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अंतरराष्ट्रीय संदर्भ, वैश्विक व्यापार चुनौतियां और भारत की रणनीति

अमेरिका में 20 जनवरी 2025 को डोनाल्ड ट्रम्प ने 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से ही पूरी दुनिया में, विशेष रूप आर्थिक क्षेत्र में भारी उथल पुथल दिखाई दी है। ट्रम्प ने “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” - अमेरिका को पुनः महान बनायें - के नारे के साथ यह राष्ट्रपति चुनाव जीता था। अतः उन्होंने अमेरिका को एक बार पुनः विश्व के विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करने का बीड़ा उठाया है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर टैरिफ लगाने का निर्णय लेते हुए, इस निर्णय को शीघ ही लागू भी कर दिया। उनका सोचना था कि उनके इस निर्णय से विभिन्न उत्पादों के निर्यातक अमेरिका में इन उत्पादों को निर्यात करने के प्रति निरुत्साहित होकर इन उत्पादों का उत्पादन अमेरिका में ही प्रारम्भ कर देंगे। इस कार्य को यदि धीमे धीमे एवं संरचित रूप से किया जाता तो सम्भव है कि पूरे विश्व में अफरा तफरी जैसा माहौल नहीं बनता। परंतु, ट्रम्प ने कुछ देशों (चीन, आदि) से विभिन्न वस्तुओं के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी एवं अन्य देशों को भी लगातार इस प्रकार की धमकी देना प्रारम्भ कर दिया। 

ट्रम्प ने भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर भी 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया एवं 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ यह कहते हुए लगाया कि भारत, रूस से कच्चे तेल का आयात करता है एवं इसे प्रसंस्कृत करने के उपरांत यूरोपीय देशों को पेट्रोल एवं डीजल के रूप में निर्यात करता है। इस प्रक्रिया में ट्रम्प ने यह निष्कर्ष निकाला भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल को खरीदने से रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले को बल मिलता है और भारत इस युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंडिंग कर रहा है। इस प्रकार, भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर दिनांक 27 अगस्त 2025 से 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया गया है। इससे भारत के पूंजी (शेयर) बाजार में हाहाकर मच गया एवं विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारत से अपने निवेश को निकाल रहे हैं।

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ट्रम्प अमेरिका में होने वाले विभिन्न वस्तुओं के आयात पर लगाए गए टैरिफ पर ही नहीं रुके बल्कि अपनी साम्राज्यवादी सोच को पुनः लागू करने के उद्देश्य को भी स्पष्ट रूप से झलका दिया। प्रभुतासम्पन्न देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका में लाया गया एवं उन पर अमेरिका में मुकदमा चलाया गया। दरअसल, अमरीका की नजर वेनेजुएला के कच्चे तेल के अपार भंडार पर है। जिस पर अमेरिका अपना कब्जा स्थापित करते हुए इसके उपयोग पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। साथ ही, डेनमार्क के नियंत्रण में एक द्वीप, ग्रीनलैंड पर अमेरिका अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता है। इसी प्रकार की धमकियां, मेक्सिको, क्यूबा, ईरान आदि देशों को भी दी गई हैं। 

