Bade Miyan Kidhar Chale: चौरंगी में मुस्लिम वोटरों ने कर दिया खेल, बताया कौन जीतेगा बंगाल चुनाव!
Bade Miyan Kidha Chale: ‘बड़े मियां किधर चले’ की टीम आज आपको पश्चिम बंगाल की चौरंगी (Chowringhee) विधानसभा सीट की सैर करा रही है. कोलकाता का यह पौश लोकेशन है, जहां पर करीब 40 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. हमारे वरिष्ठ संवाददाता सैयद आमिर हुसैन ने चौरंगी विधानसभा क्षेत्र के लोगों से बातचीत की और उनके मुद्दों को जाना. यहां देखिए ग्राउंड रिपोर्ट…
चौरंगी सीट पर 29 अप्रैल को मतदान, ये हैं उम्मीदवार
पश्चिम बंगाल के कोलकाता की चौरंगी विधानसभा सीट पर 29 अप्रैल को वोटिंग होनी है. इस सीट पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि माना जा रहा है कि यहां का नतीजा दूसरे चरण के चुनाव पर भी असर डाल सकता है. इस बार तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने एक बार फिर नयना बंदोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया है. वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पूर्व कांग्रेस नेता संतोष पाठक को टिकट दिया है. जबकि कांग्रेस ने मानस सरकार को मैदान में उतारा है. हालांकि मुख्य मुकाबला TMC और BJP के बीच माना जा रहा है.
मतदाताओं का समीकरण
आपको बता दें कि इस सीट पर करीब 38 से 40 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिसके कारण यहां TMC का दबदबा रहा है. मुस्लिम समुदाय का झुकाव ज्यादातर TMC की ओर माना जाता है, जबकि BJP को इस वर्ग से कम समर्थन मिलता है.
चौरंगी सीट का इतिहास
चौरंगी सीट पर अब तक 18 चुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस ने यहां 10 बार जीत हासिल की है, जबकि 2001 से टीएमसी लगातार छह बार जीतती आ रही है. यह एक शहरी सीट है, जहां आमतौर पर वोटिंग कम रहती है.
इस बार क्या खास है?
इस चुनाव में SIR मुद्दा काफी बड़ा माना जा रहा है. इसके चलते उम्मीद की जा रही है कि इस बार वोटिंग प्रतिशत पहले से ज्यादा हो सकता है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प बन सकता है.
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पाकिस्तानी सैन्य बलों की ज्यादतियों का शिकार हो रहीं बलूच महिलाएं, ग्लोबल दखल की उठी मांग
क्वेटा, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तानी सैन्य बलों की ज्यादतियों के खिलाफ बलूच महिला फोरम (बीडब्ल्यूएफ) ने आवाज बुलंद की है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन को पत्र लिखकर सेना की करतूत पर लगाम लगाने का आग्रह किया है। बीडब्ल्यूएफ की केंद्रीय आयोजक शाली बलूच ने इसे जबरन गायब करने के सिस्टैमटिक पैटर्न का हिस्सा बताया, जिसके निशाने पर कथित तौर पर बलूच महिलाएं रहती हैं।
यह खत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (ओएचसीएचआर), यूएन वर्किंग ग्रुप ऑन एनफोर्स्ड डिसअपीयरेंस (जबरन या अनैच्छिक रूप से लापता होने पर बना कार्य समूह), यूएन कमिटी ऑन द एलिमिनेशन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वीमेन (सीईडीएडब्ल्यू) यानी महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन समिति, एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और फ्रंट लाइन डिफेंडर्स को भेजा गया था।
चिट्ठी में, शाली ने बलूचिस्तान में बढ़ती ह्यूमन राइट्स इमरजेंसी को सुलझाने की त्वरित जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, मैं आपका ध्यान बलूचिस्तान में बलूच महिलाओं को निशाना बनाकर जबरन गायब करने के सिस्टमैटिक पैटर्न की ओर दिलाती हूं, जो एक ऐसा डेमोग्राफिक है जो पाकिस्तानी सरकार के अत्याचारों से पैदा हुए संघर्ष की छाया में लंबे समय से पीड़ित है।
बीडब्ल्यूएफ ने पाकिस्तानी सेना द्वारा हाल ही में तीन युवा बलूच महिलाओं, खदीजा बलूच, हसीना नूर बख्श और गुल बनुक ताज को जबरन गायब करने का जिक्र करते हुए तुरंत दखल देने की मांग की। उन्होंने दावा किया कि उनका एकमात्र गुनाह शांतिप्रिय बलूच छात्रा या फिर घरेलू महिला के रूप में उनकी पहचान थी।
शाली ने कहा कि उनके परिवारों को न तो उनके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी मिली है और न ही उन पर कोई चार्ज लगाया गया है।
उन्होंने विस्तार से बताया, ये कथित तौर पर अलग-थलग मामले नहीं हैं। ये बलूच महिलाओं को चुप कराने वाली सरकार की स्ट्रैटेजी का हिस्सा हैं, जो उनकी पारिवारिक, सामाजिक और सामुदायिक भूमिका से खौफजदा है और उन्हें देश के लिए खतरा मानती है। अगवा की गई ये बलूच महिलाएं कानूनी तौर पर क्रिमिनल नहीं हैं, लेकिन हां, ये एक मां- छात्रा और घरबार संभालने वाली औरत जरूर हैं।
बलूच एक्टिविस्ट ने खदीजा, हसीना और गुल बानुक को जबरदस्ती गायब करने के खिलाफ बलूचिस्तान और कराची में एक फैक्ट-फाइंडिंग मिशन के जरिए तुरंत और स्वतंत्र जांच की मांग की।
उन्होंने पाकिस्तानी सरकार से इन लापता महिलाओं को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने या जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए किसी इंटरनेशनल पर्यवेक्षक के दखल की अपील की।
शाली ने कन्वेंशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ ऑल फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वीमेन (सीईडीएडब्ल्यू) ऑप्शनल प्रोटोकॉल के तहत बलूच महिलाओं के जबरदस्ती गायब होने पर एक विशेष प्रतिवेदक की नियुक्ति की भी अपील की।
उन्होंने आगे वैश्विक मानवाधिकार संगठनों से कहा कि वे प्रोविजनल ऑर्डर जारी करें, जिसमें पाकिस्तान को बलूच महिलाओं को निशाना बनाने वाले सभी खुफिया अभियान तब तक रोकने का निर्देश दिया जाए, जब तक कि एक पारदर्शी समीक्षा न हो जाए।
शाली ने जोर देकर कहा कि बीडब्ल्यूएफ ने इस मसले को बार-बार उठाया, लेकिन राष्ट्रीय संस्थानों ने हमें चुप रहने, धमकाने या मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के अलावा कुछ और नहीं किया।
पत्र के आखिर में लिखा गया, अब हम इंसाफ के लिए आखिरी मुकाम पर खड़े होकर, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का रुख कर रहे हैं। समय हमारे साथ नहीं है। हर गुजरता हुआ वक्त इन महिलाओं के जिंदा मिलने की संभावना को कम करता जा रहा है। उनके बच्चे इंतजार कर रहे हैं। उनकी मांएं रो रही हैं। दुनिया को अब इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
--आईएएनएस
केआर/
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