काबुल पर बरसी आग, पाकिस्तान का हमला और भारत की मानवीय मदद, यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर का खतरनाक संकेत है। सोलह मार्च की रात, जब रमजान का पाक महीना चल रहा था और लोग इबादत में डूबे थे, उसी समय पाकिस्तान की वायु सेना ने काबुल के एक नशा मुक्ति केंद्र पर बम बरसाकर इंसानियत को शर्मसार कर दिया। इस हमले में चार सौ से अधिक लोग मारे गए और ढाई सौ से ज्यादा घायल हुए। यह कोई साधारण लक्ष्य नहीं था, बल्कि दो हजार बिस्तरों वाला वह केंद्र था जहां समाज के सबसे कमजोर और बेबस लोग इलाज करा रहे थे।
यह हमला सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं था, यह एक सुनियोजित संदेश था कि क्षेत्र में अस्थिरता को और भड़काया जाएगा। पाकिस्तान की यह कार्रवाई उसकी रणनीतिक बेचैनी और आक्रामक नीति का खुला प्रदर्शन है। नागरिकों को निशाना बनाना, वह भी एक चिकित्सा केंद्र में, अंतरराष्ट्रीय मानकों और मानवीय मूल्यों की खुली अवहेलना है।
लेकिन इस भयावह तबाही के बीच भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह केवल ताकत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी नाम है। हमले के चार दिन के भीतर ही भारत ने काबुल के लिए ढाई टन आपातकालीन चिकित्सा सहायता भेज दी। इसमें जरूरी दवाइयां, उपचार सामग्री, उपकरण और राहत किट शामिल थे। यह कदम केवल राहत नहीं, बल्कि एक मजबूत कूटनीतिक संदेश भी है।
भारत ने साफ शब्दों में कहा कि वह अफगान जनता के साथ खड़ा है और इस कठिन समय में हर संभव मानवीय सहायता देता रहेगा। यह बयान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत भारत लंबे समय से अफगानिस्तान के स्वास्थ्य और पुनर्निर्माण में सहयोग करता रहा है। खासकर नशे की समस्या से जूझ रहे अफगान समाज के लिए यह सहायता बेहद महत्वपूर्ण है।
रणनीतिक नजरिये से देखें तो यह घटनाक्रम कई स्तरों पर गहरी अहमियत रखता है। एक तो पाकिस्तान का यह हमला क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सीधा खतरा है। इससे यह संकेत मिलता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर जाकर भी सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचक रहा। साथ ही, इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान की छवि को और धूमिल किया है। नागरिकों पर हमला किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।
इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत की भूमिका है। भारत ने बिना किसी शोर शराबे के, बिना राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश के, सीधे मानवीय सहायता पहुंचाकर यह दिखा दिया कि वह क्षेत्र में जिम्मेदार शक्ति है। यह कदम भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करता है और अफगानिस्तान के साथ उसके रिश्तों को और गहरा बनाता है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह हमला ऐसे समय हुआ जब अफगानिस्तान पहले ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और नशे की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में एक नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाना स्थिति को और भयावह बना देता है। बचाव दल कई दिनों तक मलबे से शव निकालते रहे, आग की लपटें और चीखें इस त्रासदी की भयावहता को बयान करती रहीं।
भारत की त्वरित प्रतिक्रिया यह भी दर्शाती है कि वह केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय और संवेदनशील कूटनीति पर काम करता है। यह कदम पाकिस्तान के आक्रामक रवैये के मुकाबले एक नैतिक और रणनीतिक संतुलन स्थापित करता है।
इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक संदेश साफ है: जहां एक ओर पाकिस्तान अपनी नीतियों से क्षेत्र को अस्थिर कर रहा है, वहीं भारत मानवीय सहयोग और जिम्मेदारी के जरिए भरोसा और स्थिरता का आधार तैयार कर रहा है। आने वाले समय में यह अंतर और स्पष्ट होगा कि कौन सा देश विनाश की राह पर है और कौन निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
काबुल की इस त्रासदी ने दुनिया को झकझोर दिया है, लेकिन साथ ही यह भी दिखा दिया है कि संकट की घड़ी में असली नेतृत्व कैसा होता है। भारत ने फिर साबित किया है कि वह केवल एक देश नहीं, बल्कि एक सोच है जो मानवता को सबसे ऊपर रखती है।
