केरल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने आगामी केरल विधानसभा चुनाव के लिए नीमम निर्वाचन क्षेत्र से पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल किया। इस अवसर पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी उनके समर्थन में उपस्थित थे। पत्रकारों से बातचीत में चंद्रशेखर ने भजनलाल शर्मा की उपस्थिति के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि वे नीमम के विकास के लिए अथक प्रयास करेंगे। चंद्रशेखर ने कहा कि राजस्थान के मुख्यमंत्री का मैं तहे दिल से आभारी हूं, जो यहां आए और नामांकन दाखिल करने के दौरान मेरा साथ दिया और मेरा समर्थन किया। मैं उन सभी सैकड़ों-हजारों कार्यकर्ताओं का भी आभारी हूं जो मेरे साथ आए हैं, नीमम और तिरुवनंतपुरम के लोगों का भी, जो आज मेरे साथ हैं। इससे मेरा दिल आशा और स्नेह से भर गया है और उन जिम्मेदारियों को और मजबूत करता है जिन्हें मैं निभाने की योजना बना रहा हूं। मैं जनता से वादा कर सकता हूं कि अगर वे मुझे मौका देंगे, तो मैं सभी समस्याओं को हल करने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा, नीमम में विकास लाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा और नीमम को केरल का एक आदर्श निर्वाचन क्षेत्र बनाने के लिए साल के 365 दिन, 24 घंटे कड़ी मेहनत करूंगा।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह है और हमें विश्वास है कि हम यहां जीत हासिल करेंगे।
आज मैं केरल आया हूं। मैं देख रहा हूं कि भाजपा कार्यकर्ताओं में जोश और उत्साह है... मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि केरल में कई नई चीजें होने वाली हैं। भाजपा यहां शानदार प्रदर्शन करेगी और जीत हासिल करेगी। भाजपा यहां एक बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। भाजपा केरल में एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है, जहां परंपरागत रूप से मुख्य मुकाबला सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) के बीच रहा है। दोनों गठबंधन राज्य में सत्ता बरकरार रखने या फिर से हासिल करने का लक्ष्य रख रहे हैं।
इससे पहले शुक्रवार को, केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने पिछले एक दशक में हुई प्रशासनिक विफलताओं का हवाला देते हुए विधानसभा में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की मजबूत उपस्थिति की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने एनडीए उम्मीदवारों से प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करने का आह्वान किया।
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पश्चिम बंगाल की सियासत इस वक्त उबाल पर है और चुनावी मैदान अब सीधे धर्म, पहचान और प्रभाव की जंग में बदल चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी के बीच छिड़ी यह टक्कर अब केवल वोटों की लड़ाई नहीं रही, बल्कि यह प्रतीकों, भावनाओं और नैरेटिव की निर्णायक भिड़ंत बन गई है। खासतौर पर बंगाल की सियासत में आज का दिन काफी महत्वपूर्ण रहा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईद मनाई तो वहीं उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी शुभेन्दु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर जाकर माता के चरणों में माथा टेका। ममता की और शुभेन्दु की आज की तस्वीरें अपने अपने मतदाताओं के लिए बड़ा संदेश है।
देखा जाये तो ईद के मौके पर ममता बनर्जी का नमाज में शामिल होना कोई सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। यह एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था, जिसके जरिए उन्होंने सीधे तौर पर भाजपा और केंद्र सरकार पर हमला बोला। अपने भाषण में उन्होंने मतदाता अधिकारों की रक्षा की बात करते हुए चुनाव आयोग तक पर सवाल खड़े कर दिए। यह बयान साफ संकेत देता है कि ममता अब खुद को केवल नेता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षक के रूप में पेश करना चाहती हैं। ममता ने ईद की मुबारकबाद, अल्लाह का आशीर्वाद जैसे संदर्भों का उपयोग कर अल्पसंख्यक मतदाताओं को यह बताना चाहा कि टीएमसी ही उनकी हितैषी है। साथ ही ममता ने धार्मिक मंच से राजनीतिक भाषण देकर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को जिस तरह निशाने पर लिया उससे उन्होंने अपने पार्टी काडर को संदेश दिया कि वह पूरी मजबूती से मैदान में डटी हुई हैं।
दूसरी ओर, शुभेन्दु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर में पूजा अर्चना कर पूरी सियासत को एक अलग ही दिशा दे दी। उन्होंने खुलकर सनातन की जीत का नारा दिया और बंगाल में सत्ता परिवर्तन का दावा किया। मां काली से आशीर्वाद लेने की यह तस्वीर केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक संदेश थी कि भाजपा अब बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ेगी।
इन दोनों घटनाओं का समय और अंदाज बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ अल्पसंख्यक समुदाय को साधने की कोशिश, तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक पहचान को मजबूत करने का प्रयास। यही वह मोड़ है जहां बंगाल की सियासत खतरनाक रूप से ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती दिख रही है। अब साफ हो चुका है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल विकास, योजनाओं या वादों तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव अब पहचान की लड़ाई है, जहां हर तस्वीर, हर मंच और हर बयान एक बड़े राजनीतिक संदेश में बदल रहा है।
बंगाल की जनता के सामने अब सीधा सवाल है कि क्या वे इस धार्मिक और प्रतीकात्मक राजनीति के साथ जाएंगे या किसी अलग रास्ते की तलाश करेंगे। लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में बयानबाजी और तेज होगी, टकराव और गहरा होगा और बंगाल की राजनीति पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक रूप लेगी। देखा जाये तो यह चुनाव अब सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और प्रभाव की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।
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