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शक्तिशाली गठबंधन NATO की कमजोरी हुई उजागर, युद्ध में America पड़ा अकेला, तमाशबीन बना Europe

अमेरिका और इजराइल द्वारा छेड़ा गया ईरान युद्ध अब वैश्विक शक्ति संतुलन को हिलाने वाला भूचाल बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि पश्चिमी दुनिया का अहम स्तंभ माने जाने वाले यूरोपीय देश इस पूरे संकट में लगभग दर्शक बने बैठे हैं। सवाल उठता है कि आखिर क्यों वह अपने सबसे बड़े सहयोगी के साथ इस युद्ध में उतरने से बच रहे हैं?

देखा जाये तो फरवरी माह के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष ने मध्य पूर्व को आग के गोले में बदल दिया है। लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई के बीच हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि क्षेत्र में स्थिरता नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। इसके बावजूद यूरोप ने साफ तौर पर दूरी बना रखी है और यही दूरी अब पूरी दुनिया के लिए नई पहेली बन गई है।

देखा जाये तो यूरोप की इस दूरी का सबसे पहला कारण है कानूनी वैधता का संकट। यूरोप के कई बड़े देश मानते हैं कि इस युद्ध के लिए कोई स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय मंजूरी नहीं है। बिना किसी आधिकारिक स्वीकृति के सीधे युद्ध में कूदना उनके लिए न केवल जोखिम भरा है, बल्कि उनकी अपनी राजनीतिक साख पर भी सवाल खड़े कर सकता है। यही वजह है कि वह इस टकराव से खुद को दूर रखने में ही भलाई समझ रहे हैं।

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दूसरा बड़ा कारण है रणनीतिक अस्पष्टता। अमेरिका इस युद्ध में आखिर हासिल क्या करना चाहता है, यह अब तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाया है। क्या लक्ष्य केवल ईरान को कमजोर करना है, या वहां सत्ता परिवर्तन की योजना है, या फिर यह महज शक्ति प्रदर्शन है। जब तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तब तक यूरोप अपने सैनिकों और संसाधनों को दांव पर लगाने के लिए तैयार नहीं दिख रहा।

तीसरा और बेहद गंभीर कारण है ऊर्जा संकट का खतरा। ईरान की स्थिति ऐसी है कि वह वैश्विक तेल आपूर्ति को सीधे प्रभावित कर सकता है। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका सबसे बड़ा असर यूरोप की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रहे यूरोपीय देश इस जोखिम को और बढ़ाना नहीं चाहते।

उधर, अमेरिका लगातार अपने सहयोगियों पर दबाव बना रहा है कि वह इस युद्ध में शामिल हों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। लेकिन यूरोप की प्रतिक्रिया ठंडी और सतर्क है। कुछ देशों ने तो खुलकर इस युद्ध की आलोचना तक कर दी है। उन्होंने कहा है कि यह संघर्ष न केवल खतरनाक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को भी कमजोर करने वाला कदम है। यूरोप की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह युद्ध सीमित नहीं रहेगा। अगर ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। आतंकवाद, शरणार्थियों की लहर और क्षेत्रीय अराजकता सीधे यूरोप के दरवाजे तक पहुंच सकती है। पिछली बार के अनुभवों ने उन्हें पहले ही सावधान कर दिया है, इसलिए इस बार वह बिना सोचे समझे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते।

साथ ही इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिमी गठबंधन की एकता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक तरफ अमेरिका आक्रामक रुख अपनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ यूरोप संतुलित और दूरी बनाए रखने की नीति पर चल रहा है। यह अंतर साफ संकेत देता है कि अब वैश्विक राजनीति में पुराने समीकरण बदल रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी इस युद्ध के गंभीर असर दिखने लगे हैं। वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ रही है, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन भी इस बात का संकेत हैं कि आम जनता इस संघर्ष से खुश नहीं है।

देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम के दूरगामी असर बेहद गंभीर हो सकते हैं। एक तो इससे पश्चिमी एकता कमजोर होती नजर आ रही है। अगर यूरोप और अमेरिका के बीच यह दूरी बढ़ती है, तो वैश्विक स्तर पर उनके गठबंधन की विश्वसनीयता को झटका लग सकता है। साथ ही इस युद्ध से ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। अगर तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, खासकर उन देशों पर जो पहले से आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, ऐसे आसार नजर आ रहे हैं कि यह युद्ध लंबा खिंच सकता है क्योंकि जब सहयोगी ही पूरी तरह साथ नहीं हैं, तो किसी निर्णायक नतीजे तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। इससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ेगी। साथ ही वैश्विक व्यवस्था में बदलाव भी तय नजर आ रहा है। देश अब पुराने गठबंधनों से हटकर अपने हितों के अनुसार फैसले ले रहे हैं। यह संकेत है कि आने वाले समय में दुनिया और ज्यादा बंटी हुई नजर आ सकती है।

बहरहाल, यूरोप की खामोशी दरअसल उसकी मजबूरी और रणनीति दोनों का मिश्रण है। वह इस आग में कूदने से बच रहा है, लेकिन यह दूरी उसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकती। अगर यह युद्ध और फैलता है, तो इसकी लपटें यूरोप तक जरूर पहुंचेंगी। यानी फिलहाल यूरोप भले ही तमाशबीन बना बैठा हो, लेकिन आने वाला समय उसे भी इस संकट के केंद्र में खींच सकता है। यही इस पूरे संघर्ष की सबसे बड़ी सच्चाई है।

-नीरज कुमार दुबे

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