ईरान की सियासत का अहम चेहरा बन कर उभर रहे गालिबाफ! ट्रंप के प्रस्ताव को बताया फेक
नई दिल्ली, 24 मार्च (आईएएनएस)। ईरान की राजनीति में इन दिनों एक नाम काफी चर्चा में है, और ये मोहम्मद बागर गालिबाफ का है। मौजूदा समय में वे इस्लामिक कंस्लटेटिव असेंबली, यानी ईरान की संसद के स्पीकर हैं, और रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के साथ संभावित बातचीत में उनकी भूमिका अहम मानी जा रही है। इससे इतर जिस अंदाज में वो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सोशल पोस्ट में अपनी राय जाहिर करते हैं वो सुर्खियां बटोर ले जाती हैं।
ट्रंप ने जब सोमवार को 5 दिनों तक हमला टालने की बात की तो गालिबाफ वो शख्स थे जिन्होंने इसे फेक न्यूज का तमगा दिया। उन्होंने अमेरिका के प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए कहा, हमारे लोग हमलावरों के लिए कठोर दंड की मांग करते हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति तक सभी अधिकारी अपने नेता और जनता के साथ पूरी दृढ़ता से खड़े हैं। अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं हुई है। ये झूठी खबरें वित्तीय और तेल बाजारों में हेरफेर करने तथा उस दलदल से बाहर निकलने का एक प्रयास हैं, जिसमें अमेरिका और इजरायल फंसे हुए हैं।
1961 में ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर तोरकाबेह में जन्मे गालिबाफ का शुरुआती जीवन देश के बड़े राजनीतिक बदलावों के बीच गुजरा। 1979 की इस्लामिक क्रांति ने उनके विचार और करियर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वह दौर था जब ईरान में राजशाही खत्म होकर इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई।
गालिबाफ ने अपने करियर की शुरुआत सैन्य क्षेत्र से की। वे ईरानी एयर फोर्स में पायलट रहे और बाद में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) से भी जुड़े। उनकी प्रशासनिक क्षमता के चलते उन्हें धीरे-धीरे देश के कई महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी थमाई गई। वे ईरान के राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख रहे, जहां उन्होंने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। इसके बाद उन्होंने राजधानी तेहरान के मेयर के रूप में भी लंबा कार्यकाल संभाला, जहां शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर काम किया गया।
2020 में गालिबाफ को संसद का स्पीकर चुना गया, यह पद पहले अली लारिजानी के पास था। स्पीकर के रूप में वे विधायी प्रक्रियाओं और राष्ट्रीय नीतियों को दिशा देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
राजनीतिक महत्वाकांक्षा के तहत गालिबाफ ने कई बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव भी लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। 2024 के चुनाव में वे तीसरे स्थान पर रहे, जहां मसूद पेजेश्कियन विजेता बने और सईद जलीली दूसरे स्थान पर रहे। गालिबाफ को आम तौर पर ईरान की राजनीति में हार्डलाइनर, यानी सख्त रुख अपनाने वाले नेता के रूप में देखा जाता है।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह चर्चा है कि अमेरिका, ईरान के साथ जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात को खत्म करने के लिए गालिबाफ को एक अहम वार्ताकार के रूप में देख रहा है। हालांकि, गालिबाफ ने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी तरह की बातचीत नहीं हुई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और रणनीतियों पर भी तंज कसा है।
इस बीच पॉलिटिको ने सोमवार को अमेरिकी सरकार के दो अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट दी कि डोनाल्ड ट्रंप की सरकार चुपचाप ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बागर गालिबाफ को एक संभावित पार्टनर, और यहां तक कि भविष्य के नेता के रूप में भी देख रही है
कुल मिलाकर, मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ईरान की सत्ता संरचना में एक प्रभावशाली और अनुभवी नेता हैं, जिनका राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव उन्हें देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक महत्वपूर्ण चेहरा बनाता है।
--आईएएनएस
केआर/
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नीतीश कुमार के पास सीएम पद से इस्तीफा देने के लिए बचा सिर्फ इतना वक्त, पार्टी में फिर मिली बड़ी जिम्मेदारी
बिहार की राजनीति पर इन दिनों सबकी नजरें टिकी हुई हैं. क्योंकि यहां पर नीतीश कुमार जो प्रदेश की सियासत के सुशासन बाबू के नाम से मशहूर हैं वह अपनी दूसरी पारी की तैयारी में जुटे हैं. ये दूसरी पारी है राज्यसभा जाने की. हाल में उन्होंने राज्यसभा का चुनाव जीत लिया है. वहीं इस बीच नीतीश कुमार एक बार फिर जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए हैं. यह फैसला पार्टी के भीतर उनकी मजबूत पकड़ और सर्वस्वीकृत नेतृत्व को दर्शाता है. नामांकन प्रक्रिया के दौरान उनके अलावा किसी अन्य नेता ने दावेदारी पेश नहीं की, जिसके चलते उनका चयन सर्वसम्मति से तय हो गया. नीतीश को जेडीयू में एक बार फिर अहम जिम्मेदारी मिल गई है. लेकिन उनके पास प्रदेश का मुख्यमंत्री बने रहने के लिए काफी कम वक्त बचा है.
