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Health Alert: गर्मी में सिर्फ सादा पानी पीना क्यों है खतरनाक? जानें कैसे Delhi का युवक पहुंचा ICU

उत्तर भारत में सूरज का सितम जारी है और लोग गर्मी से बचने के लिए खूब पानी पी रहे हैं। लेकिन दिल्ली से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सबको हैरान कर दिया है। एक 25 वर्षीय युवक दिन भर में 5 लीटर पानी पीने के बावजूद गंभीर हालत में अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हो गया। डॉक्टरों ने बताया कि यह स्थिति जरूरत से ज्यादा सादा पानी पीने की वजह से पैदा हुई है।

केवल सादा पानी पीना क्यों है खतरनाक?

अक्सर हम सोचते हैं कि गर्मी में जितना ज्यादा पानी पिएंगे, उतने सुरक्षित रहेंगे। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि जब हमें बहुत पसीना आता है, तो शरीर से केवल पानी ही नहीं, बल्कि सोडियम और पोटेशियम जैसे जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स भी बाहर निकल जाते हैं। ऐसी स्थिति में अगर सिर्फ सादा पानी पिया जाए, तो खून में सोडियम की मात्रा बहुत कम हो जाती है। मेडिकल भाषा में इसे 'हाइपोनेट्रेमिया' कहते हैं। इसकी वजह से दिमाग में सूजन आ सकती है, जो जानलेवा भी हो सकती है।
 

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शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन क्यों है जरूरी?

गर्मी से बचने के लिए सिर्फ पानी पर निर्भर न रहें। पानी के साथ शरीर को इलेक्ट्रोलाइट्स देना भी जरूरी है। बचाव के लिए सादे पानी के बजाय ओआरएस, नमक-चीनी का घोल, नींबू पानी, नारियल पानी या छाछ का सेवन करें। ये चीजें शरीर में नमक और पानी का सही संतुलन बनाए रखती हैं।
 

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इन जरूरी बातों का रखें खास ख्याल

खाली पेट न रहें: तेज धूप में निकलने से पहले कुछ जरूर खाएं। फल और पौष्टिक भोजन लेते रहने से शरीर में जरूरी लवणों की कमी नहीं होती।

लक्षणों को पहचानें: अगर आपको अचानक सिरदर्द, चक्कर आना, जी मिचलाना, बहुत ज्यादा सुस्ती या बोलने में परेशानी महसूस हो, तो इसे हल्के में न लें। यह गंभीर इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के संकेत हो सकते हैं।

धूप से बचाव: कोशिश करें कि दोपहर की तेज धूप में बाहर न निकलें। यदि बाहर हैं, तो हर आधे घंटे में कुछ न कुछ तरल पदार्थ जरूर लेते रहें।

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SAD Disorder: लोगों से मिलने में कांपते हैं हाथ-पैर? कहीं आप इस Mental Health Disorder के शिकार तो नहीं

शरीर को सेहतमंद बनाए रखने के लिए फिजिकल और मेंटल दोनों तरह की सेहत पर ध्यान देना जरूरी होता है। हम सभी अक्सर फिजिकल सेहत पर ध्यान देते हैं। लेकिन मेंटल हेल्थ को अनदेखा कर देते हैं। मेडिकल रिपोर्ट्स की मानें, तो सोशल मीडिया पर लोगों से अपनी तुलना, काम के बढ़ते दबाव, असुरक्षा की भावना और अकेलेपन के कारण स्ट्रेस और एंग्जाइटी की समस्या सभी उम्र के लोगों में बढ़ती हुई देखी जा रही है।

अकेलापन गंभीर बीमारियों को बढ़ाने वाला हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनियाभर में करोड़ों लोग एंग्जाइटी डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं। वहीं कई मामलों में चिंता और डर इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि रोजमर्रा की जिंदगी जैसे पढ़ाई, रिश्तों और नौकरी आदि पर इसका असर होने लगता है। ऐसी ही एक समस्या सैड यानी सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर है, जिसका खतरा युवाओं में तेजी से देखने को मिल रहा है।

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सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर के बारे में जानिए

यह एक ऐसी समस्या है, जिसकी अक्सर लोगों में पहचान नहीं हो पाती है। इस समस्या से पीड़ित लोगों को नई जगह जाने, लोगों से मिलने में डर लगना या फिर अंजाने लोगों से बात करने में डर लगता है। हालांकि इसको लोग अक्सर शर्मिलापन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कुछ लोगों में यह समस्या इतनी बढ़ जाती है कि इसका असर दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगता है।

विशेषज्ञ सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य स्थिति मानते हैं, जिसकी पहचान और इलाज करना जरूरी है।

इस डिसऑर्डर की वजह रोगी को लगने लगता है कि लोग उनको जज करेंगे या फिर उनका मजाक उड़ाएंगे।

अगर 6 महीने तक यह डर बना रहे और दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो इसको डिसऑर्डर माना जाता है।
 

डिसऑर्डर की पहचान

आपको ऐसी स्थितियों से डर लगना, जहां आपका निगेटिव रूप से मूल्यांकन हो सकता है।
अजनबियों से बात करने में डर महसूस होना।
शर्मिंदा या अपमानित महसूस करने की चिंता होना।
यह डर महसूस होना कि दूसरे लोग यह महसूस कर लेंगे कि आप घबराए हुए दिख रहे हैं।
दूसरों से बातचीत करने में पसीना आना, चेहरा लाल होना, कांपना या फिर आवाज का लड़खड़ाना।
उन स्थितियों से बचना, जहां आप पर सबकी नजरें हो सकती हैं।

क्यों होती है ये दिक्कत

अगर आपके घर में माता-पिता या भाई-बहन को यह समस्या है। तो आपको भी सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर होने का रिस्क बढ़ जाता है।
जिन बच्चों को तंग किया जाता है, चिढ़ाया जाता है और सामाजिक रूप से नकारा जाता है, उनमें भी इसका रिस्क ज्यादा होता है।

ये डिसऑर्डर होने पर क्या करें

बता दें कि सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर किसी को भी हो सकता है। डॉक्टर जिन लोगों में इस समस्या की पहचान करते हैं, उनको मनोवैज्ञानिक परामर्श या फिर टॉक थेरेपी की सलाह दी जाती है। वहीं कुछ दवाओं के इस्तेमाल से दिमाग के कैमिकल इंबैलेंस और लक्षणों को ठीक करने में भी सहायता मिल सकती है।

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