बांग्लादेश बार एसोसिएशन चुनाव: अवामी लीग से जुड़े वकीलों के नामांकन रद्द होने पर वैश्विक आलोचना
ब्रसेल्स, 2 मई (आईएएनएस)। बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने 13-14 मई को होने वाले चुनाव के लिए 90 में से 42 वकीलों के नामांकन पत्र यह कहते हुए खारिज कर दिए कि उनका अवामी लीग से संबंध है। इस फैसले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी जताई गई है और दुनिया भर से आलोचना हो रही है।
इसके अलावा, हाल के समय में कई जिलों में बार एसोसिएशन चुनावों में सिर्फ राजनीतिक सोच के आधार पर अवामी लीग समर्थक वकीलों के साथ भेदभाव और उनकी उम्मीदवारी रद्द करने के आरोप भी लगे हैं। इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
30 अप्रैल को यूरोप की काउंसिल ऑफ बार्स एंड लॉ सोसाइटीज (सीसीबीई) के अध्यक्ष रोमन जावरसेक ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को एक पत्र लिखकर इन घटनाओं पर चिंता जताई।
सीसीबीई यूरोप के 46 देशों की बार और लॉ सोसाइटीज का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके जरिए दस लाख से ज्यादा वकील जुड़े हुए हैं।
पेरिस स्थित मानवाधिकार संगठन जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस (जेएमबीएफ) से मिली जानकारी का हवाला देते हुए जावरसेक ने कहा कि फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच कई जगहों पर अवामी लीग समर्थक और स्वतंत्र उम्मीदवार वकीलों को चुनाव में हिस्सा लेने से रोका गया। कुछ को नामांकन पत्र जमा करने से रोका गया और कुछ मामलों में उनके साथ मारपीट तक की गई।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में नामांकन पत्र यह कहकर खारिज कर दिए गए कि वे फासीवाद के सहयोगी हैं। इसके अलावा, पुलिस पर भी आरोप है कि उसने कुछ उम्मीदवारों पर दबाव डाला कि वे चुनाव से हट जाएं या उन्हें पिछली सरकार का सहयोगी बताकर चुनाव में हिस्सा लेने से रोका गया।
सीसीबीई ने संयुक्त राष्ट्र के वकीलों की भूमिका से जुड़े बुनियादी सिद्धांतों का भी जिक्र किया, जिनमें वकीलों की सुरक्षा, स्वतंत्रता और उनके कामकाज की आजादी की बात कही गई है।
साथ ही, यूरोप काउंसिल के नए कन्वेंशन का भी जिक्र किया गया, जो वकीलों के पेशे की सुरक्षा से जुड़ा है और बांग्लादेश से इसे अपनाने और जल्दी लागू करने की अपील की गई।
सीसीबीई ने बांग्लादेश सरकार से कहा है कि बार एसोसिएशन के चुनाव ऐसे तरीके से कराए जाएं, जिसमें सभी वकीलों को बिना किसी भेदभाव के बराबरी से हिस्सा लेने का मौका मिले।
उन्होंने यह भी मांग की कि जिन जगहों पर चुनाव में गड़बड़ी, रोक-टोक, धमकी या हिंसा की शिकायतें हैं, उनकी पूरी जांच होनी चाहिए।
अंत में सीसीबीई ने कहा कि सभी वकील बिना किसी डर, दबाव या परेशानी के अपना काम कर सकें, ताकि न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और कानून का राज बना रहे।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
तिब्बत में चीन के कथित अत्याचारों पर अमेरिका का सख्त रुख, नया बिल पेश
वॉशिंगटन, 2 मई (आईएएनएस)। अमेरिका के सीनेटर रिक स्कॉट और जेफ मर्कले ने हाल ही में तिब्बत एट्रोसिटीज डिटरमिनेशन एक्ट पेश किया है। इस कानून के तहत अमेरिकी विदेश मंत्री को यह तय करना होगा कि चीन की ओर से तिब्बत में की जा रही कार्रवाइयां जनसंहार या मानवता के खिलाफ अपराध हैं या नहीं।
आधिकारिक बयान के मुताबिक, यह बिल 29 अप्रैल को पेश किया गया, जो तिब्बती यूथ कांग्रेस की ओर से मनाए जाने वाले शहीद दिवस के साथ मेल खाता है। इस दिन उन लोगों को याद किया जाता है जिन्होंने तिब्बत की आजादी के लिए अपनी जान दी।
सीनेटर स्कॉट ने कहा, “कम्युनिस्ट चीन तिब्बत में जनसंहार कर रहा है। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है। बीजिंग की सरकार ने तिब्बती लोगों पर अत्याचार करते हुए हत्या, यातना, जबरन नसबंदी, जबरन विस्थापन, सरकार द्वारा अपहरण और कई तरह के मानवाधिकार उल्लंघन किए हैं। यह उसी तरह है जैसे वह उइगर मुसलमानों के खिलाफ भी कर रहा है, ईसाइयों को दबा रहा है और मेरे दोस्त जिमी लाई जैसे राजनीतिक कैदियों को जेल में डाल रहा है।”
उन्होंने कहा, “यह खून-खराबा रुकना चाहिए और चीन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। मुझे खुशी है कि मैं सीनेटर मर्कले के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रहा हूं।”
सीनेटर मर्कले ने भी तिब्बतियों पर हो रहे लगातार अत्याचारों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चीन तिब्बतियों की संस्कृति मिटाने, बच्चों को परिवार से अलग करने, निगरानी बढ़ाने, जेल में डालने और यातना देने जैसे काम कर रहा है। ऐसे में अमेरिका चुप नहीं रह सकता। चीन लगातार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत तिब्बती लोगों के अधिकारों को नजरअंदाज कर रहा है, और हमें साफ कहना होगा कि इन अपराधों को अनदेखा नहीं किया जाएगा।”
बयान में अमेरिका के विदेश विभाग और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स का भी जिक्र किया गया है। इन रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तिब्बत में जबरन गायब करना, बिना वजह हिरासत में रखना, यातना देना और खास तौर पर तिब्बतियों को निशाना बनाना जारी है। इसमें 1995 में गायब हुए उस बच्चे का मामला भी शामिल है, जिसे दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा के रूप में पहचाना था और जिसका आज तक कुछ पता नहीं चला।
इसके अलावा, कई रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि तिब्बत में बड़े पैमाने पर बोर्डिंग स्कूल चलाए जा रहे हैं, जहां बच्चों को उनके परिवारों से अलग रखा जाता है। इन स्कूलों में तिब्बती भाषा और संस्कृति को सीमित किया जाता है और बच्चों को राजनीतिक सोच के मुताबिक ढालने की कोशिश की जाती है, साथ ही उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।
बयान में कहा गया है कि इतने सारे सबूत सामने आने के बाद अब यह जरूरी हो गया है कि यह जांच की जाए कि चीन की नीतियां 1948 के जनसंहार कन्वेंशन के तहत जनसंहार की श्रेणी में आती हैं या फिर ये मानवता के खिलाफ अपराध हैं।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
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