इस दिन नीतीश कुमार के देना होगा इस्तीफा
बता दें कि नीतीश कुमार दोहरे पद पर काम नहीं कर सकते हैं. राज्यसभा सांसद बनने के बाद उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा. ऐसे में उनके पास सीएम पद से रिजाइन करने के लिए 30 मार्च तक का वक्त बचा है. तब तक अगर उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया तो उनकी राज्यसभा सदस्यता जा सकती है. दरअसल सदन के सदस्य चुने जाने के 14 दिन के अंदर दूसरे सदन की सदस्यता छोड़ना होती है. ऐसे में नीतीश कुमार के पास 30 मार्च तक का ही वक्त बचा है.
नामांकन प्रक्रिया और औपचारिक घोषणा
पार्टी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, अध्यक्ष पद के लिए नामांकन वापस लेने की अंतिम समयसीमा 24 मार्च 2026, सुबह 11 बजे निर्धारित थी. तय समय बीतने के बाद निर्वाचन अधिकारी के पास केवल नीतीश कुमार का ही नामांकन शेष रहा.
इसके बाद दोपहर 2:30 बजे निर्वाचन अधिकारी अनिल प्रसाद हेगड़े की ओर से उनके निर्वाचित होने का प्रमाण पत्र जारी किया गया.
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी
इस महत्वपूर्ण मौके पर पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे, जिनमें कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा में संसदीय दल के नेता संजय कुमार झा, केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह), बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार सहित अन्य प्रमुख नेता शामिल थे. नामांकन दाखिल करने के समय भी इन नेताओं ने नीतीश कुमार के साथ खड़े होकर अपनी एकजुटता दिखाई थी.
राजनीतिक पृष्ठभूमि और बदलाव
दिसंबर 2023 में राजीव रंजन सिंह के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद नीतीश कुमार ने पार्टी की कमान संभाली थी. उस समय जेडीयू इंडिया अलायंस का हिस्सा थी और महागठबंधन के साथ मिलकर राजनीति कर रही थी.
हालांकि, कुछ ही समय बाद उन्होंने रणनीतिक बदलाव करते हुए एनडीए में वापसी कर ली. यह कदम भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना गया, जिसने बिहार की सियासी दिशा को प्रभावित किया.
नई जिम्मेदारियां और बदलते समीकरण
हाल ही में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. अब उनके पास पार्टी की राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है, जिससे उनकी भूमिका और अधिक व्यापक हो गई है.
उनके इस्तीफे के बाद राजनीतिक हलकों में उनके बेटे निशांत कुमार की सक्रियता चर्चा का विषय बन गई है. माना जा रहा है कि वे राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, यहां तक कि उन्हें उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी भी मिल सकती है.
भविष्य की राजनीति पर असर
जेडीयू में नीतीश कुमार का निर्विरोध अध्यक्ष बनना यह संकेत देता है कि पार्टी में फिलहाल कोई आंतरिक विरोध नहीं है. साथ ही, यह निर्णय आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है.
अब सबकी नजर बिहार के नए नेतृत्व और संभावित राजनीतिक समीकरणों पर टिकी है. मुख्यमंत्री पद को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, जिससे आने वाले समय में राज्य की राजनीति और भी दिलचस्प हो सकती है.
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