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नासा का क्यूबसैट कैनवास : स्पेस में रेडियो तरंगों का अध्ययन शुरू, जानें क्या है यह मिशन

नई दिल्ली, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण सैटेलाइट को हाल ही में लॉन्च किया है, जो पृथ्वी से निकलने वाली प्राकृतिक और मानव-निर्मित रेडियो तरंगों का अध्ययन कर रहा है। यह मिशन वैज्ञानिकों को पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण को बेहतर समझने और अंतरिक्ष मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाने में मदद करेगा।

कैनवास (क्लाइमेटोलॉजी ऑफ एंथ्रोपोगेनिक एंड नेचुरल वीएएफ वेव एक्टिविटी इन स्पेस) नामक यह क्यूबसैट 7 अप्रैल 2026 को कैलिफोर्निया के वैंडेनबर्ग स्पेस फोर्स बेस से मिनोटौर IV रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था। यह अमेरिकी रक्षा विभाग के स्पेस टेस्ट प्रोग्राम एस29ए (एसटीपी-एस29ए) मिशन का हिस्सा रहा। वहीं, नासा की क्यूबसैट लॉन्च इनिशिएटिव (सीएलआई) के तहत इसकी लॉन्च व्यवस्था की गई थी।

कैनवास एक 4यू क्यूबसैट है, जिसे कोलोराडो यूनिवर्सिटी, बोल्डर ने विकसित किया है। इसका मुख्य काम पृथ्वी की निचली कक्षा से बहुत कम आवृत्ति वाली (वीएलएफ) रेडियो तरंगों को मापना है। ये तरंगें बिजली गिरने और जमीन पर स्थित ट्रांसमीटर्स से उत्पन्न होती हैं। यह मापता है कि ये तरंगें पृथ्वी के आयनमंडल (वायुमंडल का ऊपरी विद्युत आवेशित हिस्सा) से गुजरकर मैग्नेटोस्फीयर तक कितनी मात्रा में पहुंचती हैं। वीएलएफ तरंगें अंतरिक्ष में फंसे हाई एनर्जी वाले इलेक्ट्रॉन्स के रास्ते को थोड़ा बदल सकती हैं। इससे कभी-कभी ये इलेक्ट्रॉन विकिरण पट्टियों से निकलकर वायुमंडल में प्रवेश कर जाते हैं।

कैनवास इन तरंगों के प्रभाव को समझकर स्पेस वेदर के मॉडलों को मजबूत बनाएगा। इससे स्पेसक्राफ्ट, सैटेलाइट्स और पृथ्वी पर बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में सुधार होगा। मिशन के दौरान कैनवास दो मुख्य उपकरणों का उपयोग करेगा एक त्रि-अक्षीय सर्च कॉइल मैग्नेटोमीटर और एक द्वि-अक्षीय एसी विद्युत क्षेत्र सेंसर। इनकी मदद से यह वीएलएफ तरंगों की शक्ति और दिशा का पता लगाएगा। बिजली गिरने की घटनाओं की तुलना विश्वव्यापी बिजली नेटवर्क के डेटा से करके यह जलवायु संबंधी अध्ययन करेगा कि ये तरंगें आयनमंडल से कैसे गुजरती हैं।

बता देंं, नासा ने साल 2021 में सीएलआई के तहत कैनवास को चुना था। यह कम लागत वाला मिशन छात्रों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं को अंतरिक्ष हार्डवेयर डिजाइन करने, विकसित करने और बनाने का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करता है। नासा का लॉन्च सर्विसेज प्रोग्राम इस पहल को संचालित करने में अहम योगदान दे रहा है। कैनवास ईलाना 55 लॉन्च ग्रुपिंग का भी हिस्सा है।अगले एक वर्ष तक कैनवास निरंतर डाटा एकत्र करेगा। यह डाटा पृथ्वी से अंतरिक्ष में ऊर्जा के प्रवाह को समझने में महत्वपूर्ण साबित होगा।

--आईएएनएस

एमटी/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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Parshuram Jayanti 2026: झारखंड का वो चमत्कारी मंदिर, जहां सदियों से जमीन में गड़ा है परशुराम का फरसा, जानिए पौराणिक कथा

Parshuram Jayanti 2026: आज 19 अप्रैल 2026, रविवार को देशभर में परशुराम जयंती श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जा रही है. भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है. उनका वर्णन रामायण और कई पुराणों में मिलता है. मान्यता है कि उनका जन्म ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था. ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे महान योद्धा थे. उन्हें शस्त्र विद्या में महारत हासिल थी. उनका सबसे खास अस्त्र ‘परशु’ यानी फरसा था. इसी कारण उनका नाम परशुराम पड़ा.

