राज्यसभा सांसद और देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ कज़गम (डीएमडीके) के कोषाध्यक्ष एलके सुधीश ने विश्वास व्यक्त किया कि द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के नेतृत्व वाला गठबंधन आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में निर्णायक जीत हासिल करेगा, और भविष्यवाणी की कि गठबंधन 200 से अधिक सीटें जीतेगा। उन्होंने विपक्ष की आलोचना करते हुए दावा किया कि अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (एआईएडीएमके) चुनावों में पूरी तरह से हार की ओर बढ़ रही है।
तिरुप्पत्तूर जिले के अंबूर के पास रमज़ान की विशेष नमाज़ में शामिल होने के बाद मीडिया से बात करते हुए सुधीश ने कहा कि डीएमडीके के गठबंधन में शामिल होने से पहले भी डीएमके लगभग 200 सीटें जीतने की मजबूत स्थिति में थी। हमारे समर्थन से गठबंधन आसानी से इस आंकड़े को पार कर जाएगा। एआईएडीएमके को चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ेगा। रमज़ान की नमाज़ में 30,000 से अधिक लोग शामिल हुए, जिसके बाद सुधीश ने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों का अभिवादन किया। अंबूर के विधायक वी विल्वनथन और डीएमके के कई नेता भी उपस्थित थे।
सीट बंटवारे की व्यवस्था के संबंध में सुधीश ने कहा कि डीएमडीके और डीएमके के बीच बातचीत जारी है और बातचीत पूरी होने के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा। अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) के संभावित चुनावी प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर सुधीश ने स्वीकार किया कि पार्टी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। भारत निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल को एक ही चरण में होंगे और मतगणना 4 मई को होगी। ये चुनाव 234 सदस्यीय विधानसभा के लिए होंगे, जिसका वर्तमान कार्यकाल 10 मई को समाप्त हो रहा है।
मुख्य मुकाबला डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन और एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के बीच होने की आशंका है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और पट्टाली मक्कल कच्ची (पीएमके) भी शामिल हैं। अभिनेता कमल हासन के नेतृत्व वाली मक्कल नीधि मय्यम (एमएनएम) भी डीएमके के साथ सीट बंटवारे को लेकर बातचीत कर रही है, जो चुनावों से पहले एक व्यापक गठबंधन रणनीति का संकेत देता है।
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काबुल पर बरसी आग, पाकिस्तान का हमला और भारत की मानवीय मदद, यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर का खतरनाक संकेत है। सोलह मार्च की रात, जब रमजान का पाक महीना चल रहा था और लोग इबादत में डूबे थे, उसी समय पाकिस्तान की वायु सेना ने काबुल के एक नशा मुक्ति केंद्र पर बम बरसाकर इंसानियत को शर्मसार कर दिया। इस हमले में चार सौ से अधिक लोग मारे गए और ढाई सौ से ज्यादा घायल हुए। यह कोई साधारण लक्ष्य नहीं था, बल्कि दो हजार बिस्तरों वाला वह केंद्र था जहां समाज के सबसे कमजोर और बेबस लोग इलाज करा रहे थे।
यह हमला सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं था, यह एक सुनियोजित संदेश था कि क्षेत्र में अस्थिरता को और भड़काया जाएगा। पाकिस्तान की यह कार्रवाई उसकी रणनीतिक बेचैनी और आक्रामक नीति का खुला प्रदर्शन है। नागरिकों को निशाना बनाना, वह भी एक चिकित्सा केंद्र में, अंतरराष्ट्रीय मानकों और मानवीय मूल्यों की खुली अवहेलना है।
लेकिन इस भयावह तबाही के बीच भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह केवल ताकत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी नाम है। हमले के चार दिन के भीतर ही भारत ने काबुल के लिए ढाई टन आपातकालीन चिकित्सा सहायता भेज दी। इसमें जरूरी दवाइयां, उपचार सामग्री, उपकरण और राहत किट शामिल थे। यह कदम केवल राहत नहीं, बल्कि एक मजबूत कूटनीतिक संदेश भी है।
भारत ने साफ शब्दों में कहा कि वह अफगान जनता के साथ खड़ा है और इस कठिन समय में हर संभव मानवीय सहायता देता रहेगा। यह बयान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत भारत लंबे समय से अफगानिस्तान के स्वास्थ्य और पुनर्निर्माण में सहयोग करता रहा है। खासकर नशे की समस्या से जूझ रहे अफगान समाज के लिए यह सहायता बेहद महत्वपूर्ण है।
रणनीतिक नजरिये से देखें तो यह घटनाक्रम कई स्तरों पर गहरी अहमियत रखता है। एक तो पाकिस्तान का यह हमला क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सीधा खतरा है। इससे यह संकेत मिलता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर जाकर भी सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचक रहा। साथ ही, इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान की छवि को और धूमिल किया है। नागरिकों पर हमला किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।
इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत की भूमिका है। भारत ने बिना किसी शोर शराबे के, बिना राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश के, सीधे मानवीय सहायता पहुंचाकर यह दिखा दिया कि वह क्षेत्र में जिम्मेदार शक्ति है। यह कदम भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करता है और अफगानिस्तान के साथ उसके रिश्तों को और गहरा बनाता है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह हमला ऐसे समय हुआ जब अफगानिस्तान पहले ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और नशे की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में एक नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाना स्थिति को और भयावह बना देता है। बचाव दल कई दिनों तक मलबे से शव निकालते रहे, आग की लपटें और चीखें इस त्रासदी की भयावहता को बयान करती रहीं।
भारत की त्वरित प्रतिक्रिया यह भी दर्शाती है कि वह केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय और संवेदनशील कूटनीति पर काम करता है। यह कदम पाकिस्तान के आक्रामक रवैये के मुकाबले एक नैतिक और रणनीतिक संतुलन स्थापित करता है।
इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक संदेश साफ है: जहां एक ओर पाकिस्तान अपनी नीतियों से क्षेत्र को अस्थिर कर रहा है, वहीं भारत मानवीय सहयोग और जिम्मेदारी के जरिए भरोसा और स्थिरता का आधार तैयार कर रहा है। आने वाले समय में यह अंतर और स्पष्ट होगा कि कौन सा देश विनाश की राह पर है और कौन निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
काबुल की इस त्रासदी ने दुनिया को झकझोर दिया है, लेकिन साथ ही यह भी दिखा दिया है कि संकट की घड़ी में असली नेतृत्व कैसा होता है। भारत ने फिर साबित किया है कि वह केवल एक देश नहीं, बल्कि एक सोच है जो मानवता को सबसे ऊपर रखती है।
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