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Rajya Sabha Elections: कांग्रेस ने भी राज्यसभा चुनाव के लिए जारी की प्रत्याशियों की लिस्ट, पवन खेड़ा को भी मिला मौका

Rajya Sabha Elections: राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनावों को लेकर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. पार्टी ने पांच राज्यों की सात सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किया है. इस सूची में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा और वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं. उम्मीदवारों के चयन को आगामी राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

कर्नाटक से खड़गे और पवन खेड़ा को टिकट

कांग्रेस ने कर्नाटक से तीन उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को एक बार फिर राज्यसभा भेजने का फैसला किया गया है. उनके साथ राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा और वरिष्ठ नेता मंसूर अली खान को भी उम्मीदवार बनाया गया है.

कर्नाटक में कांग्रेस की मजबूत स्थिति को देखते हुए इन उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है. खड़गे का राज्यसभा जाना पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को और मजबूती देगा, जबकि पवन खेड़ा को संसदीय राजनीति में बड़ी भूमिका मिलने की संभावना है.

मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन पर भरोसा

मध्य प्रदेश से कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया है. लंबे समय से संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली नटराजन को पार्टी नेतृत्व का करीबी माना जाता है. उनके चयन को मध्य प्रदेश में कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.

राजस्थान में नीरज डांगी को मिला अवसर

राजस्थान से कांग्रेस ने मौजूदा राज्यसभा सांसद नीरज डांगी पर एक बार फिर भरोसा जताया है. पार्टी का मानना है कि डांगी ने संसद में प्रभावी भूमिका निभाई है और राज्य के मुद्दों को मजबूती से उठाया है. इसी वजह से उन्हें दोबारा उम्मीदवार बनाया गया है.

तमिलनाडु और झारखंड में नए चेहरे

तमिलनाडु से कांग्रेस ने प्रवीण चक्रवर्ती को उम्मीदवार घोषित किया है. प्रवीण चक्रवर्ती को आर्थिक और नीतिगत मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है और वे लंबे समय से पार्टी की रणनीतिक टीम से जुड़े रहे हैं.

वहीं झारखंड से प्रणव झा को उम्मीदवार बनाया गया है. उनका चयन राज्य में संगठन को मजबूत करने और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

संगठनात्मक संतुलन साधने की कोशिश

कांग्रेस की इस सूची में अनुभवी नेताओं के साथ-साथ नए और सक्रिय चेहरों को भी जगह दी गई है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी ने क्षेत्रीय संतुलन, संगठनात्मक अनुभव और संसदीय क्षमता को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया है.

राज्यसभा चुनाव के जरिए कांग्रेस संसद के उच्च सदन में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए भी रणनीतिक तैयारी करती नजर आ रही है.

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UNCOVERED with Manoj Gairola: इजरायल के लिए ‘गली की हड्डी’ बना हिजबुल्ला, इस आतंकी संगठन को क्यों हर हाल में मिटाना चाहते हैं नेतन्याहू?

UNCOVERED with Manoj Gairola: जब से इजरायल बना है, उसने कई जंग लड़ीं और जीतीं. लेकिन एक युद्ध ऐसा था, जिसमें उसे हार का सामना करना पड़ा. और उसे हराने वाला था हिजबुल्ला. हिजबुल्ला एक पावरफुल शिया मिलिशिया है और लेबनान के काफी बड़े हिस्से में इसकी हुकूमत चलती है. 

अब यही हिजबुल्ला अमेरिका और ईरान की डील में बहुत बड़ी बाधा बन गया है. इजरायल किसी भी सूरत में हिजबुल्ला को मिटाना चाहता है. वहीं ईरान अपने प्रॉक्सी हिजबुल्ला को बचाए बिना, कोई भी डील करना नहीं चाहता. इस सिचुएशन ने डोनाल्ड ट्रंप को फंसा दिया है. वो किसी भी सूरत में ईरान से शांति समझौता चाहते हैं. लेकिन इजरायल, लेबनान पर हमले रोकने को तैयार नहीं है. 

हिजबुल्ला की वजह से ट्रंप ने नेतन्याहू को डांटा

अब मजबूर होकर ट्रंप को दखल देना पड़ा है. उन्होंने हिजबुल्ला से बात करके हमले रोकने का आश्वासन दिया. ट्रंप का फ्रस्ट्रेशन इतना ज्यादा था कि उन्होंने नेतन्याहू को डांट दिया. आपको बता दें कि अमेरिका ने हिजबुल्ला को आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है. युद्ध के बीच में अमेरिकी राष्ट्रपति का ऐसे संगठन पर हमले रोकने का आश्वासन देना, अपने आप में हैरान करने वाला है. 

आखिर हिजबुल्ला में ऐसा क्या है, जिसे नेतन्याहू हर हाल में मिटा देना चाहते हैं? इस युद्ध में अब तक इजरायल ने लेबनान के 3,500 से ज्यादा लोगों को मार दिया है. लाखों लोग बेघर हो चुके हैं. इजरायल की सीमा चार देशों से मिलती है- इजिप्ट, जॉर्डन, सीरिया और लेबनान. 1948 में इजरायल बना. उसके बाद 3 अरब-इजरायल युद्ध हुए. ये युद्ध इजिप्ट, जॉर्डन और सीरिया ने मिलकर लड़े थे. बाद में जॉर्डन और इजिप्ट के साथ इजरायल का समझौता हो गया. साथ ही सीरिया भी कमजोर हो गया. 