टांगीनाथ धाम से मशहूर है ये जगह

झारखंड के गुमला जिले में स्थित टांगीनाथ धाम से ये जगह काफी मशहूर है. यहां से जुड़ी मान्यताएं इसे और भी रहस्यमयी बनाती हैं. कहा जाता है कि यहां आज भी भगवान परशुराम का फरसा जमीन में धंसा हुआ है. लोग इसे देखने और पूजा करने दूर-दूर से आते हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यही वह स्थान है जहां भगवान परशुराम ने कठोर तपस्या की थी. इस जगह की खास बात यह भी है कि यहां मौजूद फरसा देखने में भगवान शिव के त्रिशूल जैसा लगता है. इसी वजह से भक्त इसे शिव और परशुराम दोनों की शक्ति का प्रतीक मानते हैं.

रामायण से जुड़ी है पौराणिक कथा (Lord Parshuram Katha In Hindi) 

टांगीनाथ धाम का संबंध रामायण काल से भी जोड़ा जाता है. कथा के अनुसार, राजा जनक ने माता सीता के स्वयंवर का आयोजन किया था. इसमें एक शर्त रखी गई थी. जो शिवजी के धनुष को उठाकर तोड़ देगा, वही सीता से विवाह करेगा. भगवान श्रीराम ने यह कार्य पूरा किया और धनुष भंग कर दिया. जब यह बात भगवान परशुराम को पता चली तो वे क्रोधित हो गए. वे तुरंत स्वयंवर स्थल पर पहुंच गए. वहां उनकी लक्ष्मण से तीखी बहस भी हुई, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें अहसास हुआ कि श्रीराम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं. वे स्वंय भगवान विष्णु के अवतार हैं. यह जानकर उनका गुस्सा शांत हो गया. उन्होंने श्रीराम से क्षमा मांगी और वहां से चले गए. 

आज भी टांगीनाथ धाम में मौजूद है परशुराम का फरसा 

कहते हैं कि इसके बाद भगवान परशुराम एक शांत और घने जंगलों वाले क्षेत्र में चले गए. यह स्थान पहाड़ियों से घिरा हुआ था. वहीं उन्होंने भगवान शिव की स्थापना की और तपस्या शुरू की. तपस्या के दौरान उन्होंने अपना प्रिय अस्त्र, यानी फरसा, जमीन में गाड़ दिया. माना जाता है कि वही फरसा आज भी टांगीनाथ धाम में मौजूद है. यही वजह है कि यह स्थान भक्तों के लिए बेहद खास बन गया है।

108 शिवलिंग के साथ देवी-दवताओं की मूर्तियां

टांगीनाथ धाम सिर्फ आस्था ही नहीं, बल्कि इतिहास और कला के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां कई प्राचीन मूर्तियां बिखरी हुई दिखाई देती हैं. इस स्थान पर खुले आसमान के नीचे भोलेनाथ के 108 शिवलिंग के साथ-साथ मां दुर्गा, महिषासुर मर्दिनी, लक्ष्मी, गणेश, सूर्यदेव और हनुमान जी की सुंदर प्रतिमाएं मौजूद हैं. साथ ही अर्धनारीश्वर और विष्णु की मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं. यहां पत्थरों पर बनी वृषभ, सिंह और हाथी की आकृतियां भी खास आकर्षण का केंद्र हैं. इसके अलावा यहां पुराने समय के कई अवशेष भी पाए जाते हैं. जैसे पत्थर की नालियां, सिलबट्टा, प्राचीन ईंटें और पुराने ढांचे. इनसे पता चलता है कि यह स्थान कभी बहुत समृद्ध रहा होगा.

स्थापत्य कला भी है खास

टांगीनाथ धाम की मूर्तियों की बनावट काफी अनोखी है. कुछ मूर्तियां ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित मंदिरों की शैली से मिलती-जुलती बताई जाती हैं. यह समानता इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को और भी बढ़ा देती है.

यह भी पढ़ें: Parshuram Jayanti 2026: भगवान परशुराम की जयंती आज , नोट कर लें पूजन का शुभ मुहूर्त, विधि और मंत्र

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. न्यज नेशन इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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