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पाकिस्तान: मानवाधिकार वकीलों की अपील सुनवाई में देरी पर अधिकार संगठन चिंतित

इस्लामाबाद, 2 मई (आईएएनएस)। पाकिस्तान के मानवाधिकार परिषद (एचआरसी-पाकिस्तान) ने शनिवार को सरकार और संबंधित न्यायिक अधिकारियों से मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मजारी-हाज़िर और हादी अली चट्ठा के कानूनी अधिकारों की तत्काल रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। परिषद ने चेतावनी दी कि उनकी अपीलों की सुनवाई में लंबी देरी निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और कानून के शासन को कमजोर कर सकती है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब ईमान और उनके पति हादी ने गुरुवार को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी सजा के खिलाफ अपीलों की जल्द सुनवाई की मांग की है। यह मामला सोशल मीडिया पोस्ट्स से जुड़े प्रकरण में प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पीईसीए) के तहत दर्ज हुआ था।

अधिकार संगठन ने दोनों वकीलों को न्याय मिलने में हो रही असाधारण देरी पर चिंता जताई। परिषद ने कहा कि दोनों ने पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए मजबूती से आवाज उठाई है।

एचआरसी-पाकिस्तान ने कहा, “यह खेदजनक है कि सजा सुनाए जाने के 100 दिन से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक सुनवाई के लिए कोई पीठ गठित नहीं की गई है और न ही उनकी अपीलों पर कोई प्रगति हुई है। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 10-ए के तहत प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार देना राज्य की मूल जिम्मेदारी है।”

संगठन ने कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ ऐसा व्यवहार न केवल कानून के शासन पर सवाल उठाता है, बल्कि मानवाधिकारों के लिए काम करने वालों का मनोबल तोड़ने जैसा है।

न्याय में देरी को न्याय से वंचित करने के समान बताते हुए परिषद ने पाकिस्तान की उच्च न्यायपालिका से मामले का तत्काल संज्ञान लेने, नियमित पीठ गठित करने और न्याय की सभी शर्तें पूरी करते हुए कानूनी राहत देने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन में ईमान और हादी ने 17 फरवरी को इस्लामाबाद हाईकोर्ट (आईएचसी) के आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति मांगी है। फरवरी में आईएचसी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील स्वीकार कर ली थी और सजा निलंबन याचिका पर नोटिस जारी किया था, लेकिन सजा पर रोक नहीं लगाई थी।

नई याचिका में दोनों वकीलों ने अपीलों की सुनवाई 4 मई से शुरू होने वाले सप्ताह में तय करने का अनुरोध किया है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि अपील स्वीकार की जाए और आईएचसी में लंबित आपराधिक अपील के अंतिम निस्तारण तक विवादित फैसले के तहत दी गई सजा पर रोक लगाई जाए।

जनवरी में इस्लामाबाद की एक सत्र अदालत ने सोशल मीडिया पोस्ट्स से जुड़े मामले में ईमान और उनके पति हादी को कुल 17 वर्ष की सजा सुनाई थी। साथ ही दोनों पर 3.6 करोड़ पाकिस्तानी रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।

दोनों मानवाधिकार वकीलों की गिरफ्तारी और सजा की दुनिया भर में व्यापक आलोचना हुई है।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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बांग्लादेश बार एसोसिएशन चुनाव: अवामी लीग से जुड़े वकीलों के नामांकन रद्द होने पर वैश्विक आलोचना

ब्रसेल्स, 2 मई (आईएएनएस)। बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने 13-14 मई को होने वाले चुनाव के लिए 90 में से 42 वकीलों के नामांकन पत्र यह कहते हुए खारिज कर दिए कि उनका अवामी लीग से संबंध है। इस फैसले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी जताई गई है और दुनिया भर से आलोचना हो रही है।

इसके अलावा, हाल के समय में कई जिलों में बार एसोसिएशन चुनावों में सिर्फ राजनीतिक सोच के आधार पर अवामी लीग समर्थक वकीलों के साथ भेदभाव और उनकी उम्मीदवारी रद्द करने के आरोप भी लगे हैं। इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

30 अप्रैल को यूरोप की काउंसिल ऑफ बार्स एंड लॉ सोसाइटीज (सीसीबीई) के अध्यक्ष रोमन जावरसेक ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को एक पत्र लिखकर इन घटनाओं पर चिंता जताई।

सीसीबीई यूरोप के 46 देशों की बार और लॉ सोसाइटीज का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके जरिए दस लाख से ज्यादा वकील जुड़े हुए हैं।

पेरिस स्थित मानवाधिकार संगठन जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस (जेएमबीएफ) से मिली जानकारी का हवाला देते हुए जावरसेक ने कहा कि फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच कई जगहों पर अवामी लीग समर्थक और स्वतंत्र उम्मीदवार वकीलों को चुनाव में हिस्सा लेने से रोका गया। कुछ को नामांकन पत्र जमा करने से रोका गया और कुछ मामलों में उनके साथ मारपीट तक की गई।

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में नामांकन पत्र यह कहकर खारिज कर दिए गए कि वे फासीवाद के सहयोगी हैं। इसके अलावा, पुलिस पर भी आरोप है कि उसने कुछ उम्मीदवारों पर दबाव डाला कि वे चुनाव से हट जाएं या उन्हें पिछली सरकार का सहयोगी बताकर चुनाव में हिस्सा लेने से रोका गया।

सीसीबीई ने संयुक्त राष्ट्र के वकीलों की भूमिका से जुड़े बुनियादी सिद्धांतों का भी ज‍िक्र किया, जिनमें वकीलों की सुरक्षा, स्वतंत्रता और उनके कामकाज की आजादी की बात कही गई है।

साथ ही, यूरोप काउंसिल के नए कन्वेंशन का भी ज‍िक्र किया गया, जो वकीलों के पेशे की सुरक्षा से जुड़ा है और बांग्लादेश से इसे अपनाने और जल्दी लागू करने की अपील की गई।

सीसीबीई ने बांग्लादेश सरकार से कहा है कि बार एसोसिएशन के चुनाव ऐसे तरीके से कराए जाएं, जिसमें सभी वकीलों को बिना किसी भेदभाव के बराबरी से हिस्सा लेने का मौका मिले।

उन्होंने यह भी मांग की कि जिन जगहों पर चुनाव में गड़बड़ी, रोक-टोक, धमकी या हिंसा की शिकायतें हैं, उनकी पूरी जांच होनी चाहिए।

अंत में सीसीबीई ने कहा कि सभी वकील बिना किसी डर, दबाव या परेशानी के अपना काम कर सकें, ताकि न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और कानून का राज बना रहे।

--आईएएनएस

एवाई/डीकेपी

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