इसका मतलब ये है कि अब इजरायल को सिर्फ लेबनान से खतरा था. वो भी वहां कि सरकार से नहीं बल्कि हिजबुल्ला से. लेबनान एक ऐसा मुल्क है, जिसकी अपनी सेना होने के बावजूद वहां हिजबुल्ला की अलग सेना है. लेबनान की सीमा जहां इजरायल से मिलती है, वो दक्षिणी इलाका पूरा हिजबुल्ला के कंट्रोल में है.

हिजबुल्ला का जन्म कैसे हुआ और क्यों ये इजरायल का दुश्मन बना?

लेबनान मिडिल ईस्ट का इकलौता देश है जहां कभी ईसाई बहुमत में थे. फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद लेबनान फ्रांस के कंट्रोल में आ गया. 1932 में यहां census हुई, जिसमें 51.2% ईसाई थे. मुसलमान और द्रुज मिलकर 48.8% थे. मुसलमानों में भी शिया 19.6%, सुन्नी 22.4% और द्रुज 6.8% थे. 1943 में जब लेबनान फ्रांस से आजाद हुआ, तब जनसंख्या के आधार पर पावर शेयरिंग का फॉर्मूला बनाया गया — राष्ट्रपति ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुसलमान और संसद का स्पीकर शिया मुसलमान.

ये सिस्टम कई सालों तक चला. लेकिन 1970 के दशक में फिलिस्तीनी शरर्णार्थियों के आने के बाद लेबनान की डेमोग्राफी बदलने लगी. ईसाई अल्पसंख्यक होते गए. सामाजिक तनाव बढ़ता गया. हर धर्म का अपने मिलिशिया गुट बन गए. लेबनान में सिविल वॉर शुरू हो गई और इसी वक्त लेबनान में एंट्री हुई इजरायल की. 

दरअसल, फिलिस्तीनियों के मिलिशिया ने लेबनान से इजरायल पर हमले करने शुरू कर दिए. इजरायली फौज लेबनान में घुसी और राजधानी बेरूत तक कब्जा कर लिया. इसी दौरान अमेरिका, इटली और फ्रांस की शांति सेना भी लेबनान पहुंच चुकी थी. लेबनान के मुस्लिम मिलिशिया शांति सेना के खिलाफ थे. 

23 अक्टूबर 1983 को अमेरिकी फौजी कैंप पर आत्मघाती हमला हुआ. इसमें 243 अमेरिकी सैनिक मारे गए. उसी दिन फ्रांसीसी कैंप पर भी हमला हुआ. इसमें 58 फ्रांसीसी सैनिक मारे गए. इसके बाद, फरवरी 1984 में राष्ट्रपति रीगन ने लेबनान से अपनी सेना वापस बुला ली. इसका सारा श्रेय गया उस संगठन को, जो बाद में हिजबुल्ला बना. इसे ईरान ने बनाया था. इसका मकसद था लेबनान से इजरायल को भगाना. हिजबुल्ला को ट्रेनिंग, हथियार और पैसा- सब ईरान ने दिया. 

1989 में सऊदी अरब के शहर ताइफ में शांति समझौता हुआ. और लेबनान की सिविल वॉर खत्म हो गई. अब नए पावर स्ट्रक्चर में ईसाई राष्ट्रपति की ताकत कम हो गई थी. मुसलमानों की पावर बढ़ गई थी. सभी मिलिशियाओं ने हथियार डाल दिए. सिवाय हिजबुल्ला के. क्योंकि उसकी जंग तो इजरायल के साथ थी.

इजरायल को लेबनान से पीछे हटना पड़ा

हिजबुल्ला और इजरायल के बीच संघर्ष चलता रहा. आखिरकाइजरायल को लेबनान से पीछे हटना पड़ा. र 22 साल बाद, यानी साल 2000 में इजरायल को लेबनान से पीछे हटना पड़ा. इजरायल के लिए ये शर्मनाक हार थी. जिसे वो आज तक नहीं भूला. और मिडिल ईस्ट में पहली बार इजरायल को हराने का क्रेडिट हिजबुल्ला को मिला. 2006 में फिर 34 दिनों का युद्ध हुआ. इसमें भी हिजबुल्ला की पॉजिशन स्ट्रॉन्ग रही. 2023 में जब इजरायल की हमास के साथ जंग शुरू हुई, तो हिजबुल्ला ने भी इजरायल पर अटैक कर दिया. इजरायल ने भी जवाबी हमला किया. इसमें हिजबुल्ला चीफ हसन नसरुल्ला मारे गए.

लेबनान के नक्शे को देखें तो साउथ लेबनान, साउथ बेरूत और बेक्का घाटी — ये शिया बहुल इलाके हैं और यही हिजबुल्ला का गढ़ हैं. इजरायल के निशाने पर भी यही इलाके हैं. आज हिजबुल्ला पहले के मुकाबले कमजोर पड़ गया है. इसका कारण है ईरान से हथियारों की सप्लाई कम हो गई है. ये सप्लाई पहले सीरिया के रास्ते ईरान से आती थी. लेकिन दिसंबर 2024 में सीरिया में तख्तापलट हो गया. ईरान समर्थक असद की जगह अमेरिका सपोर्टेड अहमद शरा सत्ता में आ गए.

इजरायल को लगता है कि यही वो वक्त है, जब हिजबुल्ला को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है. यही वजह है कि वो ना अमेरिका की सुन रहा है. और ना उसे ईरान के साथ होने वाली डील की परवाह है.

 

 

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