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एक तरफ ट्रंप कर रहे सीजफायर की बातें, दूसरी तरफ अमेरिका मिडिल ईस्ट भेज रहा हजारों सैनिक, क्या है प्लान?

मिडल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा सैन्य कदम उठाने की तैयारी की है। एक ओर डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर प्रस्ताव और शांति प्रयासों की चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी सेना अपनी सबसे प्रभावशाली और तेज प्रतिक्रिया देने वाली यूनिट्स में से एक 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के करीब 1,000 सैनिकों को क्षेत्र में भेजने की योजना बना रही है। सैनिकों की सटीक संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट सामने आ रही हैं, लेकिन न्यूज एजेंसी AP के अनुसार यह टुकड़ी आने वाले कुछ ही दिनों में मिडल ईस्ट के लिए रवाना हो सकती है। 82वीं एयरबोर्न डिवीजन को अमेरिकी सेना की इमरजेंसी रिस्पांस फोर्स माना जाता है, क्योंकि इसकी विशेषता है कि इसे बहुत कम समय में दुनिया के किसी भी हिस्से में तैनात किया जा सकता है। इस मिशन में प्रथम ब्रिगेड कॉम्बैट टीम के साथ डिवीजन के कमांडर मेजर जनरल ब्रैंडन टेग्टमेयर भी शामिल रहेंगे। यह यूनिट तेज कार्रवाई, त्वरित तैनाती और संकट की स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता के लिए जानी जाती है।

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ईरान वार्ता पर ट्रंप के दावों को लेकर भ्रम की स्थिति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सप्ताह यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि ईरान के साथ बातचीत के आशाजनक परिणाम सामने आ रहे हैं। इस बयान ने ऐसे समय में और भी सवाल खड़े कर दिए हैं जब युद्ध के लक्ष्य अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। ईरान ने किसी भी प्रकार की बातचीत के विचार को खारिज करते हुए कहा कि वह "पूर्ण विजय" प्राप्त होने तक लड़ेगा। पाकिस्तान, मिस्र और खाड़ी क्षेत्र की अन्य सरकारों द्वारा बातचीत शुरू करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन उनके प्रयास अभी शुरुआती चरण में हैं। इस बीच, इज़राइल ने अपने हमलों को जारी रखने का दृढ़ रुख बनाए रखा है। तनाव बढ़ने के साथ ही मंगलवार को ईरान, इज़राइल और क्षेत्र के कई अन्य स्थानों पर रॉकेट दागे गए और खाड़ी में अमेरिकी मरीन सैनिकों की नई तैनाती की गई।

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ईरान को 15-सूत्रीय युद्धविराम योजना की पेशकश

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन ने ईरान को 15-सूत्रीय युद्धविराम योजना की पेशकश की है। इस घटनाक्रम से अवगत एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखे जाने की शर्त पर बताया कि युद्धविराम योजना पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिये ईरान को सौंपी गई। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश की है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब अमेरिका की सेना 82वीं ‘एयरबोर्न डिवीजन’ से कम से कम 1,000 और सैनिकों को तैनात की तैयारी कर रही है ताकि क्षेत्र में पहले से मौजूद करीब 50,000 सैनिकों को और बल मिल सके। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने मंगलवार को अपनी एक खबर में कहा कि 15-सूत्रीय योजना ईरानी अधिकारियों को सौंप दी गई है। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय ‘पेंटागन’ दो ‘मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट’ की भी तैनाती की प्रक्रिया में है जिसके तहत क्षेत्र में करीब 5,000 मरीन एवं नौसेना के हजारों अन्य कर्मी और तैनात किए जाएंगे। अधिकारी ने कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध जारी रखने की वकालत कर रहे इजराइली अधिकारी अमेरिकी प्रशासन द्वारा युद्धविराम योजना सौंपे जाने से हैरान हैं। उन्होंने साथ ही कहा कि अमेरिका पश्चिम एशिया में अतिरिक्त सैनिक एवं मरीन भेज रहा है, ऐसे में युद्धविराम योजना के प्रस्ताव को ट्रंप की ऐसी रणनीति के तौर पर पेश किया जा रहा है कि भविष्य में क्या कदम उठाना है, इसे लेकर वह अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय ‘व्हाइट हाउस’ ने इस संबंध में टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया है।

