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कौन है 'जिंदा शहीद', जिसकी ईरान युद्ध में हुई एंट्री

ईरान की राजधानी तेहरान में हुए एक बड़े हवाई हमले में वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी अली लारजानी की मौत के बाद देश की राजनीति और सुरक्षा ढांचे में हलचल तेज हो गई है. इस घटना ने न केवल सत्ता संतुलन को प्रभावित किया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि अब ईरान की रणनीतिक कमान किसके हाथों में जाएगी.  इस बीच ईरान युद्ध में ही एक जिंदा शहीद की एंट्री हो गई है. इस जिंदा शहीद की एंट्री से हड़कंप भी मचा हुआ है. आइए जानते हैं कि आखिर ये जिंदा शहीद कौन है जो ईरान युद्ध में अचानक लारजानी का अधूरा काम पूरा करेगा. 

ईरान में इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है ये नाम है सईद जलीली. इन्हें “जिंदा शहीद” कहा जाता है. बताया जा रहा है कि अब सईद जलीली ही ईरान युद्ध की कमान या फिर यूं कहें लारजानी का अधूरा काम पूरा करेंगे. 

लारिजानी की मौत के बाद पैदा हुआ नेतृत्व संकट

अली लारजानी ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख थे और देश की सुरक्षा, परमाणु नीति और विदेश रणनीति के मुख्य चेहरे माने जाते थे.  उनकी मौत के बाद ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे नेता को चुनने की है, जो अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव, आंतरिक असंतोष और क्षेत्रीय संकटों को संभाल सके. विश्लेषकों का मानना है कि इस खालीपन को भरने के लिए ईरान अब एक मजबूत और सख्त रुख वाले नेता की ओर बढ़ सकता है.

कौन हैं सईद जलीली?

सईद जलीली ईरान के प्रमुख रूढ़िवादी नेताओं में गिने जाते हैं. उनका जन्म 1965 में मशहद में हुआ था. उन्होंने इमाम सादिक यूनिवर्सिटी से राजनीतिक विज्ञान में पीएचडी की और बाद में वहीं अध्यापन भी किया. जलीली 2007 से 2013 के बीच ईरान के प्रमुख परमाणु वार्ताकार रहे और उन्होंने पश्चिमी देशों के साथ बातचीत का नेतृत्व किया. हालांकि, वे अपने सख्त और समझौता न करने वाले रुख के लिए जाने जाते हैं.

'जिंदा शहीद' की कहानी

सईद जलीली को “जिंदा शहीद” कहा जाता है और इसके पीछे एक गहरी कहानी है. उन्होंने इरान-इराक युद्ध के दौरान सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. इस युद्ध में उन्होंने अपना एक पैर खो दिया, लेकिन इसके बावजूद वे देश की सेवा में सक्रिय रहे.

ईरान में ऐसे सैनिकों को, जिन्होंने युद्ध में गंभीर बलिदान दिया हो, “जिंदा शहीद” का दर्जा दिया जाता है. यह उपाधि न केवल सम्मान का प्रतीक है, बल्कि देशभक्ति और त्याग का भी संकेत है.

सख्त रुख और राजनीतिक प्रभाव

सईद जलीली को ईरान के हार्डलाइनर नेताओं में गिना जाता है. वे 2015 के परमाणु समझौते के आलोचक रहे हैं और पश्चिमी देशों के प्रति सख्त नीति के समर्थक हैं. उन्होंने 2013 में राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा था, जहां वे तीसरे स्थान पर रहे. इसके बावजूद उनका प्रभाव कम नहीं हुआ और वे आज भी ईरान की सत्ता संरचना में एक मजबूत आवाज बने हुए हैं.

क्या जलीली बनेंगे अगला सुरक्षा प्रमुख?

विशेषज्ञों का मानना है कि सईद जलीली को अली लारजानी की जगह सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का प्रमुख बनाया जा सकता है. अगर ऐसा होता है, तो ईरान की विदेश और सुरक्षा नीति और अधिक कठोर हो सकती है. खासकर अमेरिका और क्षेत्रीय विरोधियों के प्रति देश का रुख और सख्त होने की संभावना है.

मध्य पूर्व पर संभावित असर

जलीली जैसे नेता के नेतृत्व में ईरान की रणनीति में बदलाव पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित कर सकता है. इससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका है और कूटनीतिक प्रयासों पर भी असर पड़ सकता है. कुल मिलाकर, 'जिंदा शहीद' के रूप में पहचाने जाने वाले सईद जलीली अब ईरान की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाने की दहलीज पर खड़े हैं. आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि क्या वे वास्तव में देश की सुरक्षा कमान संभालते हैं या नहीं. 

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