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पहाड़ों पर भी बारिश मुसीबत बन कर आई , हर तरफ मची सिर्फ तबाही ही तबाही | Heavy Rain | Flood Alert

पहाड़ों पर भी बारिश मुसीबत बन कर आई , हर तरफ मची सिर्फ तबाही ही तबाही | Heavy Rain | Flood AlertThe scourge of rain has not stopped on the mountains. It is still raining intermittently at many places in the mountains. Due to which many rivers and streams were in spate. In Ramnagar, Uttarakhand, people's troubles increased due to overflowing rain drain. There the water is flowing so fast as if it is bent on erasing everything. Due to increase in water level in Barsani drain, there was a long queue of vehicles on the road. Due to the fast flow of water, people are not able to cross it.पहाड़ों पर बारिश का सितम थमा नहीं है। पहाड़ों में कई जगह अब भी रुक रुककर बारिश हो रही है। जिसकी वजह से कई नदी और नालों में उफान आ गया। उत्तराखंड के रामनगर में तो बरसाती नाले में उफान आने से लोगों की मुसीबत बढ़ गई। वहां पानी इतनी तेज़ी से बह रहा है मानो सबकुछ मिटाने पर आमदा हो। बरसानी नाले में जलस्तर बढ़ने की वजह से सड़क पर गाड़ियों की लंबी कतार लग गई। पानी का बहाव तेज़ होने की वजह से लोग उसे पार नहीं कर पा रहे।

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India First Hydrogen Powered Train धुएं की जगह पानी छोड़ेगी, बिना डीजल और बिना ओवरहेड तार के इस तरह दौड़ेगी ट्रेन

भारत की रेल व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की पहली हाइड्रोजन चालित रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाएंगे। यह सिर्फ एक नई रेलगाड़ी की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय रेल के हरित परिवर्तन की दिशा में ऐतिहासिक पहल भी होगी। हरियाणा के जींद से चलने वाली यह रेलगाड़ी देश को स्वच्छ और कम प्रदूषण वाली परिवहन व्यवस्था की ओर ले जाने का प्रयास है। हालांकि इस उपलब्धि के साथ कई तकनीकी और आधारभूत चुनौतियां भी जुड़ी हैं, जिनका समाधान भविष्य की सफलता तय करेगा।

हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17 जुलाई को जींद दौरे को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने भी तैयारियां तेज कर दी हैं। राज्यसभा सांसद संजय भाटिया को पूरे कार्यक्रम का संयोजक बनाया गया है और वह स्वयं तैयारियों की लगातार निगरानी कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर के करीबी माने जाने वाले भाटिया मंच, पंडाल, बैठक व्यवस्था, वाहन पार्किंग, पेयजल, सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं का नियमित निरीक्षण कर रहे हैं। प्रधानमंत्री अपने दौरे के दौरान देश की पहली हाइड्रोजन रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाने के साथ हरियाणा की कई विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी करेंगे।

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उधर, रेलवे के अनुसार यह रेलगाड़ी दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन चालित रेलगाड़ियों में शामिल होगी। इसमें आठ यात्री डिब्बे और दो पावर कार होंगे। लगभग दो हजार चार सौ किलोवाट क्षमता वाली यह रेलगाड़ी एक बार में कम से कम छह सौ बयासी यात्रियों को लेकर चल सकेगी। यह जींद और सोनीपत के बीच लगभग नवासी किलोमीटर लंबे मार्ग पर अधिकतम पचहत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलेगी। प्रतिदिन दो फेरे लगाएगी और कुल तीन सौ छप्पन किलोमीटर की दूरी तय करेगी। इस दौरान लगभग तीन सौ किलोग्राम हाइड्रोजन की खपत होने का अनुमान है।

कैसे चलेगी हाइड्रोजन रेलगाड़ी यदि इसकी बात करें तो आपको बता दें कि सामान्य विद्युत रेलगाड़ियां ऊपर लगे तारों से मिलने वाली विद्युत धारा पर निर्भर रहती हैं, लेकिन हाइड्रोजन रेलगाड़ी की कार्यप्रणाली पूरी तरह अलग है। इसमें हाइड्रोजन और वायु से प्राप्त ऑक्सीजन को ईंधन कोश में मिलाकर विद्युत ऊर्जा तैयार की जाती है। यही ऊर्जा रेलगाड़ी को गति देती है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य रहता है और मुख्य उपोत्पाद के रूप में केवल जल बनता है। यही कारण है कि इसे स्वच्छ परिवहन की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

