ईरान युद्ध संकट के बीच सीआईआई ने उद्योगों के लिए अधिक राजकोषीय और मौद्रिक रियायतों की मांग की
नई दिल्ली, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। देश के शीर्ष औद्योगिक निकाय भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने रविवार को ईरान युद्ध संकट के चलते पैदा हुई अनिश्चितता से निपटने के लिए उद्योगों के लिए अधिक राजकोषीय और मौद्रिक रियायतों की मांग की।
साथ ही, सरकार द्वारा इस समस्या से निपटने के लिए अब तक उठाए गए कदमों की सराहना की।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा, “सरकार और आरबीआई ने तेज प्रतिक्रिया, स्पष्टता और समन्वय के साथ काम किया है। शुरुआती उपायों से बाजार की भावना को स्थिर करने में मदद मिली है और यह साबित हुआ है कि भारत का नीतिगत ढांचा बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील और लचीला दोनों है।”
साथ ही, सीआईआई ने पाया कि स्थिति लगातार बदल रही है, और ऊर्जा, रसद और व्यापार चैनलों में आपूर्ति पक्ष का दबाव शुरुआती चरण से आगे भी बना हुआ है। उद्योग जगत से मिली प्रतिक्रिया से पता चलता है कि नीतिगत उपायों के पहले दौर ने भले ही तात्कालिक प्रभाव को कम किया हो, लेकिन कई क्षेत्र परिचालन और वित्तीय तनाव का सामना कर रहे हैं।
बनर्जी ने कहा, “पूर्व संकटों के दौरान भारत के अनुभव से पता चलता है कि समन्वित राजकोषीय और मौद्रिक कार्रवाई से लचीलेपन को काफी हद तक मजबूत किया जा सकता है। इसलिए, नीतिगत प्रतिक्रिया के अगले चरण में लक्षित तरलता सहायता, ऋण सुविधा, व्यापार लागत प्रबंधन और विदेशी मुद्रा स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता हो सकती है।”
सीआईआई ने वित्त मंत्रालय से महामारी के दौरान लागू की गई आपातकालीन ऋण गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) के समान एक समयबद्ध संघर्ष-संबंधित आपातकालीन ऋण गारंटी योजना (सीएल-ईसीएलजीएस) शुरू करने का अनुरोध किया है, ताकि सरकार समर्थित गारंटी के माध्यम से प्रभावित उद्यमों को अतिरिक्त कार्यशील पूंजी प्रदान की जा सके, विशेष रूप से एमएसएमई, निर्यातकों और गैस पर निर्भर क्षेत्रों को लक्षित करते हुए।
इसमें आरबीआई से यह भी आग्रह किया गया है कि वह लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), विशेष रूप से निर्यातकों और निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी सहायक इकाइयों के लिए तीन महीने की अस्थायी और स्पष्ट रूप से परिभाषित मोहलत और पुनर्गठन विंडो पर विचार करे।
सीआईआई के बयान के अनुसार, आरबीआई एमएसएमई और अन्य प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक विशेष पुनर्वित्त विंडो शुरू कर सकता है, साथ ही लक्षित दीर्घकालिक रेपो संचालन (टीएलटीआरओ) जैसे साधनों के माध्यम से लक्षित तरलता सहायता प्रदान कर सकता है, जिससे बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) उत्पादक क्षेत्रों को उचित लागत पर ऋण देना जारी रख सकें।
इसमें आगे कहा गया है कि वित्त मंत्रालय, आरबीआई के सहयोग से, केंद्रीय और राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के अनुबंधों की वितरण समयसीमा को बिना लिक्विडेटेड डैमेज क्लॉज लागू किए 3-4 महीने बढ़ाकर उद्योग, विशेष रूप से एमएसएमई को तत्काल संविदात्मक और परिचालन राहत प्रदान कर सकता है, साथ ही तरलता की कमी को दूर करने के लिए प्रदर्शन बैंक गारंटी और सुरक्षा जमा आवश्यकताओं को न्यूनतम स्तर तक कम कर सकता है। इसके अलावा, व्यवधान की अवधि के दौरान बढ़ती इनपुट लागतों को प्रबंधित करने में मदद के लिए बिजली दरों में अस्थायी राहत भी दी जा सकती है।
इसके अलावा, सीआईआई ने सुझाव दिया है कि बैंकों को सीमित अवधि के लिए योग्य मामलों में कार्यशील पूंजी सीमा का पुनर्मूल्यांकन और वृद्धि करने की अनुमति दी जा सकती है, विशेष रूप से निर्यात-उन्मुख और गैस-निर्भर इकाइयों के लिए जो अस्थायी संकट का सामना कर रही हैं। व्यवधान की अवधि के दौरान रियायती ऋण शर्तों के साथ नकद ऋण सीमा में 20 प्रतिशत तक की चरणबद्ध वृद्धि से परिचालन में महत्वपूर्ण राहत मिलेगी।
इसने मांग की है कि एमएसएमई और प्रभावित क्षेत्रों के लिए ऋण प्रसंस्करण शुल्क, विदेशी मुद्रा प्रबंधन शुल्क और दस्तावेजीकरण लागत सहित प्रशासनिक बैंकिंग शुल्कों में अस्थायी कमी या छूट पर विचार किया जाए।
सीआईआई की अन्य मांगों में प्रभावित औद्योगिक समूहों में व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली (टी-रिडएस) प्लेटफॉर्म का अधिक सक्रिय रूप से विस्तार, व्यवधान के कारण होने वाले लागत प्रभावों को कम करने के लिए ऊर्जा इनपुट पर कर और शुल्क संरचना का समयबद्ध युक्तिकरण और पूंजीगत वस्तुओं पर त्वरित मूल्यह्रास लाभ शामिल हैं।
--आईएएनएस
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LPG कालाबाजारी पर लगने वाला है ब्रेक, सरकार ने लागू की ये नई व्यवस्था, जानिए कैसे उठाएं फायदा
LPG New Delivery Rules 2026: देशभर में एलपीजी गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी की शिकायतें लंबे समय से सामने आ रही थीं. कई उपभोक्ताओं का कहना था कि उन्होंने पहले ही गैस बुक कर रखी है, फिर भी उन्हें समय पर सिलेंडर नहीं मिल रहा. वहीं कुछ लोग अतिरिक्त पैसे देकर अर्जेंट में सिलेंडर हासिल कर लेते थे. इस असमानता को खत्म करने के लिए पेट्रोलियम कंपनियों ने अब एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव किया है.