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एक तरफ है होर्मुज जलडमरू मध्य और दूसरी ओर है लाल सागर से होते हुए बाब अलमंडे। एक के तट पर बसा है ईरान तो दूसरे के तट पर यमन। होर्मुज को फिलहाल ईरान ने बंद रखा है और जिसे वह चाहे उसी जहाज को गुजरने दे रहा है। लेकिन अब संकट मंडराने लगे हैं लाल सागर के बंद होने के भी। जी हां, होमस की तरह लाल सागर और बाब अलमंडे भी तेल और दूसरे व्यापार का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां से पूरी दुनिया एक भीषण महायुद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी की आहट सुन रही है। पिछले कई दिनों से ईरान पर अमेरिका और इसराइल के साझा हमले जारी हैं जिसके जवाब में ईरान ने ना केवल अपनी पूरी सैन्य शक्ति झोंक दी है बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होमस जलडमरू मध्य को भी बंद कर दिया है। इस बीच यमन के होती विद्रोहियों के युद्ध में सीधे कूदने की धमकी ने पूरी दुनिया की सांसे रोक दी है। 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका और इसराइल के संयुक्त सैन्य अभियान ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने ईरान के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसराइली वायुसेना के स्टील्स विमानों और अमेरिकी नौसेना के मिसाइलों ने तेहरान, इसान और नतंज स्थित ईरान के परमाणु केंद्रों और मिसाइल गोदामों को निशाना बनाया है। इन हमलों में ईरान के शीर्ष नेतृत्व को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन दूसरी ओर ईरान ने ऐसी जवाबी कारवाई की है जिससे पूरा मिडिल ईस्ट इस वक्त डर के साए में जी रहा है। ईरान ने इसराइल को तो निशाना बनाया ही लेकिन साथ ही साथ अपने पड़ोसी देश जहां अमेरिका के सैन्य बेस मौजूद हैं उन्हें भी जबरदस्त मिसाइलों से दहला दिया।
ईरान ने जवाबी कारवाही करते हुए इसराइल के तेल अभी और हाइफा जैसे शहरों पर सैकड़ों हाइपरसोनिक मिसाइलें दागी। साथ ही खारी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी आत्मघाती ड्रोंस ने कहर बरपाया। इस युद्ध में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब यमन के होती विद्रोहियों ने आधिकारिक बयान जारी कर ईरान के समर्थन में मोर्चा खोल दिया। हुतियों ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान पर हमले तुरंत नहीं रोके गए तो वे लाल सागर और रणनीतिक बाब अलमंडेव जलडमरू मध्य को पूरी तरह से बंद कर देंगे। हुतियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे लाल सागर से गुजरने वाले हर उस जहाज को निशाना बनाएंगे जो अमेरिका, इसराइल या उनके समर्थकों से जुड़ा होगा। उनके पास मौजूद आधुनिक ईरानी एंटीशिप मिसाइलें और पानी के नीचे चलने वाले ड्रोंस जिन्हें यूवीस भी कहते हैं इस खतरे को वास्तविक और विनाशकारी बना रहे हैं। दुनिया के लिए सबसे डरावनी स्थिति इन दो समुद्री रास्तों यानी होमस और लाल सागर का एक साथ बंद होना है। होरमोस से दुनिया का लगभग 20% और लाल सागर से 12% तेल गुजरता है। इन रास्तों के बंद होने का मतलब है कि दुनिया का 1/3 तेल बाजार से गायब हो जाएगा।
आज कच्चे तेल की कीमतें $130 प्रति बैरल के पार जा रही हैं जो आगे आने वाले समय में और ज्यादा बढ़ सकती हैं। लाल सागर स्वेज नहर का प्रवेश द्वार है और अगर यह बंद होता है तो इससे चीन, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप जाने वाला सारा व्यापार ठप हो सकता है। हूतियों की धमकी ने वाशिंगटन और ब्रिसल्स में हड़कंप मचा दिया है। अगर हूती लाल सागर को ब्लॉक करते हैं तो अमेरिका को यमन में जमीनी कारवाई करनी पड़ सकती है जो एक लंबे और खूनी युद्ध की शुरुआत होगी। दूसरी ओर रूस और चीन ने इस स्थिति के लिए अमेरिका की एक तरफा नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। पश्चिमी एशिया में फिलहाल कूटनीतिक रास्ते बंद नजर आ रहे हैं और सैन्य कारवाही तेज होती जा रही है। अगर होती विद्रोहियों ने अपनी धमकी को अमली जामा पहनाया तो दुनिया को एक ऐसी आर्थिक सुनामी का सामना करना पड़ेगा जिसे संभालना किसी भी देश के लिए मुमकिन नहीं होगा।
अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया यह सोचकर कि ईरान घुटनों पर आ जाएगा लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा ईरान ने जवाबी कारवाई की और इस कारवाही में जख्म मिल रहे हैं उसके पड़ोसी देशों को वो पड़ोसी देश जो अमेरिका को अपनी एक ढाल समझते थे हाल ही में कतर क़तर के गैस प्लांट पर हुए ईरानी हमलों ने कतर की एलएजी निर्यात क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इस हमले के कारण क़तर की 17% एलएजी निर्यात क्षमता तबाह हो गई है। जिससे उत्पादन अगले 5 वर्षों तक ठप रहने की आशंका है। देश की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी क़तर एनर्जी के सीईओ साद अलकाबी के अनुसार इन हमलों से सालाना लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।
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