पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में तीन और नागरिकों को किया गायब: मानवाधिकार समूह
क्वेटा, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। एक बड़े मानवाधिकार संगठन ने शुक्रवार को कहा कि बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने महिलाओं समेत तीन और आम लोगों को जबरदस्ती गायब कर दिया है। बलूचिस्तान से लंबे समय से लोगों को जबरन गायब करने और न्यायेतर हत्या की घटनाएं सामने आ रही है। अंतरराष्ट्रीय संगठन ने इसे लेकर विश्व पटल पर चिंता भी जाहिर की है।
बलूच नेशनल मूवमेंट के मानवाधिकार विभाग पांक ने 22 अप्रैल की रात को खुजदार जिले के इस्तखली इलाके में समीना को उसके घर से जबरदस्ती गायब करने की कड़ी निंदा की।
रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए, मानवाधिकार विभाग ने कहा कि पाकिस्तान की फ्रंटियर कॉर्प्स (एफसी) और मिलिट्री इंटेलिजेंस के लोग घर में घुसे, परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की और उसे कस्टडी में लेकर किसी अनजान जगह पर ले गए।
पांक ने यह भी बताया कि पंजगुर जिले के शापतन इलाके के रहने वाले 20 साल के मैकेनिक अख्तर हुसैन को एफसी के लोग 19 अप्रैल को जबरदस्ती ले गए थे।
महिलाओं समेत आम लोगों को लगातार निशाना बनाए जाने पर गहरी चिंता जताते हुए, पांक ने आगे बताया कि 22 साल की गुल बानुक को 14 अप्रैल को देर रात एफसी और काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट (सीटीडी) के लोगों ने केच जिले के सिंगाबाद कार्की इलाके में उसके घर से जबरदस्ती उठा लिया।
उसके किडनैप होने के बाद से, उसका कोई पता नहीं है, जिससे उसे गंभीर नुकसान का खतरा है।
बानुक को जबरदस्ती गायब करने की निंदा करते हुए, बलूच वॉयस फॉर जस्टिस (बीवीजे) ने कहा, “बलूच महिलाओं को जबरदस्ती गायब करना तथाकथित सुरक्षा के नाम पर किया जा रहा है। ये काम पूरे समुदायों के खिलाफ सामूहिक सजा के बराबर हैं। महिलाएं, जो पहले से ही कमजोर हैं, उन्हें परिवारों को चुप कराने और असहमति को दबाने के लिए दबाव बनाने के टूल के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह तरीका बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है और कानून के राज को कमजोर करता है।”
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने एक और बलूच नागरिक, दाद शाह के किडनैप और जबरदस्ती गायब करने की कड़ी आलोचना की।
रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 साल के बलूची राइटर दाद शाह को 21 अप्रैल को दूसरी बार जबरदस्ती गायब कर दिया गया। वह बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की सदस्य फोजिया बलूच के भाई हैं।
फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने इस घटना को उनकी बहन फोजिया के मानवाधिकार के काम को दबाने की कोशिश बताया।
मानवाधिकार संस्था ने कहा, मानवाधिकार के रक्षक, खासकर बलूच जैसे धार्मिक या जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पिछले कुछ सालों में और बढ़ गई है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में अधिकारी अपने नागरिकों और मानवाधिकार रक्षकों के खिलाफ बहुत ज्यादा बेखौफ होकर काम करते हैं।”
फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने पाकिस्तानी अधिकारियों से अपील की है कि वे बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों के खिलाफ किसी भी तरह की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई तुरंत रोकें। साथ ही, उन्होंने यह सुनिश्चित करने को कहा कि पाकिस्तान में सभी मानवाधिकार रक्षक सुरक्षित माहौल में और सम्मान के साथ अपना काम कर सकें।
--आईएएनएस
केके/एएस
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
गिरता रुपया लंबी अवधि के निवेशकों के लिए खरीदारी का मौका: सीईए नागेश्वरन
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत की करेंसी फिलहाल दबाव में हो सकती है, लेकिन लंबी अवधि में इसकी स्थिति मजबूत बनी हुई है। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि रुपया मौलिक रूप से कम मूल्यांकित (अंडरवैल्यूड) है और निवेशकों के लिए एक अच्छा मौका है।
ब्लूमबर्ग से बातचीत में उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में रुपए का स्तर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अच्छा एंट्री पॉइंट है, खासकर उन लोगों के लिए जो भारत की ग्रोथ पर भरोसा रखते हैं।
उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब रुपया वैश्विक कारणों की वजह से लगातार दबाव में है।
शुक्रवार को भी रुपया लगातार पांचवें दिन गिरा और शुरुआती कारोबार में 24 पैसे कमजोर होकर 94.25 प्रति डॉलर तक पहुंच गया।
इस गिरावट की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है, जिसका कारण पश्चिम एशिया में तनाव है। इससे ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है और महंगाई की चिंता बढ़ी है।
रुपए पर दबाव बढ़ने की एक और वजह विदेशी निवेशकों का रुख है। भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी (एफपीआई आउटफ्लो) हो रही है, जो इस महीने ही पिछले साल के रिकॉर्ड 18.79 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुकी है।
2026 में अब तक रुपया एशिया की सबसे कमजोर करेंसी बन गया है, और इसकी गिरावट पिछले साल से जारी है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की तेल आयात पर ज्यादा निर्भरता के कारण, वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर रुपए पर ज्यादा पड़ता है।
इन चुनौतियों के बावजूद, नीति-निर्माता भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सावधानी के साथ सकारात्मक नजरिया बनाए हुए हैं।
हाल ही में आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की विकास दर 6.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक तनाव के कारण अपने अनुमान घटाए हैं।
इस महीने की शुरुआत में नागेश्वरन ने यह भी कहा था कि तेल की बढ़ती कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती हैं और हालात सामान्य होने में समय लग सकता है।
अमेरिका-भारत स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम के एक कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि मौजूदा संघर्ष का असर चार तरीकों से पड़ सकता है—ऊर्जा की ऊंची कीमतें, कच्चे माल की सप्लाई में बाधा, लॉजिस्टिक्स और बीमा लागत में बढ़ोतरी, और विदेश से आने वाले पैसे (रेमिटेंस) में कमी।
उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक स्थिति को देखते हुए धैर्य रखना जरूरी है, क्योंकि अर्थव्यवस्था को सामान्य होने में समय लग सकता है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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