ट्रम्प के उक्त प्रकार के निर्णयों के चलते अब तो वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के बीच आपसी सम्बंधो पर प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत भी अछूता नहीं रहा है एवं हाल ही के समय में भारत के अमेरिका के साथ सम्बन्धों में कुछ खटास आई है। अन्यथा, कुछ समय पूर्व तक भारत एवं अमेरिका एक दूसरे के रणनीतिक साझेदार माने जाते रहे हैं। विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा साझीदार रहा है। भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात के मामले में भी अमेरिका प्रथम स्थान पर हैं। श्री ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लागू किए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के उपरांत भारत का विदेश व्यापार कुछ हद्द तक विपरीत रूप से प्रभावित हुआ है। परंतु, भारत ने इस समस्या का हल निकालने की रणनीति पर तुरंत विचार करना प्रारम्भ किया एवं कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए। ताकि, विशेष रूप अमेरिका को होने वाले वस्त्र एवं परिधान, जेम्स एवं ज्वेलरी, समुद्रीय पदार्थ, खिलौना उद्योग एवं चमड़ा उद्योग जैसे श्रम आधारित उद्योगों पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को तुरंत ही रोका जा सके अथवा कम किया जा सके। अन्यथा, की स्थिति में भारत में बेरोजगारी की समस्या एक ज्वलंत समस्या के रूप खड़ी हो सकती थी। भारत ने उक्त उत्पादों के निर्यात हेतु रूस, चीन, जापान, आस्ट्रेलिया एवं यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के रूप में नए बाजार तलाशे एवं इन देशों को उक्त उत्पादों का निर्यात प्रारम्भ किया। वर्ष 2025 में भारत ने विदेशी व्यापार परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों पर गहन वार्ताओं और रणनीतिक अद्यतनों को अंतिम रूप देने का प्रयास किया है। वर्ष के अंत में, भारत ने यूनाइटेड किगडम, ओमान एवं न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए। इसके साथ ही, अफ्रीकी देशों एवं लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भी प्रारम्भिक वार्ताओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि नवम्बर एवं दिसम्बर 2025 माह में भारत से विभिन्न वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि दर को बनाए रखने में सफलता मिली है। सितम्बर एवं अक्टोबर 2025 माह में विशेष रूप से अमेरिका को भारत से होने वाले वस्तुओं के निर्यात पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ा था। 27 जनवरी 2026 को तो भारत ने यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देकर इतिहास ही बना डाला है। इस समझौते को “मदर आफ ऑल डील्स” की संज्ञा दी जा रही है। यह मुक्त व्यापार समझौता 18 वर्षों के उपरांत सम्भव हो सका है। अब तो कनाडा के राष्ट्रपति भी मार्च 2026 माह में भारत आने वाले हैं एवं कुछ क्षेत्रों में मुक्त व्यापार समझौते के अंतिम रूप दिए जाने की प्रबल सम्भावना है।

भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौतों का विश्व के अन्य देशों को सकारात्मक संदेश गया है। भारत वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न कर रहा है। इससे, समझौता करने वाले देशों के नागरिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होने की सम्भावनाएं प्रबल हो रही हैं क्योंकि इन देशों में आर्थिक प्रगति के तेज होने के चलते इन देशों में खुशहाली आने की सम्भावनाएं बन रही हैं। इस दृष्टि से विभिन्न देशों का भारत के प्रति दृष्टिकोण हाल ही के समय में बदला है एवं वे अब भारत की ओर आशाभारी नजरों से देख रहे हैं। भारत एक युवा देश है एवं विभिन्न उत्पादों के लिए भारत एक विशाल बाजार के रूप में विश्व के सामने उपलब्ध है। विशेष रूप से इस धरा के दक्षिणी भाग के देश तो अब भारत के वैश्विक स्तर पर इन देशों का नेतृत्व करने के लिए श्रद्धा के भाव से उम्मीद भारी नजरों से देख रहे हैं।    

उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भारत के सामने भी कुछ समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। जैसे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में डालर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत का लगातार गिरते जाना। एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की क़ीमत 92 रुपए के स्तर को भी पार कर गई है एवं वर्ष 2025 में भारतीय रुपए का लगभग 5 से 6 प्रतिशत के बीच अवमूल्यन हुआ है। दरअसल, यह समस्या, विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय पूंजी (शेयर) बाजार से लगातार अपने निवेश को निकालने के चलते खड़ी हुई है। इससे अमेरिकी डॉलर का भारत से बाहर जाने का सिलसिला बढ़ गया है। इस समस्या के हल हेतु भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मात्रा को बढ़ाने का प्रयास लगातार कर रहा है। साथ ही, भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात को भी गति देने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि भारत में अमेरिकी डॉलर के आने की मात्रा में वृद्धि हो। यदि भारत को इन प्रयासों में सफलता मिलती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए पर दबाव कुछ कम होगा। 

