अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए अब एक दिलचस्प मोड़ सामने आया है। खबरों के मुताबिक पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के तौर पर पेश कर रहा है और मुमकिन है कि इस हफ्ते के आखिर में इस्लामाबाद में दोनों मुल्कों के बीच आमने-सामने बातचीत भी हो। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच होने वाली मध्यस्थता के क्या मायने हैं? साथ ही इस पर भारत का क्या रुख है? मेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कल ही ईरान युद्ध में हाफ सीज फायर का प्रस्ताव दिया था। लेकिन यह सिर्फ 48 घंटे में टूट गया। एक्सपर्ट इसे ट्रंप और नेतन्याहू का डबल गेम बता रहे हैं। अब इसे पाकिस्तान में पीस टॉक के तहत सुलझाने की बात चल रही है। इजराइली रिपोर्टर बराक रेविड ने सोशल मीडिया पर एक इजराइयली अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि इस मीटिंग में अमेरिकी डेलीगेशन की कमान उपराष्ट्रपति जे डी वेंस संभाल सकते हैं। उनके साथ शांति मिशन के लिए खासदूत स्टीव बिटकॉफ और जेरेड कुशनर भी शामिल हो सकते हैं। जो ट्रंप के बेहद करीबी हैं। विटक ट्रंप के खास दोस्त हैं और कुशनर उनके दामाद हैं। वहीं ईरान की तरफ से संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर घालीबा डेलीगेशन की अगुवाई कर सकते हैं। इस पूरे मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का बयान भी काफी अहम है। उन्होंने हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशियान से बात की और इलाके में अमन कायम करने में मदद का भरोसा दिया। अमेरिकी एक्सपर्ट माइकल कुगलमैन का कहना है कि पाकिस्तान का इस तरह मध्यस्थ बनना कोई हैरानी की बात नहीं है। पिछले एक साल में पाकिस्तान और ईरान के रिश्तों में काफी गर्मजशी आई है।
मेजबानी को लेकर पाकिस्तान तैयार
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए सार्थक और निर्णायक वार्ता की मेजबानी को लेकर उनका देश तैयार है। यह घोषणा मीडिया की उन खबरों के बाद आई है जिनमें कहा गया है कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के लिए पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये परोक्ष रूप से प्रयास कर रहे हैं। शरीफ ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, पाकिस्तान पश्चिम एशिया में युद्ध को समाप्त करने के लिए जारी संवाद प्रयासों का स्वागत करता है और उनका पूरी तरह से समर्थन करता है, जो क्षेत्र और उससे परे शांति और स्थिरता के हित में है। शरीफ ने पोस्ट में कहा कि अमेरिका और ईरान की सहमति होने पर पाकिस्तान संघर्ष के व्यापक समाधान के लिए सार्थक और निर्णायक वार्ता की मेजबानी करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए तैयार है तथा इसे अपने लिए सम्मान की बात मानता है। कुछ घंटों बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शरीफ की पोस्ट को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर साझा किया। इससे पहले, विदेश कार्यालय ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए अटकलों से बचने और अमेरिकी एवं ईरानी प्रतिनिधियों के बीच वार्ता स्थल के बारे में आधिकारिक घोषणाओं का इंतजार करने का आग्रह किया था। विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, पाकिस्तान अपनी नीति के अनुरूप, पश्चिम एशिया और फारस की खाड़ी में जारी संघर्ष के समाधान के लिए राजनयिक माध्यमों और प्रयासों के प्रति प्रतिबद्ध है।
भारत में क्यों नहीं हुई मध्यस्थता
अब अगर भारत की बात करें तो भारत का रुख हमेशा से साफ रहा है। भारत चाहता है कि इलाके में जंग ना हो और अमन चैन बना रहे। लेकिन भारत किसी भी सूरत में पाकिस्तान की तरह किसी भी पक्ष का मोहरा बनने को तैयार नहीं है। उसकी दोस्ती ईरान और इजराइल दोनों के साथ कायम है और यही उसकी संतुलित विदेश नीति की पहचान भी है। कुल मिलाकर सियासत का यह खेल अभी दिलचस्प मोड़ पर है। अब देखना यह होगा कि पाकिस्तान इस मौके को अपने हक में कैसे इस्तेमाल करता है और क्या वाकई यह कोशिश इलाके में अमन ला पाएगी या फिर यह सिर्फ एक और सियासी चाल साबित होगी।
चार सप्ताह से चला आ रहा युद्ध