भारतीय रेल की इस परियोजना में प्रत्येक पावर कार में चार एकीकृत पावर पैक लगाए गए हैं। इनमें हाइड्रोजन ईंधन कोश और लिथियम फेरो फास्फेट बैटरी का संयोजन किया गया है। प्रत्येक पावर पैक तीन सौ किलोवाट ऊर्जा देगा, जिसमें एक सौ पंद्रह किलोवाट ईंधन कोश और एक सौ पचासी किलोवाट बैटरी से प्राप्त होगी। चारों पावर पैक मिलकर बारह सौ किलोवाट क्षमता उपलब्ध कराएंगे। चूंकि रेलगाड़ी में दो पावर कार हैं, इसलिए कुल क्षमता चौबीस सौ किलोवाट अर्थात लगभग तीन हजार दो सौ अश्वशक्ति होगी। यह क्षमता समान दूरी तय करने वाली सामान्य विद्युत या डीजल बहु इकाई रेलगाड़ियों के बराबर मानी जा रही है।

ईंधन कोश और बैटरी के संतुलित तालमेल के बारे में रेलवे अधिकारियों का कहना है कि ईंधन कोश लगातार एक समान ऊर्जा देता है। इसलिए जब रेलगाड़ी चलना शुरू करती है, तब शुरुआती अधिक ऊर्जा की आवश्यकता ईंधन कोश से पूरी होती है। जैसे ही रेलगाड़ी गति पकड़ती है और ऊर्जा की मांग बढ़ती है, बैटरी अतिरिक्त शक्ति उपलब्ध कराती है। दूसरी ओर, जब रेलगाड़ी की गति कम होती है या वह किसी स्टेशन के पास पहुंचती है, तब अतिरिक्त ऊर्जा से बैटरी दोबारा चार्ज हो जाती है। इस व्यवस्था से पूरी यात्रा के दौरान बैटरी लगभग अस्सी प्रतिशत तक भरी रहती है और ऊर्जा की उपलब्धता बनी रहती है।

हम आपको यह भी बता दें कि हाइड्रोजन रेल तकनीक अभी दुनिया के चुनिंदा देशों तक ही सीमित है। इस तकनीक का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 2016 में बर्लिन में हुआ था। बाद में जर्मनी ने दो डिब्बों वाली हाइड्रोजन रेलगाड़ी शुरू की, जिसे दुनिया की पहली यात्री हाइड्रोजन रेलगाड़ी माना गया। इसके बाद जापान, चीन और अमेरिका ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए। हालांकि अभी तक इन रेलगाड़ियों का उपयोग मुख्य रूप से छोटी दूरी की सेवाओं तक सीमित है, क्योंकि तकनीक अभी विकास के दौर में है।

साथ ही हाइड्रोजन रेलगाड़ी की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। सामान्य वायुमंडलीय दबाव को एक बार माना जाता है, जबकि हाइड्रोजन को दो सौ से पांच सौ बार के अत्यधिक दबाव पर संग्रहित करना पड़ता है। यह अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इसके भंडारण और परिवहन के लिए अत्यंत सुरक्षित व्यवस्था आवश्यक होती है।

हम आपको बता दें कि रेलवे ने जींद में तीन हजार किलोग्राम क्षमता वाला ईंधन भरने का केंद्र बनाया है। यहां हाइड्रोजन की आपूर्ति के लिए विशेष शीतलन संयंत्र लगाया गया है, जो ईंधन भरने के दौरान हाइड्रोजन का तापमान शून्य से पंद्रह डिग्री नीचे तक बनाए रखता है। कम तापमान पर हाइड्रोजन द्रव अवस्था के निकट पहुंचती है, जिससे सुरक्षित और प्रभावी ईंधन आपूर्ति संभव होती है।

बहरहाल, भारतीय रेल के लिए यह परियोजना केवल एक नई रेलगाड़ी का संचालन नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य की आधारशिला है। यदि हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और लागत से जुड़ी चुनौतियों का सफल समाधान निकलता है, तो आने वाले वर्षों में यह तकनीक डीजल आधारित रेल सेवाओं का प्रभावी विकल्प बन सकती है। फिलहाल यह प्रयोग भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करता है, जिन्होंने पर्यावरण अनुकूल रेल परिवहन की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया है। अब सबसे बड़ी परीक्षा इस तकनीक को सुरक्षित, किफायती और व्यापक स्तर पर सफल बनाकर दिखाने की है।

-नीरज कुमार दुबे

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