यूपी की कुष्ठ पेंशन योजना, जरूरतमंदों के लिए बनी सहारा
उत्तर प्रदेश सरकार की कुष्ठ पेंशन योजना समाज के सबसे कमजोर वर्गों को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से चलाई जा रही है. इस योजना के तहत कुष्ठ रोग से प्रभावित और उससे दिव्यांग हुए लोगों को नियमित आर्थिक मदद दी जाती है, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें और दूसरों पर निर्भर न रहें.
हर महीने मिलती है 3000 रुपये की सहायता
इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पात्र लाभार्थियों को हर महीने 3000 रुपये की पेंशन दी जाती है. यह राशि सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर होती है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है और किसी तरह की देरी या भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम होती है.
कौन उठा सकता है योजना का लाभ
इस योजना का लाभ लेने के लिए कुछ जरूरी शर्तें तय की गई हैं.
- आवेदक उत्तर प्रदेश का स्थायी निवासी होना चाहिए
- कुष्ठ रोग से प्रभावित और उससे दिव्यांग होना जरूरी है
- आय सीमा के भीतर होना चाहिए (कम आय वर्ग को प्राथमिकता)
- किसी अन्य पेंशन योजना का लाभ नहीं ले रहा हो
उम्र की कोई बाध्यता नहीं
इस योजना की खास बात यह है कि इसमें उम्र की कोई सीमा नहीं रखी गई है. यानी किसी भी आयु वर्ग का व्यक्ति, यदि वह कुष्ठ रोग से प्रभावित है और पात्रता पूरी करता है, तो पेंशन के लिए आवेदन कर सकता है.
आसान ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया
सरकार ने आवेदन प्रक्रिया को भी सरल बनाया है. इच्छुक व्यक्ति ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं. आवेदन के लिए आधार कार्ड, आय प्रमाण पत्र, बैंक खाता और मेडिकल प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज जरूरी होते हैं.
हजारों लोगों को मिल रहा लाभ
राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में हजारों कुष्ठ रोगी इस योजना से लाभान्वित हो चुके हैं. अकेले 2025-26 में ही बड़ी संख्या में लाभार्थियों को समय पर पेंशन दी गई, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार आया है.
सम्मान और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
कुष्ठ पेंशन योजना सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान की भी पहल है. यह योजना उन लोगों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास है, जो बीमारी के कारण अक्सर समाज से अलग-थलग पड़ जाते हैं. नियमित पेंशन और आसान प्रक्रिया के जरिए सरकार उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अहम कदम उठा रही है.
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पाकिस्तान: एचआईवी सेंटर्स में इलाज करा रहे करीब 20 हजार मरीज लापता, संसदीय समिति ने कमियों की ओर दिलाया ध्यान
इस्लामाबाद, 5 मई (आईएएनएस)। पाकिस्तान बीते कुछ महीनों से गंभीर स्वास्थ्य समस्या की वजह से चर्चा में है। पिछले नौ महीनों में अस्पतालों की लापरवाही का खामियाजा बच्चों तक को भोगना पड़ा है। कई बच्चे एचआईवी संक्रमित पाए गए। ये मुद्दा पाकिस्तान की संसद में भी उठा। वहीं स्वास्थ्य महकमे ने मंगलवार को संसदीय समिति के सामने और भयावह तस्वीर पेश की है। इसके मुताबिक इलाज करा रहे करीब 20 हजार एचआईवी संक्रमित गायब हैं।
पाकिस्तान नेशनल असेंबली की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति को बताया गया कि एचआईवी/एड्स के इलाज के लिए एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) केंद्रों में पंजीकृत लगभग 20,000 मरीज अब “लापता” हैं। इस खुलासे ने फॉलो-अप, काउंसलिंग और मरीजों को इलाज से जुड़े रखने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रमुख दैनिक डॉन के अनुसार, समिति की अध्यक्षता कर रहे डॉ. महेश कुमार मलानी ने देश में एचआईवी/एड्स के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय से विस्तृत ब्रीफिंग मांगी। मंत्रालय ने बंद कमरे (इन-कैमरा) में ब्रीफिंग देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन समिति के सदस्यों ने पारदर्शिता की जरूरत बताते हुए इसे खारिज कर दिया।
आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में एचआईवी संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। पिछले 15 वर्षों में नए मामलों में करीब 200 फीसदी की वृद्धि हुई है—2010 में जो तादाद 16,000 थी, वो बढ़कर 2024 में 48,000 तक पहुंच गई। एक अनुमान के मुताबिक संक्रमितों की कुल संख्या 369,000 है, वहीं पंजीकृत मामले 84 हजार हैं। 2025 में 14,000 नए मामले सामने आए। इन्हीं में से लगभग 20,000 मरीज, जिन्होंने इलाज शुरू कराया था, अब लापता हैं।
हालांकि स्वास्थ्य मंत्री मुस्तफा कमाल ने बताया कि देश की एचआईवी/एड्स कार्यक्रमों को सहारा ग्लोबल फंडिंग से ही मिलता है।
वहीं समिति ने उन वजहों की ओर ध्यान दिलाया जिनसे इसका प्रसार और हो रहा है। बताया कि प्रतिबंध के बावजूद बाजार में असुरक्षित सिरिंज मिलते हैं, ब्लड बैंक और ट्रांसफ्यूजन सिस्टम पर पैनी नजर नहीं रखी जा रही है। जागरूकता अभियानों की कमी, सामाजिक बहिष्कार का खौफ और इलाज शुरू करने के बाद मरीजों का सिस्टम से बाहर हो जाना चिंतनीय है।
हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार दर 0.2 है (वैश्विक औसत 0.5 से कम), लेकिन ताऊंसा, कोट मोमिन और दक्षिण पंजाब जैसे क्षेत्रों में संक्रमण बढ़ा है, जो नियंत्रण में खामियों को दिखाता है।
कराची के तीन अस्पतालों में पिछले नौ महीनों में बच्चों में एचआईवी मामलों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों ने इसे “खतरनाक” बताते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की मांग की है।
उन्होंने सुरक्षित चिकित्सा प्रथाओं, सिंगल-यूज सिरिंज के सख्त पालन और एक राष्ट्रीय डेटा डैशबोर्ड बनाने की भी सिफारिश की, जिसमें एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, सी और अन्य संक्रामक रोगों की विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध हो। यह मामला सिर्फ स्वास्थ्य प्रणाली की कमी नहीं, बल्कि जागरूकता, निगरानी और सामाजिक रवैये की भी चुनौती को उजागर करता है। 20,000 “लापता” मरीज इस बात का संकेत हैं कि इलाज शुरू करना ही पर्याप्त नहीं—उसे जारी रखना और मरीजों को प्रणाली से जोड़े रखना भी उतना ही जरूरी है।
--आईएएनएस
केआर/
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