युद्ध के चौथे सप्ताह में प्रवेश करने के साथ ही विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस्लामाबाद को वार्ता के संभावित स्थल के रूप में बताया है। ब्रिटेन के अखबार ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ के अनुसार, पाकिस्तान के रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात की और अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाने का अनुरोध किया। सोमवार को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर घोषणा की थी कि अमेरिका ईरानी बिजली संयंत्रों पर हमलों को पांच दिनों के लिए स्थगित कर देगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने पिछले कुछ दिनों में ईरान के साथ बहुत अच्छी और सार्थक बातचीत की है। ‘सीएनएन’ के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को 15 मांगों की एक सूची भेजी है, जिसमें पाकिस्तान के माध्यम से अपनी अपेक्षाओं का ब्यौरा दिया गया है। सूत्रों के हवाले से ‘सीएनएन’ की खबर में कहा गया, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (आईएसआई) के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल आसिम मलिक उन अधिकारियों में शामिल हैं जो अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के संपर्क में हैं।
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बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले हम। कुछ यही स्थिति इसराइल और अमेरिका की हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स तो कुछ इसी तरह के दावे कर रही हैं। स्थिति यह है कि प्रेसिडेंट ट्रंप और पीएम नेतन्याहू अब किसी और का कंधा ढूंढ रहे हैं जिस पर उन्होंने रखकर बंदूक चलाई थी, या वो सर ढूंढ रहे हैं जिस पर कि ठीकरा फोड़ा जाए। ये कवायद भी शुरू हो चुकी है। मीडिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि अमेरिका और इसराइल इतने ज्यादा झुंझुला गए हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें। इस ईरान जहां पर टस से मस नहीं हुआ है। जंग का 25वां दिन है इधर प्रेसिडेंट ट्रंप ने अपने डिफेंस सेक्रेटरी यानी अमेरिका के जो डिफेंस मिनिस्टर हैं पीट हेक्सेथ उन पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया है। एक प्रोग्राम में उन्होंने सीधे लफ्जों में कहा साफ तौर पर कहा कि इन्होंने यानी पीट हेक्सेथ ने हमें बरगलाया। हमें गुमराह किया और इन्होंने ही कहा था कि एक बार ईरान पर सैन्य कारवाई करके देख लेते हैं। आप देखिए किस तरह से अपना दामन छुड़ाने अपना दामन बचाने की कोशिश कर रहे है।
ट्रंप वो कर कर हार गए हैं और ईरान जिस तरह से तन कर खड़ा हुआ है। एक कदम भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। अब वो सीधे तौर पर अपने डिफेंस सेक्रेटरी अपने डिफेंस मिनिस्टर जिसको कहते हैं उन पर आरोप मर रहे हैं। पीट हेक्कत पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने कहा था कि ईरान पर हमला करके देख लेते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि इजराइल ने हमला किया या इजराइल हमला करना चाह रहा था इसलिए अमेरिका बीच में कूद गया। यानी अमेरिका को यह पता ही नहीं था कि करना क्या है या प्रेसिडेंट ट्रंप को यह पता नहीं था कि करना क्या है ईरान के खिलाफ और अब वो फंस गए हैं। मोसाद के चीफ से जो कि इजराइल की खुफिया एजेंसी है और जिसका दुनिया भर में बड़ा नाम है कि मोसाद ऐसी है, मोसाद वैसी है तो मोसाद किसी भी देश में एक्शन ले सकती है। मोसाद कहीं भी ढूंढ करके अपने शिकार को मार देती है। टारगेट किलिंग में माहिर है और तमाम तरह के बातें पिछले 60-70 सालों से मोसाद को लेकर बनाए जा रहे हैं। ब्रांड मोसाद बनाया जा रहा है। अब वही पीएम नेतन्याहू मोसाद के चीफ से नाराज हैं। जिनका नाम है मोसाद के जो चीफ हैं उनसे वो नाराज चल रहे हैं। डेविड बर्निया।
डेविड बर्निया पर आरोप लगाते हुए वो कह रहे हैं कि डेविड बर्निया ने जो प्रोग्राम दिया था ईरान के हवाले से कि हम एक से दो दिन जबरदस्त हमले ईरान में करेंगे। उसके बाद आवाम बागी हो जाएगी। और जैसे ही बमबारी रुकेगी, जनता सड़कों पर आ जाएगी। बगावत कर देगी अपनी रिजीम के खिलाफ, इस्लामिक रेवोल्यूशन के खिलाफ। बड़े पैमाने पर ईरान में दंगे होंगे और इस बीच हम तख्ता पलट करवा देंगे, सरकार बदला देंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी तरह का आंदोलन नहीं हुआ। जिस तरह का आंदोलन जनवरी 2026 की शुरुआत में हुआ था जो महंगाई विरोधी आंदोलन था और बाद में हिंसक हो गया और जिसको देखते हुए ही अमेरिका और इसराइल ने ये एक्शन लिया कि ये सही मौका है लेकिन वो मौका उनके लिए गलत साबित हुआ। अब एक भी शख्स सरकार के खिलाफ सड़क पर नहीं निकला या उसने जुर्रत नहीं की या अगर कुछ इस तरह के लोग हैं भी तो वो अपने घरों पे बैठे हुए हैं क्योंकि उन्हें अभी तक भरोसा नहीं है कि उनकी मदद हो पाएगी कि नहीं। लेकिन सड़कों पर जो निकले वो इमाम आयतुल्लाह अली खामनेई के समर्थक थे।
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