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महाशक्तियों की जंग के बीच भारत की कूटनीति का दमदार प्रदर्शन, बन रहा है नया वैश्विक शक्ति संतुलन

21वीं सदी की वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा शक्ति संघर्ष अमेरिका और चीन के बीच तेजी से आकार ले रहा है। यह केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि सैन्य ताकत, तकनीकी वर्चस्व और भू रणनीतिक प्रभुत्व की निर्णायक होड़ है। वहीं इस महाशक्ति संघर्ष के बीच भारत एक बेहद संतुलित लेकिन आक्रामक कूटनीति गढ़ रहा है। भारत की रणनीति स्पष्ट है कि किसी गुट का पिछलग्गू बने बिना अपनी सामरिक ताकत को इतना मजबूत करना है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में वह निर्णायक शक्ति बन सके।

देखा जाये तो आज अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है। उसका रक्षा बजट लगभग 1000 अरब डॉलर के आसपास है। चीन लगभग 314 अरब डॉलर के सैन्य बजट के साथ दूसरे स्थान पर है और वह पिछले दो दशकों से अपनी सैन्य शक्ति को बेहद तेजी से विस्तार दे रहा है। भारत लगभग 80 से 85 अरब डॉलर के रक्षा बजट के साथ दुनिया के शीर्ष सैन्य खर्च करने वाले देशों में शामिल है। हालांकि बजट के लिहाज से भारत अभी दोनों महाशक्तियों से पीछे है, लेकिन उसकी रणनीतिक स्थिति और भौगोलिक ताकत उसे वैश्विक शक्ति संतुलन में बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।

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हम आपको बता दें कि भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है रणनीतिक स्वायत्तता। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी भी शक्ति खेमे में पूरी तरह शामिल हुए बिना अपने हितों के आधार पर निर्णय लेता है। यही कारण है कि एक ओर भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वॉड मंच में सक्रिय भूमिका निभाता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर चीन और रूस के साथ भी सहयोग बनाए रखता है। यह संतुलन आधारित नीति भारत को दोनों पक्षों के साथ काम करने की स्वतंत्रता देती है और उसे एक निर्णायक मध्य शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

इसके अलावा, हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है और चीन की समुद्री महत्वाकांक्षाओं के कारण यहां शक्ति संतुलन का सवाल बेहद संवेदनशील बन चुका है। चीन ने पिछले एक दशक में दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक अपनी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ाई है। इसके जवाब में भारत ने समुद्री रणनीति को अपनी सुरक्षा नीति का केंद्रीय स्तंभ बना दिया है।

हम आपको बता दें कि भारतीय नौसेना का तेजी से होता आधुनिकीकरण इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत अगले दस वर्षों में युद्धपोतों, पनडुब्बियों और समुद्री निगरानी तंत्र के विस्तार पर लगभग 40 अरब डॉलर खर्च करने की योजना पर काम कर रहा है। स्वदेशी विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत के शामिल होने से भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिनके पास विमान वाहक पोत बनाने की क्षमता है। इसके साथ ही अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सैन्य ढांचे का विस्तार हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक बढ़त को और मजबूत कर रहा है।

यह भी दिलचस्प तथ्य है कि किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में चीन अपनी कुल सैन्य शक्ति का सीमित हिस्सा ही हिंद महासागर में तैनात कर सकता है, क्योंकि उसका मुख्य सैन्य ढांचा प्रशांत क्षेत्र में केंद्रित है। इसके विपरीत भारत को भौगोलिक लाभ प्राप्त है और हिंद महासागर उसके लिए प्राकृतिक रणनीतिक क्षेत्र है। यही कारण है कि समुद्री शक्ति को मजबूत करना भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है।

भारत की सामरिक तैयारी केवल समुद्र तक सीमित नहीं है। हिमालयी सीमाओं पर भी बड़े पैमाने पर सैन्य ढांचे का विस्तार किया जा रहा है। लद्दाख संकट के बाद भारत ने सीमा सड़कों, सुरंगों, हवाई पट्टियों और उन्नत मिसाइल प्रणालियों का तेजी से निर्माण किया है। इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य संतुलन काफी हद तक भारत के पक्ष में मजबूत हुआ है।

इसके अलावा, तकनीकी क्षेत्र में भी भारत तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है। भारतीय सशस्त्र बलों में लगभग पंद्रह लाख सक्रिय सैनिक हैं, जबकि रिजर्व और अर्धसैनिक बलों को मिलाकर कुल सैन्य शक्ति पचास लाख से अधिक है। इसके साथ ही भारत ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष आधारित सैन्य तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है।

रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता भी भारत की रणनीतिक नीति का अहम हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा निर्यात को तेजी से बढ़ाया है और स्वदेशी हथियार निर्माण को प्रोत्साहन दिया है। इसका उद्देश्य केवल आयात पर निर्भरता कम करना नहीं बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा उद्योग का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।

इसके अलावा, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते टकराव में भारत की कूटनीति के प्रभाव केवल एशिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके व्यापक वैश्विक निहितार्थ भी सामने आ रहे हैं। भारत आज उस स्थिति में पहुंच चुका है जहां उसकी नीति विश्व शक्ति संतुलन को प्रभावित करने लगी है। यदि भारत अमेरिका के साथ गहरे सामरिक सहयोग को आगे बढ़ाता है तो हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन के विस्तार को रोकने वाला एक मजबूत संतुलन बन सकता है। दूसरी ओर यदि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए बहुध्रुवीय व्यवस्था को मजबूत करता है तो विश्व राजनीति में शक्ति का केंद्रीकरण कम होगा और कई क्षेत्रीय शक्तियों को उभरने का अवसर मिलेगा। ऊर्जा आपूर्ति मार्गों, वैश्विक व्यापार, तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत की भूमिका लगातार निर्णायक बन रही है। यही कारण है कि आज यूरोप, पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देश भारत को उस शक्ति के रूप में देख रहे हैं जो अमेरिका चीन प्रतिस्पर्धा के बीच वैश्विक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बहरहाल, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत की कूटनीति संतुलन की नीति है। भारत सीधे किसी शक्ति के खिलाफ खड़ा होने की बजाय अपनी सैन्य क्षमता, आर्थिक ताकत और तकनीकी शक्ति को मजबूत करते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि यही रणनीति आगे भी जारी रही तो आने वाले दशकों में अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा के बीच भारत केवल एक संतुलनकारी शक्ति नहीं रहेगा बल्कि वह वैश्विक राजनीति का वह निर्णायक केंद्र बन सकता है जो एशिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के शक्ति समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

-नीरज कुमार दुबे

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