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West Bengal की सियासत में आया जबरदस्त मोड़, Mamata Banerjee ने अल्लाह के आशीर्वाद की बात की, Suvendu Adhikari ने काली माँ की पूजा की

पश्चिम बंगाल की सियासत इस वक्त उबाल पर है और चुनावी मैदान अब सीधे धर्म, पहचान और प्रभाव की जंग में बदल चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी के बीच छिड़ी यह टक्कर अब केवल वोटों की लड़ाई नहीं रही, बल्कि यह प्रतीकों, भावनाओं और नैरेटिव की निर्णायक भिड़ंत बन गई है। खासतौर पर बंगाल की सियासत में आज का दिन काफी महत्वपूर्ण रहा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईद मनाई तो वहीं उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी शुभेन्दु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर जाकर माता के चरणों में माथा टेका। ममता की और शुभेन्दु की आज की तस्वीरें अपने अपने मतदाताओं के लिए बड़ा संदेश है।

देखा जाये तो ईद के मौके पर ममता बनर्जी का नमाज में शामिल होना कोई सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। यह एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था, जिसके जरिए उन्होंने सीधे तौर पर भाजपा और केंद्र सरकार पर हमला बोला। अपने भाषण में उन्होंने मतदाता अधिकारों की रक्षा की बात करते हुए चुनाव आयोग तक पर सवाल खड़े कर दिए। यह बयान साफ संकेत देता है कि ममता अब खुद को केवल नेता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षक के रूप में पेश करना चाहती हैं। ममता ने ईद की मुबारकबाद, अल्लाह का आशीर्वाद जैसे संदर्भों का उपयोग कर अल्पसंख्यक मतदाताओं को यह बताना चाहा कि टीएमसी ही उनकी हितैषी है। साथ ही ममता ने धार्मिक मंच से राजनीतिक भाषण देकर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को जिस तरह निशाने पर लिया उससे उन्होंने अपने पार्टी काडर को संदेश दिया कि वह पूरी मजबूती से मैदान में डटी हुई हैं।

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दूसरी ओर, शुभेन्दु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर में पूजा अर्चना कर पूरी सियासत को एक अलग ही दिशा दे दी। उन्होंने खुलकर सनातन की जीत का नारा दिया और बंगाल में सत्ता परिवर्तन का दावा किया। मां काली से आशीर्वाद लेने की यह तस्वीर केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक संदेश थी कि भाजपा अब बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ेगी।

इन दोनों घटनाओं का समय और अंदाज बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ अल्पसंख्यक समुदाय को साधने की कोशिश, तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक पहचान को मजबूत करने का प्रयास। यही वह मोड़ है जहां बंगाल की सियासत खतरनाक रूप से ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती दिख रही है। अब साफ हो चुका है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल विकास, योजनाओं या वादों तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव अब पहचान की लड़ाई है, जहां हर तस्वीर, हर मंच और हर बयान एक बड़े राजनीतिक संदेश में बदल रहा है।

बंगाल की जनता के सामने अब सीधा सवाल है कि क्या वे इस धार्मिक और प्रतीकात्मक राजनीति के साथ जाएंगे या किसी अलग रास्ते की तलाश करेंगे। लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में बयानबाजी और तेज होगी, टकराव और गहरा होगा और बंगाल की राजनीति पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक रूप लेगी। देखा जाये तो यह चुनाव अब सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और प्रभाव की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।

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बाहर जाकर मुस्लिम देशों से दोस्ती, देश के अंदर मुसलमानों के साथ भेदभाव, ईद समारोह से ममता बनर्जी ने पीएम मोदी को घुसपैठिया बताते हुए साधा निशाना

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपना तीखा हमला बोलते हुए उन्हें "सबसे बड़ा घुसपैठिया" बताया और चेतावनी दी कि राज्य को निशाना बनाने वालों को नरक में जाना पड़ेगा। शनिवार को ईद के एक कार्यक्रम में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए ममता ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) बंगाल में अगले महीने होने वाले चुनावों को प्रभावित करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है। ममता बनर्जी ने कहा कि जो लोग बंगाल को निशाना बनाएंगे, वे नरक में जाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार सबसे बड़े घुसपैठिए हैं। बंगाल चुनावों से पहले अवैध अप्रवासन एक अहम मुद्दा बनकर उभरा है, और प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों का कहना है कि बड़े पैमाने पर घुसपैठ ने राज्य की जनसंख्या संरचना को बदल दिया है।
भाजपा ने ममता बनर्जी पर तुरंत पलटवार करते हुए कहा कि उनकी टिप्पणियों से चुनाव हारने का उनका अत्यधिक भय झलकता है। भाजपा नेता शिशिर बाजोरिया ने कहा जो कोई भी देश के प्रधानमंत्री को घुसपैठिया कहता है, उसे संवैधानिक पद पर रहने का अधिकार नहीं है।

ममता बनर्जी ने मोदी पर क्या कहा?

