पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में धधकती जंग अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां हर चाल, हर बयान और हर कूटनीतिक कदम वैश्विक संतुलन को हिला सकता है। इसी बीच पाकिस्तान अचानक इस खेल का अहम मोहरा बनकर उभरा है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है बल्कि भारत सहित पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर रणनीतिक संकेत भी दे दिए हैं।
हम आपको बता दें कि करीब एक महीने से जारी इस भीषण संघर्ष में दो हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए हमलों के बाद हालात बेकाबू होते गए। ईरान ने जवाब में अमेरिकी ठिकानों वाले देशों पर हमले किए, खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा संरचनाओं को निशाना बनाया और होर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग बंद कर दिया जो दुनिया के तेल और गैस का एक बड़ा रास्ता है।
अब इस विस्फोटक माहौल में पाकिस्तान खुद को शांति वार्ता के मंच के रूप में पेश कर रहा है। खबरें हैं कि अमेरिका की ओर से संभावित वार्ता का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर सकते हैं और इस्लामाबाद को मेजबान शहर बनाया जा सकता है। अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के भी वहां पहुंचने की तैयारी की चर्चा है। हालांकि अभी तक न तो ईरान ने आधिकारिक रूप से सहमति दी है और न ही व्हाइट हाउस ने किसी ठोस वार्ता की पुष्टि की है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने खुलकर ऐलान किया है कि उनका देश इस वार्ता की मेजबानी के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए यह जरूरी है। लेकिन असली सवाल यह है कि पाकिस्तान अचानक इस कूटनीतिक केंद्र में कैसे आ गया?
दरअसल पाकिस्तान की भौगोलिक और सामरिक स्थिति इसे एक अनोखा मध्यस्थ बनाती है। उसके पास अमेरिकी सैन्य ठिकाने नहीं हैं, इसलिए वह सीधे ईरान के हमलों के दायरे में नहीं आता। दूसरी ओर, उसकी ईरान से सांस्कृतिक और धार्मिक निकटता है और खाड़ी देशों खासकर सऊदी अरब के साथ उसका रक्षा समझौता भी है। यही संतुलन उसे दोनों पक्षों के लिए उपयोगी बनाता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के बीच हुई बातचीत इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे बहुत कुछ चल रहा है। वहीं ट्रंप द्वारा शाहबाज शरीफ के संदेश को सोशल मीडिया पर शेयर करना भी महज संयोग नहीं माना जा सकता। यह एक सोची समझी कूटनीतिक चाल हो सकती है जिससे सीधे बातचीत से बचते हुए तीसरे देश के जरिये दबाव बनाया जाए।
लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। ईरान ने साफ कह दिया है कि कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई और उसने ऐसी खबरों को झूठ बताया है। इसका मतलब है कि फिलहाल केवल बैक चैनल संदेशों का आदान प्रदान हो रहा है, जहां पाकिस्तान संदेशवाहक की भूमिका निभा रहा है।
रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह पूरा घटनाक्रम बेहद खतरनाक और जटिल है। अगर पाकिस्तान इस वार्ता में सफल होता है तो उसकी अंतरराष्ट्रीय साख में जबरदस्त उछाल आएगा। वह खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकता है। लेकिन अगर यह प्रयास विफल रहता है तो वही पाकिस्तान दो पाटों के बीच पिस सकता है।
भारत के लिए भी यह स्थिति नजरअंदाज करने वाली नहीं है। एक तरफ पाकिस्तान अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, दूसरी तरफ वह ऐसे मंच पर खड़ा हो रहा है जहां वैश्विक शक्तियां आमने सामने हैं। यह भविष्य में दक्षिण एशिया की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी यह संकट बेहद गंभीर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव का मतलब है तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर। भारत जैसे आयात पर निर्भर देश के लिए यह खतरे की घंटी है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी किसी भी पक्ष में समझौते की वास्तविक इच्छा नहीं दिखती। अमेरिका पीछे हटना नहीं चाहता और ईरान खुद को मजबूत स्थिति में मान रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका एक जोखिम भरा दांव है। बहरहाल, पाकिस्तान इस खेल में उतर चुका है, लेकिन यह देखना बाकी है कि वह बाजी जीतता है या खुद मोहरा बनकर रह जाता है।
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