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फांसी जैसी सजा से ही रुकेंगी पुलिस हिरासत में मौतें

देश के न्यायालयों ने एक बार फिर पुलिस का वीभत्स चेहरा उजागर कर दिया है। आम लोगों की सुरक्षा के गठित किया गया पुलिस तंत्र किस कदर तानाशाह बन गया है, अदालतों के फैसलों ने इसे बेनकाब किया है। मदुरै की एक अदालत ने सातानुकुलम पुलिस स्टेशन में बाप-बेटे की मौत के मामले में 9 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई है। इसके अलावा सभी दोषियों पर भारी ज़ुर्माना भी लगाया गया है। तूतीकोरिन ज़िले के सातानुकुलम के व्यापारी जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को 19 जून 2020 को कोरोना काल के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया और बुरी तरह पीटा। इसके बाद 21 जून को दोनों को कोविलपट्टी जेल में रखा गया। 22 जून की रात क़रीब 9 बजे बेनिक्स की मौत हो गई, जबकि अगली सुबह जयराज की भी मौत हो गई। इस मामले ने पूरे देश में बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने खुद संज्ञान लेते हुए पुलिस से रिपोर्ट मांगी। बाद में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। 

इसी तरह लुधियाना जिले में करीब छह साल पहले रिकवरी एजेंट दीपक शुक्ला की थाना डिविजन नंबर 5 की पुलिस हिरासत में हुई थी। मौत के मामले में लुधियाना की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या के तहत आरोप तय करने के आदेश जारी किए हैं। यह पूरा मामला फरवरी 2020 का है, जब पुलिस ने दीपक शुक्ला को वाहन चोरी के एक मामले में हिरासत में लिया था। दीपक पर चोरी का झूठा मामला दर्ज कर उसे अमानवीय यातनाएं दीं।  26 फरवरी 2020 की रात दीपक ने दम तोड़ दिया, जिसके बाद पुलिसिया तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। दीपक के परिवार ने इंसाफ के लिए एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ी।

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पंजाब के मोगा जिले में भिंदर सिंह की मौत गैरकानूनी हिरासत में रखकर यातनाएं देने से हुई थी। न्यायिक जांच में सामने आया कि भिंदर सिंह को कथित तौर पर गैरकानूनी हिरासत में रखकर यातनाएं दी गईं। इस मामले में स्थानीय अदालत ने पंजाब पुलिस के पांच कर्मियों के खिलाफ हत्या समेत अन्य गंभीर धाराओं में ट्रायल चलाने का आदेश देते हुए केस को सेशन कोर्ट में भेज दिया है। जुलाई 2024 को मध्यप्रदेश के बिलाखेड़ी निवासी युवक की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। पुलिस ने 8 लाख रुपये की कथित चोरी के आरोप में उसे हिरासत में लिया था। हिरासत में मौत के बाद उसकी मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसके परिणामस्वरूप 15 मई को सीबीआई जांच का आदेश जारी हुआ। इस जांच के सिलसिले में एजेंसी ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि हिरासत में हुई मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाने वाले दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अभी भी फरार हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर 2025 को एक मामले की सुनवाई करते हुए हिरासत में हिंसा और मौतों को सिस्टम पर धब्बा बताया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा था कि अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं। शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। 4 सितंबर को दिए गए अपने आदेश का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि राजस्थान में आठ महीनों में 11 हिरासत में हुई मौतों की रिपोर्ट सामने आई है।कोर्ट ने कहा कि इससे साफ़ है कि हिरासत में अत्याचार कम होने के बजाय जारी हैं। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र की ओर से थानों में सीसीटीवी को लेकर मांगी गई रिपोर्ट न सौंपने पर कड़ी नाराज़गी जताई थी। केंद्र सरकार ने एक भी रिपोर्ट जमा नहीं की। जस्टिस नाथ ने इस पर कड़ा एतराज़ जताते हुए कहा था कि केंद्र सरकार अदालत के आदेशों को हल्के में नहीं ले सकती। उन्होंने पूछा, "केंद्र सरकार अदालत को बहुत हल्के में ले रही है, क्यों?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 2016 और 2022 के बीच भारत में हिरासत में 11,650 मौतें हुईं। अकेले उत्तर प्रदेश में 2,630 हिरासत में मृत्युएँ दर्ज की गईं, जो देश में सबसे अधिक है। आंकड़ों के 2023 के विश्लेषण से पता चलता है कि 2017 और 2022 के बीच, हिरासत में हुई मृत्युओं के संबंध में देश भर में केवल 345 मजिस्ट्रियल जाँच के आदेश दिए गए, जिसके परिणामस्वरूप केवल 123 गिरफ्तारियाँ हुईं। एनएचआरसी के आंकड़ों से पता चलता है कि 1996 और 2018 के बीच हिरासत में हुई 71% मौतें गरीब या कमज़ोर पृष्ठभूमि के बंदियों की थीं।

सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1997 के फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित अनिवार्य सुरक्षा उपाय निर्धारित किए थे। जिसके तहत रिश्तेदारों को सूचित करना, गिरफ्तारी ज्ञापन रखना, चिकित्सा परीक्षण, कानूनी परामर्श, 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य था। इन दिशा—निर्देशों को अनुच्छेद 141 के अंतर्गत प्रवर्तनीय कानून माना जाता है। न्यायालय का यह आदेश कहीं धूल फांक रहा है। न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की अध्यक्षता में गठित भारतीय विधि आयोग ने 30 अक्टूबर, 2017 को तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को सौंपी गई अपनी 273 वीं रिपोर्ट में केंद्र सरकार से संयुक्त राष्ट्र संघ के यातना-विरोधी सम्मेलन की पुष्टि करने और यातना निवारण कानून लागू करने की सिफारिश की थी। 

आयोग ने यातना निवारण के लिए ठोस तर्क प्रस्तुत किए हैं। इस रिपोर्ट में यातना निवारण विधेयक के अलावा विधि आयोग ने यातना उन्मूलन के उद्देश्य को सार्थक बनाने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव दिया था। रिपोर्ट में यातना के खतरे को कम करने और यातना के कृत्यों पर रोक लगाने और ऐसे कृत्यों के अपराधियों के लिए कठोर दंड की सिफारिश की गई। इस रिपोर्ट के साथ संलग्न विधेयक के मसौदे में आजीवन कारावास और जुर्माने तक के दंड का प्रावधान था। आयोग ने न्यायसंगत मुआवजे का निर्णय न्यायालयों पर छोड़ दिया। इसके अलावा, आयोग ने यातना पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं और यातना के मामलों के गवाहों को संभावित खतरों, हिंसा और दुर्व्यवहार से बचाने के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करने की सिफारिश भी की गई थी। 

1997 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी सम्मेलन की पुष्टि नहीं की। इसकी पुष्टि करने का अर्थ यह होता कि भारत को यातना निवारण विधेयक पारित करना होगा, जिसे पहली बार 2010 में यूपीए द्वितीय सरकार द्वारा पेश किया गया था। इसमें किसी लोक सेवक द्वारा या लोक सेवक की सहमति से ऐसा कृत्य, जिससे गंभीर चोट पहुंचे या जीवन, अंग या स्वास्थ्य (मानसिक या शारीरिक) को खतरा हो। इसमें जबरन कबूलनामा करवाने के उद्देश्य से, या धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, समुदाय या किसी अन्य आधार पर दंडित करने के लिए दी गई यातना के लिए न्यूनतम 3 वर्ष की सजा का प्रस्ताव था, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। विधेयक आज तक कानून नहीं बन पाया। 