FIFO नियम सख्ती से लागू
इस नई व्यवस्था के तहत अब गैस वितरण में FIFO (First In, First Out) नियम को सख्ती से लागू किया गया है. इसका मतलब है कि जिसने पहले गैस बुक की है, उसे पहले सिलेंडर मिलेगा. इससे उन लोगों को राहत मिलेगी जो कई दिनों या हफ्तों से अपनी बुकिंग का इंतजार कर रहे थे.
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नया नियम
अब हर गैस एजेंसी को अपने काउंटर पर एक सूची लगानी होगी. इस सूची में साफ-साफ लिखा होगा कि आज किस तारीख तक की बुकिंग वाले उपभोक्ताओं को सिलेंडर दिया जा रहा है. इससे उपभोक्ताओं को यह पता चल सकेगा कि उनकी बारी कब आएगी. पहले कई जगहों पर यह जानकारी छुपाई जाती थी, जिससे भ्रम और शिकायतें बढ़ती थीं. लेकिन अब यह अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे.
अर्जेंट सिलेंडर की सुविधा खत्म
नई व्यवस्था के तहत अब अतिरिक्त पैसे देकर जल्दी सिलेंडर लेने की सुविधा पूरी तरह बंद कर दी गई है. यानी अब कोई भी व्यक्ति नियम तोड़कर या पैसे देकर अपनी बारी आगे नहीं बढ़ा सकता. यह कदम खासतौर पर उन लोगों के लिए राहत भरा है जो ईमानदारी से अपनी बारी का इंतजार करते थे, लेकिन सिस्टम की खामियों के कारण पीछे रह जाते थे.
कालाबाजारी पर सख्ती
गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी रोकने के लिए भी कड़े नियम लागू किए गए हैं. अब गैस एजेंसियों को सिर्फ 1.5 दिन का ही बफर स्टॉक रखने की अनुमति होगी. इससे एजेंसी मालिक सिलेंडर छिपाकर ऊंचे दामों पर बेच नहीं पाएंगे. पहले कुछ एजेंसियों पर आरोप लगते थे कि वे जानबूझकर स्टॉक रोककर रखते हैं और बाद में ज्यादा पैसे लेकर बेचते हैं. अब इस पर रोक लगाने के लिए यह कदम उठाया गया है.
कंपनियां रखेंगी कड़ी नजर
पेट्रोलियम कंपनियां अब एजेंसियों पर नजर रखने के लिए डिजिटल और फिजिकल दोनों तरीके अपनाएंगी. हर एजेंसी को रोजाना यह जानकारी देनी होगी कि उनके पास कितने सिलेंडर आए और कितने वितरित किए गए. इस डेटा को रियल-टाइम में मॉनिटर किया जाएगा, जिससे किसी भी गड़बड़ी को तुरंत पकड़ा जा सके. जरूरत पड़ने पर कंपनियां अचानक जांच भी कर सकती हैं.
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आम उपभोक्ताओं को क्या फायदा?
इस नई व्यवस्था से आम लोगों को कई बड़े फायदे मिलेंगे. सबसे पहले जो लोग पहले से बुकिंग कर चुके हैं, उन्हें समय पर सिलेंडर मिलने की संभावना बढ़ेगी. दूसरा ये कि वितरण में पारदर्शिता आएगी. कालाबाजारी और भ्रष्टाचार में भी कमी देखने को मिलेगी. साथ ही सभी उपभोक्ताओं को समान अधिकार मिलेगा. अब गैस की कमी के समय भी सिस्टम ज्यादा व्यवस्थित और निष्पक्ष रहेगा.
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शिकायत करने का अधिकार
अगर कोई गैस एजेंसी इन नियमों का पालन नहीं करती या काउंटर पर सूची नहीं लगाती, तो उपभोक्ता इसकी शिकायत कर सकते हैं. यह कदम उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में भी काफी अहम है.
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