लगातार चौथी बार सत्ता में आने की उम्मीद कर रही तेजतर्रार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घुसपैठ के मुद्दे को एसआईआर (SIR) प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश की, जो चुनावों से पहले एक बड़ा विवाद का मुद्दा बन गई है। एसआईआर प्रक्रिया के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 63 लाख से अधिक नाम हटाए गए, जो कुल मतदाताओं का 9% है। 60 लाख से अधिक मतदाताओं को विचाराधीन रखा गया है। चुनाव आयोग द्वारा संचालित इस प्रक्रिया की कड़ी आलोचना करते हुए ममता बनर्जी ने भाजपा पर लोगों के "मतदान अधिकार छीनने" का आरोप लगाया। हम मोदी और भाजपा को आपके मतदान के अधिकार छीनने नहीं देंगे। एसआईआर के दौरान कई नाम हटा दिए गए। मैंने कोलकाता से दिल्ली तक लड़ाई लड़ी थी,” तृणमूल सुप्रीमो ने जनवरी में सुप्रीम कोर्ट में इस प्रक्रिया के खिलाफ अपनी दलील पेश करते हुए गरजते हुए कहा। उन्होंने यह भी नारा दिया, भाजपा हटाओ, देश बचाओ।

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  Sports

Pakistan Cricket का सच! Gary Kirsten बोले- हारते ही Coach को बलि का बकरा बना देते हैं

पाकिस्तान के पूर्व श्वेत-गेंद क्रिकेट के मुख्य कोच गैरी कर्स्टन ने हाल ही में टीम से अपने इस्तीफे के बारे में बात की। उन्होंने टीम के भीतर के माहौल को कठिन बताया। उन्होंने कार्य संस्कृति को विषाक्त बताते हुए टीम के भीतर सम्मान और शिष्टाचार की कमी की बात कही। यह दिलचस्प बात है कि गैरी कर्स्टन ने अक्टूबर 2024 में पाकिस्तान के श्वेत-गेंद क्रिकेट के मुख्य कोच पद से इस्तीफा दे दिया, जबकि उनका कार्यकाल शुरू हुए महज छह महीने ही बीते थे और उन्होंने एक भी वनडे मैच नहीं खेला था।
 

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टॉकस्पोर्ट क्रिकेट को दिए एक साक्षात्कार में कर्स्टन ने कहा कि जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया, वह थी हस्तक्षेप का स्तर। मुझे नहीं लगता कि मैंने इससे पहले कभी इस स्तर का हस्तक्षेप देखा है। क्या इसने मुझे चौंकाया? मैं नहीं जानता, लेकिन यह काफी महत्वपूर्ण था। इसके अलावा, कर्स्टन ने बताया कि जब भी कुछ गड़बड़ होती थी, कोचिंग स्टाफ को तुरंत बलि का बकरा बना दिया जाता था। उन्होंने बताया कि लगातार बाहरी शोर-शराबे से प्रभावित होकर टीम का मार्गदर्शन करना कितना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने बोर्ड से यह भी सवाल किया कि अगर वे हर मोड़ पर कोच को ही दोष देते हैं, तो कोच की भर्ती क्यों करते हैं।
 

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कर्स्टन ने कहा कि जब बाहर से लगातार शोर-शराबा होता रहता है, तो कोच के लिए आकर खिलाड़ियों के साथ काम करने का तरीका खोजना बहुत मुश्किल होता है। यह कठिन था और खराब प्रदर्शन वगैरह को लेकर कई दंडात्मक कार्रवाई की जाती थीं। उन्होंने आगे कहा कि एक कोच के तौर पर, जब टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही होती है, तो आप सबसे आसान निशाना होते हैं, इसलिए ‘चलो कोच को हटा देते हैं’ या ‘चलो कोच पर प्रतिबंध लगा देते हैं’, क्योंकि टीम के खराब प्रदर्शन के समय यही सबसे आसान काम होता है—और मेरी राय में यह उल्टा असर डालता है। फिर कोच की भर्ती क्यों करते हैं?
Sat, 21 Mar 2026 17:17:38 +0530

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