ट्रम्प द्वारा हाल ही के समय में लिए गए निर्णयों के चलते वैश्विक स्तर पर प्रारम्भ हुई उथल पुथल को कम करने के लिए आज विश्व के कई देश भारत की ओर ही देख रहे हैं क्योंकि भारत अपने आप को विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाकर इस तरह की समस्याओं का हल निकालने का प्रयास कर रहा है एवं इस कार्य में भारत को कुछ सफलता प्राप्त होती हुई भी दिखाई दे रही है। भारत के पास युवा शक्ति की बेजोड़ उपलब्धता है, विभिन्न क्षेत्रों में इनके कौशल को विकसित कर, भारत आज पूरे विश्व को श्रमबल उपलब्ध करा सकने की क्षमता रखता है और भारतीय सनातन संस्कृति को “वसुधैव कुटुम्बकम” के भाव के साथ, पूरे विश्व में फैला सकता है ताकि विभिन्न देशों में हो रहे संघर्षों को कम अथवा समाप्त किया जा सके।      

- प्रहलाद सबनानी 
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक 
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर - 474 009

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हेक्सागन गठबंधन के अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मायने समझिए

इजरायल द्वारा प्रस्तावित "हेक्सागन गठबंधन" के अंतर्राष्ट्रीय मायने बेहद दिलचस्प हैं। यह अतिवादी ताकतों के विरूद्ध शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। वास्तव में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा प्रस्तावित यह गठबंधन एक ऐसा कूटनीतिक समूह है, जिसमें भारत, अरब देश, अफ्रीकी राष्ट्र, ग्रीस, साइप्रस और अन्य एशियाई देश शामिल होंगे। 

समझा जाता है कि भले ही इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य कट्टरपंथी शिया और सुन्नी ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना है, लेकिन इसके उन वैश्विक कूटनीतिक निहितार्थों से भी इंकार नहीं किया जा सकता, जो अमेरिका, चीन और रूस जैसे तीनों अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के कान खड़े करने वाले साबित हो सकते हैं। 

इसे भी पढ़ें: PM Modi Israel Visit | 'Benjamin Netanyahu से मिलने के लिए उत्साहित हूं, दीर्घकालिक संबंधों के मजबूत होने की आशा', पीएम मोदी का बयान

ऐसा इसलिए कि इस गठबंधन में विश्व की चौथी बड़ी शक्ति भारत बेहद मजबूत और नेतृत्वकारी स्थिति में रहेगा। लिहाजा इसका स्वरूप तय हो जाने के बाद अरब और खाड़ी के इस्लामिक देशों पर वर्चस्व की जो होड़ वैश्विक महाशक्तियों के बीच मची रहती है, उस पर एक हद तक अल्पविराम भी लगेगा। 

# छह-पक्षीय (हेक्सागन) धुरी है हेक्सागन गठबंधन


दरअसल, हेक्सागन गठबंधन छह-पक्षीय (हेक्सागन) धुरी है जो पश्चिम एशिया में नई वैश्विक शक्ति के रूप में उभरेगी, क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप से भी इसे पूरी ताकत मिलेगी। यह भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) से भी जुड़ी हुई है। 

वहीं इस बेमिसाल गठबंधन में भारत को प्रमुख भूमिका दी गई है, जिसमें AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और सुरक्षा सहयोग पर फोकस होगा। जहां तक भारत की भागीदारी की बात है तो भारत अभी आधिकारिक रूप से इसमें शामिल नहीं हुआ है, लेकिन पीएम मोदी की 25-26 फरवरी 2026 को होने वाली इजरायल यात्रा के दौरान इस पर चर्चा और समझौते होने की संभावना बलवती है। 

समझा जाता है कि यह 2017 के बाद पीएम मोदी की यह दूसरी बड़ी यात्रा होगी, जो पारस्परिक संबंधों को और अधिक मजबूत करेगी। वहीं नेतन्याहू ने इसे कट्टरपंथ विरोधी नई धुरी बताया है। उल्लेखनीय है कि हेक्सागन गठबंधन अभी औपचारिक रूप से अस्तित्व में नहीं आया है, लेकिन इसमें शामिल होने वाले प्रमुख देशों या समूहों में इजरायल, भारत, ग्रीस, साइप्रस, कुछ अरब राष्ट्र और अफ्रीकी देश शामिल बताए गए हैं।