इससे साफ जाहिर है जो भी दल सत्ता में आता है, वह देश के मौजदा पुलिस सिस्टम में बदलाव नहीं करना चाहता। कारण साफ है यदि ऐसे कानून बन जाएंगे तो पुलिस अधिकारी नेताओं के इशारे पर नहीं नाचेंगे। जब नाचेंगे नहीं तो नेताओं के मौखिक तौर पर गैर कानूनी काम कैसे होंगे। यही वजह रही है कि केंद्र ने हाल ही में दंड संहिता को न्याय संहिता का नाम दे दिया है। इसमें पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। पुलिस अफसरों को लापरवाही बरतने और सही तरीके से ड्यूटी को अंजाम नहीं देने पर जेल भेजे जाने का प्रावधान नहीं किया गया। पुलिस हिरासत में मौतों का इस कानून में जिक्र तक नहीं किया गया। उल्टे पुूलिस हिरासत में जब—जब मौतों का मामला सामने आता है, सरकार और पुलिस अफसर उसके रफा दफा करने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सत्तारुढ राजनीतिक दलों की मिलीभगत का ही परिणाम है कि आज 21वीं सदी में भी भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें आदिम युग की याद दिलाती हैं।

- योगेन्द्र योगी

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Uttar Pradesh Voter List से दो करोड़ नाम हटाये गये, CM Yogi Adityanath की टेंशन बढ़ी, Akhilesh Yadav का चेहरा खिला!

उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के बाद जारी अंतिम आंकड़ों ने राज्य की चुनावी तस्वीर में बड़ा बदलाव सामने रखा है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा द्वारा जारी अंतिम मतदाता सूची के अनुसार लगभग दो करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह संख्या अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है और राज्य की कुल जनसंख्या तथा चुनावी भागीदारी पर गहरा प्रभाव डालने वाली है।

हम आपको याद दिला दें कि उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान कुल 166 दिनों तक चला, जिसकी शुरुआत 27 अक्टूबर 2025 को हुई थी। उस समय राज्य में कुल 15 करोड़ 44 लाख मतदाता पंजीकृत थे। प्रारंभिक चरण के बाद छह जनवरी को प्रकाशित प्रारूप सूची में यह संख्या घटकर बारह करोड़ पचपन लाख रह गई थी। हालांकि इसके बाद आपत्तियों, दावों, सुनवाई और सत्यापन की लंबी प्रक्रिया के पश्चात अंतिम सूची में कुल 13 करोड़ 39 लाख 84 हजार 792 वैध मतदाता दर्ज किए गए।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं का नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाया है, वे पंद्रह दिनों के भीतर संबंधित जिला अधिकारी के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके बाद भी समाधान न मिलने पर दूसरी अपील मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास की जा सकती है और अंत में नया मतदाता बनने के लिए प्रपत्र छह भरा जा सकता है।

यदि जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो राजधानी लखनऊ में सबसे अधिक नौ लाख चौदह हजार नाम हटाए गए, जो लगभग 22.79 प्रतिशत है। इसके बाद प्रयागराज में आठ लाख छब्बीस हजार, कानपुर में छह लाख सत्तासी हजार, आगरा में छह लाख सैंतीस हजार, गाजियाबाद में पांच लाख चौहत्तर हजार, मेरठ में पांच लाख छह हजार और बरेली में चार लाख छप्पन हजार नाम हटाए गए। विधानसभा क्षेत्रों में साहिबाबाद में तीन लाख सोलह हजार नाम हटाए जाने के साथ यह सूची में सबसे ऊपर रहा, जबकि नोएडा, लखनऊ उत्तर, आगरा कैंट और इलाहाबाद उत्तर भी प्रमुख रहे।
 

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छह जनवरी से दस अप्रैल के बीच कुल आठ लाख पंद्रह हजार नौ सौ छियानवे मतदाताओं के नाम हटाए गए। इनमें से तीन लाख पचास हजार से अधिक लोगों ने नोटिस का जवाब नहीं दिया, लगभग तीन लाख अट्ठाईस हजार लोग स्थानांतरित पाए गए, उनहत्तर हजार से अधिक नाम बहु प्रविष्टि के कारण हटाए गए, पचपन हजार से अधिक मतदाता मृत पाए गए और दो हजार से अधिक लोग आयु या नागरिकता मानकों पर खरे नहीं उतरे।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तीन करोड़ छब्बीस लाख से अधिक नोटिस जारी किए गए। लगभग एक करोड़ चार लाख मतदाता ऐसे पाए गए जिनकी जानकारी पूरी तरह से मेल नहीं खा रही थी, जबकि दो करोड़ 22 लाख मामलों में तार्किक विसंगतियां थीं। चौदह जनवरी से नोटिस जारी होने शुरू हुए और 31 जनवरी से सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होकर 27 मार्च तक पूरी की गई।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जोर देकर कहा कि किसी भी मतदाता का नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटाया गया। यदि किसी का नाम प्रारूप सूची में था लेकिन अंतिम सूची में नहीं है तो यह या तो प्रपत्र में त्रुटि के कारण हुआ है या फिर सुनवाई के बाद लिया गया निर्णय है।

