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एशिया-प्रशांत में सबसे सस्ता 'ऑफिस फिट-आउट मार्केट' बना भारत : रिपोर्ट

नई दिल्ली, 26 मार्च (आईएएनएस)। भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक बार फिर अपनी मजबूत स्थिति साबित करते हुए खुद को सबसे किफायती ऑफिस फिट-आउट मार्केट के रूप में स्थापित किया है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वैश्विक कंपनियों को कम लागत, बड़े पैमाने और बेहतर गुणवत्ता का शानदार संयोजन उपलब्ध करा रहा है।

कुशमैन एंड वेकफील्ड की एशिया पैसिफिक ऑफिस फिट-आउट कॉस्ट गाइड 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत के प्रमुख शहरों में ऑफिस फिट-आउट की लागत 65 से 73 डॉलर प्रति वर्ग फुट के बीच है। यह लागत टोक्यो (215 डॉलर), सिडनी (161 डॉलर) और सिंगापुर (140 डॉलर) जैसे बड़े बाजारों के मुकाबले काफी कम है।

रिपोर्ट बताती है कि कम लागत के बावजूद भारत बड़े पैमाने पर उच्च गुणवत्ता वाले और आधुनिक कार्यस्थल विकसित करने में सक्षम है। यही वजह है कि भारत वैश्विक कंपनियों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनता जा रहा है।

कुशमैन एंड वेकफील्ड के एग्जीक्यूटिव मैनेजिंग डायरेक्टर शशि भूषण ने कहा कि भारत न सिर्फ कम लागत के कारण, बल्कि अलग-अलग शहरों में समान गुणवत्ता और मजबूत डिलीवरी क्षमता के कारण भी सबसे आगे है। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे कंपनियां बेहतर और आधुनिक ऑफिस स्पेस पर ध्यान दे रही हैं, भारत की लागत में बढ़त और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में बदलाव और ऊर्जा कीमतों के असर के बीच भारत की स्थिति और मजबूत हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, एशिया-प्रशांत के 27 बाजारों में 2025 में प्राइम ऑफिस स्पेस की मांग 92 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंच गई, जो 2024 में 76 मिलियन वर्ग फुट थी।

इस बढ़ती मांग में भारत की अहम भूमिका रही है। देश के शीर्ष 8 शहरों ने इस क्षेत्र की कुल ऑफिस डिमांड का करीब दो-तिहाई हिस्सा संभाला है, जिससे भारत के बाजार की मजबूती और स्थिरता साफ झलकती है।

सप्लाई के मामले में भी भारत आगे है। 2026 की शुरुआत तक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में करीब 386 मिलियन वर्ग फुट ऑफिस स्पेस निर्माणाधीन है, जिसमें से लगभग 192 मिलियन वर्ग फुट भारत के शीर्ष 8 शहरों में बन रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब कंपनियां ऑफिस निवेश से पीछे नहीं हट रही हैं, बल्कि सोच-समझकर निवेश कर रही हैं। ऐसे में भारत उन्हें लागत, गुणवत्ता और विस्तार की बेहतर सुविधा देता है।

हालांकि, देश में मुंबई सबसे महंगा बाजार बना हुआ है, जहां ऑफिस फिट-आउट की लागत करीब 73 डॉलर प्रति वर्ग फुट है। इसकी वजह यहां मल्टीनेशनल कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) की मजबूत मांग है, जो प्रीमियम ऑफिस स्पेस की तलाश में हैं।

--आईएएनएस

वीकेयू/डीकेपी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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भारत में कमर्शियल ड्रोन बाजार में तेजी, 2029 तक 18 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान : रिपोर्ट

मंबई, 26 मार्च (आईएएनएस)। भारत में कमर्शियल ड्रोन इंडस्ट्री तेजी से आगे बढ़ रही है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में इस सेक्टर का बाजार आकार 1.88 अरब डॉलर (करीब 17,000 करोड़ रुपए) तक पहुंच चुका है। अब अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025 से वित्त वर्ष 2029 के बीच यह बाजार करीब 17.98 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ेगा।

रिसर्च फर्म बीटूके एनालिटिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कमर्शियल ड्रोन इंडस्ट्री में अमेरिका पहले स्थान पर है, उसके बाद चीन का नंबर आता है जबकि भारत फिलहाल सातवें स्थान पर है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि ड्रोन तकनीक खेती में लागत कम करने का बड़ा जरिया बन रही है। खासकर एग्रोकेमिकल छिड़काव में ड्रोन के इस्तेमाल से लागत लगभग 80 प्रतिशत तक कम हो सकती है।

एक अध्ययन में 6.4 से 7.1 लाख रुपए कीमत वाले छोटे और मध्यम ड्रोन का विश्लेषण किया गया, जिनकी अधिकतम कार्य अवधि तीन साल मानी गई।

इसकी तुलना में, मैनुअल मजदूरी पर सालाना करीब 1.7 लाख रुपए खर्च होते हैं। हालांकि ड्रोन की शुरुआती लागत ज्यादा होती है, लेकिन उनकी कार्यक्षमता कहीं अधिक है।

ड्रोन उतने समय में 6 से 6.6 एकड़ जमीन पर काम कर सकते हैं, जितना समय मजदूर एक एकड़ में लगाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षता और लागत को मिलाकर देखें तो ड्रोन मैनुअल श्रम के मुकाबले 78 प्रतिशत से ज्यादा किफायती साबित होते हैं।

भारत में इस समय 122 ड्रोन मॉडल्स को टाइप सर्टिफिकेट मिला हुआ है, जो कि डीजीसीए (नागर विमानन महानिदेशालय) द्वारा जारी किया जाता है। यह प्रमाणन इस बात की पुष्टि करता है कि ड्रोन सुरक्षा, उड़ान क्षमता और प्रदर्शन के मानकों पर खरे उतरते हैं।

इनमें से करीब 70 प्रतिशत ड्रोन कृषि कार्यों, खासकर छिड़काव के लिए उपयोग हो रहे हैं। वहीं, 24 प्रतिशत ड्रोन सर्विलांस और मैपिंग जैसे कामों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इससे साफ है कि फिलहाल भारत में ड्रोन का सबसे बड़ा उपयोग खेती में हो रहा है।

सरकार की नीतियों ने भी इस सेक्टर को बढ़ावा दिया है। पूरी तरह तैयार ड्रोन के आयात पर रोक और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना ने स्थानीय निर्माण और रिसर्च को मजबूती दी है।

नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन तकनीक से जोड़ा जा रहा है, जिससे कृषि सेवाओं में उनकी भागीदारी बढ़े।

कृषि मंत्रालय ड्रोन खरीद पर सब्सिडी दे रहा है जबकि खनन और सड़क परिवहन मंत्रालय ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी के लिए कर रहे हैं। रक्षा मंत्रालय भी ड्रोन खरीद के जरिए अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।

सबसे खास बात यह है कि भारत का करीब 90 प्रतिशत क्षेत्र ग्रीन जोन में आता है, जहां ड्रोन उड़ाने के लिए पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के बाद अब अन्य राज्यों में भी खेती में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा, जिससे इस क्षेत्र में बड़ा बाजार तैयार होने की संभावना है।

--आईएएनएस

वीकेयू/पीएम

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