इस गठबंधन का मुख्य देश इजरायल है जो गठबंधन का प्रस्तावक और केंद्र बिंदु है। जबकि भारत इसके प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा है, खासकर सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के लिए। वहीं ग्रीस और साइप्रस इसके भूमध्यसागरीय रणनीतिक साझेदार देश हैं। जबकि अरब के कतिपय देश विकास और शांति समर्थक राष्ट्र के तौर पर रहेंगे। वहीं अफ्रीकी देश क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसमें शामिल होंगे। जबकि अन्य एशियाई देश इसमें भारत और उस जैसे सहयोगी की भूमिका में शामिल किए जाएंगे।

# हेक्सागन गठबंधन का उद्देश्य है स्पष्ट


जहां तक हेक्सागन गठबंधन के उद्देश्य की बात है तो यह गठबंधन कट्टरपंथी शिया-सुन्नी ताकतों के खिलाफ एकजुटता का प्रयास है, जिसमें भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारे से जुड़ाव हो सकता है। वहीं इसका मुख्य ध्येय कट्टरपंथी शिया और सुन्नी ताकतों (जैसे ईरान समर्थित शिया धुरी और उभरती सुन्नी कट्टरपंथी शक्तियों) के खिलाफ एकजुट होकर क्षेत्रीय सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।

यह गठबंधन भूमध्य सागर, मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के सहयोगी देशों को एक मंच पर लाकर कट्टरपंथ, आतंकवाद और अस्थिरता का सामना करने का एक सशक्त प्रयास है। इसमें भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) को मजबूत करना, AI, क्वांटम तकनीक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना शामिल है। 

# हेक्सागन गठबंधन से भारत का बढ़ेगा रणनीतिक महत्व


देखा जाए तो हेक्सागन गठबंधन की भावी योजनाओं से चीन के BRI जैसे प्रयासों को चुनौती मिल सकती है। इसका अपेक्षित प्रभाव यह होगा कि एक 'नई वैश्विक धुरी' बनाने का जो नेतन्याहू का विजन है, वो विकास-समर्थक राष्ट्रों को शांति और समृद्धि के लिए एकजुट करने वाला है। इसलिए भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकता है।

यही वजह है कि हेक्सागन गठबंधन से भारत को वैश्विक महाशक्ति के केंद्र के रूप में उभरने में रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी लाभ मिलेंगे। क्योंकि यह 'नया नाटो' जैसा समूह भारत को मध्य पूर्व-यूरोप तक सुरक्षित पहुंच प्रदान करेगा। लिहाजा, इस नई स्थिति का प्रमुख लाभ रणनीतिक ऊंचाई प्राप्त करना है। 

इससे दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में भारत की गिनती बढ़ेगी, और कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनेगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि अमेरिका-चीन जैसे अहम वैश्विक खिलाड़ी अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद के द्वंद्व में उलझे हुए हैं। 

जहां तक भारत की आर्थिक पहुंच की बात है तो IMEC गलियारे से मिडिल ईस्ट-यूरोप तक सीधा सुरक्षित मार्ग मिलेगा, जो चीन के BRI को चुनौती देता हुआ प्रतीत होगा।वहीं भारत को तकनीकी सहयोग मिलेगा। खासकर AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, डिफेंस (मिसाइल, ड्रोन) और सुरक्षा साझेदारी मजबूत होगी। 

इसका क्षेत्रीय प्रभाव यह पड़ेगा कि अरब-अफ्रीकी देशों से भारत के संबंध मजबूत होंगे, और अमेरिका के बिना भी भारत का स्वतंत्र सुरक्षा तंत्र मजबूत बना रहेगा। वहीं अपेक्षित प्रभाव यह होगा कि पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से ये सभी लाभ औपचारिक हो सकते हैं, जो भारत को वैश्विक पावर बैलेंस में मजबूत बनाएंगे।