हम आपको बता दें कि अंतिम सूची के अनुसार राज्य में सात करोड़ तीस लाख इकहत्तर हजार इकसठ पुरुष मतदाता, छह करोड़ नौ लाख नौ हजार पांच सौ पच्चीस महिला मतदाता और चार हजार दो सौ छह तृतीय लिंग मतदाता हैं। अठारह से उन्नीस वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या सत्रह लाख तिरसठ हजार तीन सौ साठ है।

एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रारूप और अंतिम सूची के बीच कुल चौरासी लाख अट्ठाईस हजार सात सौ सड़सठ मतदाताओं की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई। इसमें बयालीस लाख से अधिक पुरुष और लगभग इतने ही महिला मतदाता शामिल हैं। इससे लिंग अनुपात में भी सुधार हुआ है, जो आठ सौ चौबीस से बढ़कर आठ सौ चौंतीस हो गया है।

जिलों में मतदाता वृद्धि के मामले में प्रयागराज सबसे आगे रहा, जहां तीन लाख उनतीस हजार से अधिक नए मतदाता जुड़े। इसके बाद लखनऊ, बरेली, गाजियाबाद और जौनपुर प्रमुख रहे। विधानसभा क्षेत्रों में साहिबाबाद, जौनपुर, लखनऊ पश्चिम, लोनी और फिरोजाबाद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

हम आपको यह भी बता दें कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश मतदाता विलोपन प्रतिशत के मामले में दूसरे स्थान पर रहा, जहां यह आंकड़ा तेरह दशमलव चौबीस प्रतिशत रहा। इससे आगे गुजरात रहा, जबकि अन्य राज्यों में यह प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। तीसरे पक्ष द्वारा दिए गए आवेदनों के आधार पर एक लाख बीस हजार से अधिक नाम हटाए गए। इनमें अधिकतर मामले मृत्यु, स्थायी स्थान परिवर्तन या अन्यत्र पंजीकरण से जुड़े थे।

इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भी सक्रिय भागीदारी रही। पांच प्रमुख बैठकों के अलावा नौ सौ चार बैठकों का आयोजन जिला स्तर पर किया गया। पांच लाख से अधिक बूथ स्तरीय एजेंटों ने इस प्रक्रिया में भाग लिया। इसके अतिरिक्त हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों के सहयोग से यह विशाल अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा बल्कि इससे चुनावी पारदर्शिता और सटीकता को भी नई दिशा मिली है।

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। नई सूची में खासकर शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जिससे सत्तारुढ़ दल भाजपा की चिंता बढ़ सकती है। लखनऊ, मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर जैसे प्रमुख शहरों में अक्तूबर 2025 की तुलना में लगभग 19 से 23 प्रतिशत तक मतदाता घटे हैं। ये वही क्षेत्र हैं जहां पिछले चुनावों में भाजपा का मजबूत प्रभाव रहा है। विधानसभा स्तर पर भी साहिबाबाद, नोएडा, लखनऊ उत्तर और आगरा कैंट जैसी सीटों पर बड़ी संख्या में मतदाता कम हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार जिन सीटों पर एक लाख से अधिक वोट घटे हैं, उनमें अधिकांश पर भाजपा का कब्जा है। इसके विपरीत, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, जहां लगभग 9 से 14 प्रतिशत तक ही कमी दर्ज की गई।

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