जैसे-जैसे लड़ाई तेज़ होती जा रही है, युद्ध के उद्देश्य अस्पष्ट बने हुए हैं

28 फरवरी को इज़राइल के साथ संघर्ष शुरू करने के बाद से, ट्रंप ने वाशिंगटन के उद्देश्यों के बारे में बदलते हुए स्पष्टीकरण दिए हैं। उन्होंने ईरान की मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने और पड़ोसी देशों के लिए खतरे को कम करने की बात कही है, जिससे उन्हें प्रगति घोषित करने की काफी गुंजाइश मिलती है। एक अधिक जटिल मांग ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है, एक ऐसी शर्त जिस पर ट्रंप जोर देते हैं कि यह किसी भी समझौते का हिस्सा होनी चाहिए। वाशिंगटन की एक और प्रमुख प्राथमिकता होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना है - वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग जिसे ईरान ने युद्ध की शुरुआत में प्रभावी रूप से अवरुद्ध कर दिया था। ट्रंप ने हाल ही में ईरान में सत्ता परिवर्तन के बारे में अपने बयानों को कम कर दिया है, जबकि बेंजामिन नेतन्याहू इस संघर्ष को ईरानियों के लिए सत्ताधारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के अवसर के रूप में पेश करते रहे हैं। 

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इन 3 बड़े शिया देशों पर क्यों हमले कर रहा ईरान? भारत के मुसलमान भी हैरान

अमेरिका और इजराइल की ओर से हमले के बाद से ही ईरान ने मिडिल ईस्ट के उन देशों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। ईरान की ओर से इन देशों पर हमले अब भी बदस्तूर जारी हैं। ईरान ने जिन देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए हैं उनके पास भी मजबूत सैन्य ताकत है। हालांकि इन देशों ने अभी तक ईरान पर पलटकर हमला नहीं किया। इन देशों में बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, यूएई, क़तर, तुर्की और अज़रबैजान शामिल हैं। सबसे खास बात यह है कि इनमें कई शिया देश भी शामिल हैं। जहां शिया मेजॉरिटी में हैं। वहीं ईरान की पहचान एक शिया लीडर देश के तौर पर होती रही है। ऐसे में सवाल उठता है आखिर ईरान सुन्नी देशों के साथ-साथ शिया मुल्कों को भी क्यों कर रहा है टारगेट?

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ईरान लगातार बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य अड्डों और नागरिक बुनियादी ढांचों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है। यह हमले अमेरिका इजराइल द्वारा ईरान पर की गई जवाबी कार्रवाही के बाद बढ़े तनाव का हिस्सा है। इन हमलों के कारण खाड़ी देशों में हड़कंप मच गया है और स्थानीय वायु रक्षा प्रणालियां सक्रिय हो गई हैं। ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय और कुवैत में अली अल सलेम और मीना अल अहमदी रिफाइनरी जैसे अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। दोनों ही देशों के एयर डिफेंस सिस्टम अपने सायरन मोड पर हैं। बहरीन की बात करें तो बहरीन एक शिया बहु बाहुली देश है। वहां करीब 65% आबादी शिया है। शियाओं के वहां पर बहुसंख्यक होने के बावजूद उन पर सुन्नी अल खलीफा परिवार का शासन है। यह देश अमेरिका का एक नजदीकी अलय है। पिछले कुछ सालों से इसके संबंध इजराइल के साथ भी काफी मजबूत हुए हैं। कुवैत की बात करें तो यहां पर करीब आधी आबादी शियाओं की है। कुवैत भी अमेरिका और इजराइल का करीबी पार्टनर है। हालांकि कुवैत के वर्तमान राजा शेख मिसाल अल अहमद अल जाबेर अल सबा सुन्नी हैं। 

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तीसरा शिया देश है अज़र बैजान जहां पर ईरान जमकर हमले कर चुका है। अज़र-बैजान के नक्शीवान स्वायत्त गणराज में ईरानी सीमा से ड्रोन हमले किए गए। जिससे नक्शीवान, हवाई अड्डे और नागरिकों को नुकसान पहुंचा है। आपको बताते चल अज़रान के रिश्ते अमेरिका से कुछ खास मजबूत नहीं है। लेकिन अज़र-बैजान इजराइल का एक ऑलवेदर फ्रेंड है। इजराइल अज़र-बैजान से गैस और तेल खरीदता है। वहीं अज़र-बैजान इजराइल से हथियार लेता है। एक शिया देश होने के बावजूद अज़रबैजान के संबंध ईरान से सीमा विवाद के चलते तनावपूर्ण रहे हैं। दरअसल इन शिया देशों पर ईरान इसलिए हमले कर रहा है क्योंकि यह देश अमेरिका और इजराइल के मजबूत अलय हैं। वहीं भारत की बात करें तो भारत में भी ठीक-ठाक शिया आबादी रहती है। यह ज्यादातर यूपी, नॉर्थ कश्मीर और लद्दाख में है। भारत में शियाओं का एक बड़ा तबका इस युद्ध में ईरान को समर्थन करता हुआ नजर आया है। हालांकि इस युद्ध को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोशिशें की जा रही हैं। 

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