# हेक्सागन गठबंधन बनेगा चीन के लिए चुनौती 


सच कहूं तो हेक्सागन गठबंधन चीन के लिए चुनौती है क्योंकि यह चीन के 'वन बेल्ट वन रोड' (BRI) प्रोजेक्ट को सीधे चुनौती देगा। खासकर भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) को मजबूत कर यह वैकल्पिक व्यापार मार्ग बनाएगा। इसका प्रमुख कारण आर्थिक प्रतिस्पर्धा है। IMEC से मिडिल ईस्ट-यूरोप तक चीन-बिना सीधा रास्ता, BRI के प्रभाव को कम करेगा। 

इस नए गठबंधन से चीन की रणनीतिक घेराबंदी भी आसान होगी, क्योंकि नया एशियाई-अरब-अफ्रीकी देशों का समूह चीन के मध्य पूर्व विस्तार को रोकेगा। जहां तक भारत की भूमिका की बात है तो भारत को महाशक्ति केंद्र बनाकर चीन के क्षेत्रीय वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है। जबकि तकनीकी व सुरक्षा के दृष्टिगत  AI, क्वांटम सहयोग से चीन की तकनीकी श्रेष्ठता पर असर पड़ेगा। 

जहां तक वैश्विक प्रभाव की बात है तो यह QUAD/IMEC जैसी पहलों का विस्तार बनेगा, जो चीन के विस्तारवाद को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है।

# क्या हेक्सागन गठबंधन QUAD या AUKUS से अलग है?


हां, हेक्सागन गठबंधन QUAD और AUKUS से स्पष्ट रूप से अलग है। यह इजरायल-प्रमुखित मध्य पूर्व-केंद्रित रणनीतिक समूह है, जबकि QUAD और AUKUS इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर केंद्रित हैं।

देखा जाए तो हेक्सागन गठबंधन, QUAD और AUKUS के क्षेत्र, उनमें शामिल देश, उनका उद्देश्य व प्रकृति सबकुछ अलग-अलग है। जहां तक क्षेत्र की बात है तो हेक्सागन गठबंधन मध्य पूर्व, भूमध्य सागर व अफ्रीका-एशिया में सक्रिय होगा, जबकि क्वाड गठबंधन इंडो-पैसिफिक में चीन पर फोकस करते हुए सक्रिय है, जबकि AUKUS इंडो-पैसिफिक (सुरक्षा) से जुड़ा गठबंधन है। 

जहां तक देशों की बात है तो हेक्सागन गठबंधन में इजरायल, भारत, ग्रीस, साइप्रस, अरब-अफ्रीकी राष्ट्र शामिल होंगे। जबकि क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान व ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। वहीं AUKUS गठबंधन में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व ब्रिटेन शामिल हैं। 

जहां तक उद्देश्य की बात है तो हेक्सागन गठबंधन का ध्येय कट्टरपंथ विरोध, IMEC और AI-सुरक्षा है। जबकि क्वाड का ध्येय खुला हिंद महासागर व जलवायु-सहयोग हैं। वहीं AUKUS का ध्येय परमाणु पनडुब्बी व सैन्य तकनीक सहयोग है। 

जहां तक इन गठबंधनों की प्रकृति की बात है तो हेक्सागन गठबंधन प्रस्तावित छह-पक्षीय धुरी है। जबकि क्वाड अनौपचारिक वार्ता मंच है। वहीं AUKUS औपचारिक सैन्य गठबंधन है, जो चीनी वर्चस्व को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है। 

जहां तक इन गठबंधनों की रणनीतिक स्थिति की बात है तो हेक्सागन गठबंधन भारत को मध्य पूर्व में नई भूमिका देगा, और बिना QUAD/AUKUS के अमेरिका-केंद्रित दायरे से भी संभावित टकराव से बचते हुए हेक्सागन गठबंधन के भागीदार देश एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं, जो भारत-इजरायल दोनों के लिए अहम बात होगी।

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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