में अभी जो नोट इस्तेमाल होते हैं, वे खास कॉटन-बेस्ड पेपर से तैयार किए जाते हैं. लेकिन पॉलिमर नोट इनकी तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ माने जाते हैं.

पॉलिमर करेंसी की शुरुआत कब हुई?

दुनिया में सबसे पहले पॉलिमर नोट ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में जारी किए थे. यह कदम नकली नोटों पर रोक लगाने और लंबे समय तक चलने वाले नोट तैयार करने के उद्देश्य से उठाया गया था. ऑस्ट्रेलिया में इन नोटों को काफी सफलता मिली. इसके बाद धीरे-धीरे कई देशों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया। आज दुनिया के 60 से अधिक देशों में पॉलिमर नोट किसी न किसी रूप में चलन में हैं.

किन-किन देशों में चल रही है पॉलिमर करेंसी?

आज कई विकसित और विकासशील देशों ने पॉलिमर करेंसी को अपनाया है. इनमें प्रमुख देश हैं...

1. ऑस्ट्रेलिया
2. कनाडा
3. यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन)
4. न्यूजीलैंड
5. सिंगापुर
6. वियतनाम
7. रोमानिया
8. मलेशिया
9. थाईलैंड
10. नाइजीरिया
11. यूएई
12. मेक्सिको

कुछ देशों ने पूरी तरह पॉलिमर नोट अपना लिए हैं, जबकि कुछ देश अभी कागज और पॉलिमर दोनों प्रकार की करेंसी का इस्तेमाल कर रहे हैं.

भारत में कब तक आ सकती है पॉलिमर करेंसी?

भारत में पॉलिमर नोटों को लेकर चर्चा कोई नई नहीं है। RBI और वित्त मंत्रालय पहले भी इस दिशा में विचार कर चुके हैं. करीब एक दशक पहले भी छोटे मूल्य के नोटों को पॉलिमर में बदलने की योजना बनाई गई थी. उस समय ₹10 के नोटों के लिए कुछ शहरों में ट्रायल की बात सामने आई थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.

अब फिर से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि RBI छोटे मूल्य वाले नोटों जैसे ₹10 और ₹20 के लिए पॉलिमर तकनीक पर विचार कर सकता है. हालांकि अभी तक इसकी कोई आधिकारिक लॉन्च डेट घोषित नहीं हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में बढ़ती करेंसी प्रिंटिंग लागत, जल्दी खराब होते नोट और नकली नोटों की समस्या को देखते हुए आने वाले कुछ वर्षों में पॉलिमर नोटों की शुरुआत हो सकती है.

पॉलिमर करेंसी के बड़े फायदे

1. ज्यादा टिकाऊ होते हैं: पॉलिमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में तीन से पांच गुना ज्यादा समय तक चलते हैं.
भारत जैसे देश में जहां नोट बार-बार हाथ बदलते हैं, वहां जल्दी फटने और खराब होने की समस्या आम है. पॉलिमर नोट इस परेशानी को काफी हद तक कम कर सकते हैं.

2. पानी और गंदगी से सुरक्षित: कागजी नोट पानी लगने पर खराब हो जाते हैं, लेकिन पॉलिमर नोट पानी से जल्दी खराब नहीं होते. इन पर गंदगी और नमी का असर भी कम पड़ता है। यही वजह है कि इन्हें अधिक स्वच्छ माना जाता है.

3. नकली नोट बनाना मुश्किल: पॉलिमर नोटों में पारदर्शी विंडो, माइक्रोटेक्स्ट, होलोग्राम और विशेष सुरक्षा फीचर लगाए जा सकते हैं. इन तकनीकों के कारण नकली नोट छापना बेहद कठिन हो जाता है. यह आतंकवाद और फेक करेंसी नेटवर्क पर भी रोक लगाने में मददगार हो सकता है.

4. लंबे समय में कम खर्च: हालांकि पॉलिमर नोट बनाना शुरुआती दौर में महंगा पड़ सकता है, लेकिन ये लंबे समय तक चलते हैं. इस वजह से बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम होती है और लंबे समय में सरकार की लागत घट सकती है.

5. पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर: कई विशेषज्ञ मानते हैं कि पॉलिमर नोटों को रिसाइकिल किया जा सकता है. पुराने नोटों से प्लास्टिक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. इससे कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है.

क्या हैं इसके नुकसान?

जहां पॉलिमर करेंसी के कई फायदे हैं, वहीं कुछ चुनौतियां भी हैं. 

1. शुरुआती लागत ज्यादा: इन नोटों की प्रिंटिंग तकनीक महंगी होती है. इसके लिए विशेष मशीनें और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ती है.

2. ATM और मशीनों में बदलाव: अगर भारत पॉलिमर नोट अपनाता है, तो ATM और नोट गिनने वाली मशीनों को नए सिस्टम के हिसाब से अपडेट करना होगा. यह एक बड़ा तकनीकी और आर्थिक बदलाव हो सकता है.

3. गर्मी वाले देशों में चुनौती: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी वाले इलाकों में पॉलिमर नोट चिपक सकते हैं या मुड़ सकते हैं. भारत जैसे देश में यह एक चुनौती हो सकती है.

भारत के लिए क्यों जरूरी हो सकती है पॉलिमर करेंसी?

भारत दुनिया की सबसे बड़ी नकदी आधारित अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. यहां हर साल करोड़ों नोट खराब हो जाते हैं और RBI को नए नोट छापने पर भारी खर्च करना पड़ता है. इसके अलावा नकली नोटों की समस्या भी लंबे समय से चिंता का विषय रही है. ऐसे में पॉलिमर नोट देश के लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं.

