Natural Healing Ayurveda: आदिवासी जड़ी-बूटी ज्ञान को दुनिया तक पहुंचाने में पतंजलि की बड़ी पहल, सामने आ रहे नए रहस्य
Natural Healing Ayurveda: आज के दौर में लोग अपनी लाइफस्टाइल पर खास ध्यान नहीं दे पाते हैं ऐसे में डायबिटीज, मोटापा, पाचन संबंधी दिक्कते, त्वचा रोग और कमजोर इम्यूनिटी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. इन बीमारियों के इलाज के लिए कई लोग दवाइयों का सहारा लेते हैं. इससे कुछ हद तक राहत मिलती है, लेकिन लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए अब लोग प्राकृतिक तरीकों की ओर रुख कर रहे हैं. यही कारण है कि आयुर्वेद और जड़ी-बूटी आधारित इलाज की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है. भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लोग प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाने लगे हैं. इस बीच, सदियों पुराने आदिवासी ज्ञान को फिर से पहचान दिलाने का काम किया जा रहा है.
आदिवासी ज्ञान की खासियत क्या है?
भारत के आदिवासी समुदायों के पास जड़ी-बूटियों का अनमोल खजाना है. ये लोग हजारों सालों से जंगलों में मिलने वाले पौधों से इलाज करते आए हैं. यह ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि अनुभव और परंपरा से आया है. उन्हें यह अच्छी तरह पता होता है कि कौन सी जड़ी बुखार में काम करती है. कौन सा पौधा घाव भरने में मदद करता है. कौन सी औषधि शरीर को ताकत देती है. यही वजह है कि आज वैज्ञानिक भी इस ज्ञान को गंभीरता से समझने की कोशिश कर रहे हैं.
क्यों खत्म हो रहा है यह पारंपरिक ज्ञान
समय के साथ यह अनमोल ज्ञान धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण बदलती जीवनशैली है. तेजी से हो रहा शहरीकरण और जंगलों की घटती संख्या भी इसके लिए जिम्मेदार है. नई पीढ़ी गांव और जंगलों से दूर शहरों की ओर जा रही है. ऐसे में वे पारंपरिक ज्ञान से दूर हो रहे हैं. अगर समय रहते इस ज्ञान को सुरक्षित नहीं किया गया, तो यह हमेशा के लिए खो सकता है.
पतंजलि रिसर्च कैसे कर रही है काम?
इसी दिशा में पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन अहम भूमिका निभा रहा है. संस्था देश के अलग-अलग आदिवासी इलाकों में जाकर स्थानीय वैद्यों और जड़ी-बूटी जानकारों से जानकारी जुटा रही है. इस प्रक्रिया में पारंपरिक इलाज के तरीकों को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित किया जा रहा है. साथ ही जड़ी-बूटियों के उपयोग और उनके फायदे को भी रिकॉर्ड किया जा रहा है. इसके अलावा इन औषधियों को आधुनिक लैब में टेस्ट किया जा रहा है. इससे उनकी गुणवत्ता और प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन हो सके. उद्देश्य यह है कि इन प्राकृतिक उपायों को सुरक्षित तरीके से लोगों तक पहुंचाया जा सके.
भविष्य में क्यों बढ़ेगी इसकी मांग?
दुनियाभर में अब लोग केमिकल फ्री जीवनशैली अपनाना चाहते हैं. यही वजह है कि हर्बल और प्राकृतिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है. भारत के पास आयुर्वेद और आदिवासी ज्ञान का बड़ा खजाना है. अगर इसे सही तरीके से प्रस्तुत किया जाए, तो यह वैश्विक स्तर पर बड़ी पहचान बना सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल भविष्य में स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है. इससे लोगों को सुरक्षित, सस्ता और असरदार इलाज मिल सकेगा.
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45 की उम्र के बाद महिलाओं में क्यों बढ़ता है लिवर फैट? डॉक्टर ने बताई असली वजह और बचाव के तरीके
Menopause and Fatty Liver: महिलाओं में 45 की उम्र के बाद हार्मोनल बदलाव होने लगता है, जिसके कारण लिवर में फैट तेजी से बढ़ने लगता है. एस्ट्रोजन का स्तर घटने से फैट पेट और आंतरिक अंगों के आसपास जमा होता है, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है और फैटी लिवर का खतरा बढ़ जाता है. समय पर जागरुकता से इस समस्या से बचा जा सकता है.
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