अगर भारत धीरे-धीरे छोटे मूल्य के नोटों से इसकी शुरुआत करता है, तो भविष्य में पूरी करेंसी व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

क्या डिजिटल पेमेंट के दौर में भी जरूरी हैं नोट?

आज UPI और डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन नकदी की जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है. ग्रामीण इलाकों, छोटे व्यापारियों और कई वर्गों के लिए कैश अब भी जरूरी है. यही कारण है कि सरकार और RBI करेंसी सिस्टम को ज्यादा सुरक्षित, टिकाऊ और आधुनिक बनाने पर जोर दे रहे हैं. पॉलिमर करेंसी इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

पॉलिमर करेंसी सिर्फ 'प्लास्टिक नोट' नहीं, बल्कि आधुनिक और सुरक्षित करेंसी सिस्टम की पहचान मानी जा रही है. दुनिया के कई देश इसे अपनाकर फायदा उठा चुके हैं. भारत में भी इसकी संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं. अगर आने वाले वर्षों में RBI इसे लागू करता है, तो देश की करेंसी व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. इससे नकली नोटों पर रोक, प्रिंटिंग लागत में कमी और ज्यादा टिकाऊ नोटों का फायदा मिल सकता है.

हालांकि इसके लिए तकनीकी तैयारी और बड़े निवेश की जरूरत होगी, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य की करेंसी व्यवस्था में पॉलिमर नोट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

यह भी पढ़ें - आरबीआई द्वारा रेपो रेट स्थिर रखने से दीर्घकालिक विकास की संभावनाएं बनी रहेंगी: विशेषज्ञ

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2026 में अब तक टेक सेक्टर में गईं 1 लाख से ज्यादा नौकरियां, सिर्फ मई में करीब 29,000 कर्मचारियों की हुई छंटनी: रिपोर्ट

नई दिल्ली, 6 जून (आईएएनएस)। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के पहले पांच महीनों में प्रौद्योगिकी (टेक) सेक्टर में 1 लाख से अधिक नौकरियां खत्म हो चुकी हैं। इनमें से केवल मई महीने में ही करीब 28,900 कर्मचारियों की छंटनी की गई है।

लेऑफ डॉट एफवाईआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इस वर्ष अब तक कुल 1,16,739 टेक कर्मचारियों की नौकरी जा चुकी है। रिपोर्ट में बताया गया कि मई 2025 में केवल 10,577 नौकरियों में कटौती की घोषणा हुई थी, जबकि इस साल मई में यह संख्या बढ़कर 28,889 हो गई, जो पिछले साल की तुलना में दोगुने से भी अधिक है।

हालांकि, इस साल अब तक छंटनी के लिहाज से मार्च सबसे खराब महीना रहा। मार्च में 46,000 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया।

रिपोर्ट के अनुसार, उबर, मेटा, क्लाउडफ्लेयर, इंट्यूट, पेपाल, सिस्को, क्वोरा और कॉइनबेस जैसी बड़ी कंपनियों ने बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी की।

उबर ने खुलासा किया कि उसकी पीपल एंड प्लेसेस डिवीजन में 23 प्रतिशत कर्मचारियों की कटौती की गई। हालांकि, यह कंपनी के लगभग 34,000 कर्मचारियों वाले वैश्विक कार्यबल का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा है।

उबर की पीपल एंड प्लेसेस डिवीजन मानव संसाधन, भर्ती, कार्यस्थल सुविधाओं और कंपनी संस्कृति से जुड़े कार्यों का प्रबंधन करती है।

इसके अलावा, मेटा ने घोषणा की कि वह अपने वैश्विक कर्मचारियों की संख्या में 10 प्रतिशत कटौती कर रही है। साथ ही करीब 7,000 कर्मचारियों को एआई-आधारित भूमिकाओं में स्थानांतरित किया जा रहा है।

वहीं, कई रिपोर्टों के अनुसार, पेपाल ने मई में अगले दो से तीन वर्षों के दौरान अपने लगभग 20 प्रतिशत कर्मचारियों यानी करीब 4,760 पदों को समाप्त करने की योजना की घोषणा की। कंपनी का उद्देश्य लागत कम करना और एआई को तेजी से अपनाना है।

अमेरिका की प्रौद्योगिकी कंपनी सिस्को ने मई की शुरुआत में अपने वैश्विक कार्यबल के लगभग 5 प्रतिशत यानी 4,000 कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा की। कंपनी यह निवेश एआई, साइबर सुरक्षा और अन्य उभरते क्षेत्रों में करना चाहती है।

वहीं, अमेरिका की सॉफ्टवेयर कंपनी क्लिकअप ने भी परिचालन पुनर्गठन के तहत मई में अपने कर्मचारियों की संख्या में 22 प्रतिशत की कटौती की। कंपनी का लक्ष्य एआई-आधारित भूमिकाओं के जरिए उत्पादकता को 100 गुना तक बढ़ाना है।

तकनीकी उद्योग के कई विशेषज्ञों का मानना है कि कंप्यूटर-आधारित अधिकांश श्वेतपोश (व्हाइट-कॉलर) नौकरियां अगले 12 से 18 महीनों में स्वचालित हो सकती हैं।

हालांकि, एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि जनरेटिव एआई भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि काम करने के तरीके को बदल रहा है। इससे उत्पादकता बढ़ रही है और ऐसे कर्मचारियों की मांग बढ़ रही है जिनके पास तकनीकी और व्यावसायिक दोनों तरह के कौशल मौजूद हैं।

--आईएएनएस

डीबीपी

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