इजरायल द्वारा प्रस्तावित "हेक्सागन गठबंधन" के अंतर्राष्ट्रीय मायने बेहद दिलचस्प हैं। यह अतिवादी ताकतों के विरूद्ध शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। वास्तव में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा प्रस्तावित यह गठबंधन एक ऐसा कूटनीतिक समूह है, जिसमें भारत, अरब देश, अफ्रीकी राष्ट्र, ग्रीस, साइप्रस और अन्य एशियाई देश शामिल होंगे।
समझा जाता है कि भले ही इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य कट्टरपंथी शिया और सुन्नी ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना है, लेकिन इसके उन वैश्विक कूटनीतिक निहितार्थों से भी इंकार नहीं किया जा सकता, जो अमेरिका, चीन और रूस जैसे तीनों अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के कान खड़े करने वाले साबित हो सकते हैं।
ऐसा इसलिए कि इस गठबंधन में विश्व की चौथी बड़ी शक्ति भारत बेहद मजबूत और नेतृत्वकारी स्थिति में रहेगा। लिहाजा इसका स्वरूप तय हो जाने के बाद अरब और खाड़ी के इस्लामिक देशों पर वर्चस्व की जो होड़ वैश्विक महाशक्तियों के बीच मची रहती है, उस पर एक हद तक अल्पविराम भी लगेगा।
# छह-पक्षीय (हेक्सागन) धुरी है हेक्सागन गठबंधन
दरअसल, हेक्सागन गठबंधन छह-पक्षीय (हेक्सागन) धुरी है जो पश्चिम एशिया में नई वैश्विक शक्ति के रूप में उभरेगी, क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप से भी इसे पूरी ताकत मिलेगी। यह भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) से भी जुड़ी हुई है।
वहीं इस बेमिसाल गठबंधन में भारत को प्रमुख भूमिका दी गई है, जिसमें AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और सुरक्षा सहयोग पर फोकस होगा। जहां तक भारत की भागीदारी की बात है तो भारत अभी आधिकारिक रूप से इसमें शामिल नहीं हुआ है, लेकिन पीएम मोदी की 25-26 फरवरी 2026 को होने वाली इजरायल यात्रा के दौरान इस पर चर्चा और समझौते होने की संभावना बलवती है।
समझा जाता है कि यह 2017 के बाद पीएम मोदी की यह दूसरी बड़ी यात्रा होगी, जो पारस्परिक संबंधों को और अधिक मजबूत करेगी। वहीं नेतन्याहू ने इसे कट्टरपंथ विरोधी नई धुरी बताया है। उल्लेखनीय है कि हेक्सागन गठबंधन अभी औपचारिक रूप से अस्तित्व में नहीं आया है, लेकिन इसमें शामिल होने वाले प्रमुख देशों या समूहों में इजरायल, भारत, ग्रीस, साइप्रस, कुछ अरब राष्ट्र और अफ्रीकी देश शामिल बताए गए हैं।
इस गठबंधन का मुख्य देश इजरायल है जो गठबंधन का प्रस्तावक और केंद्र बिंदु है। जबकि भारत इसके प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा है, खासकर सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के लिए। वहीं ग्रीस और साइप्रस इसके भूमध्यसागरीय रणनीतिक साझेदार देश हैं। जबकि अरब के कतिपय देश विकास और शांति समर्थक राष्ट्र के तौर पर रहेंगे। वहीं अफ्रीकी देश क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसमें शामिल होंगे। जबकि अन्य एशियाई देश इसमें भारत और उस जैसे सहयोगी की भूमिका में शामिल किए जाएंगे।
# हेक्सागन गठबंधन का उद्देश्य है स्पष्ट
जहां तक हेक्सागन गठबंधन के उद्देश्य की बात है तो यह गठबंधन कट्टरपंथी शिया-सुन्नी ताकतों के खिलाफ एकजुटता का प्रयास है, जिसमें भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारे से जुड़ाव हो सकता है। वहीं इसका मुख्य ध्येय कट्टरपंथी शिया और सुन्नी ताकतों (जैसे ईरान समर्थित शिया धुरी और उभरती सुन्नी कट्टरपंथी शक्तियों) के खिलाफ एकजुट होकर क्षेत्रीय सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।
यह गठबंधन भूमध्य सागर, मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के सहयोगी देशों को एक मंच पर लाकर कट्टरपंथ, आतंकवाद और अस्थिरता का सामना करने का एक सशक्त प्रयास है। इसमें भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) को मजबूत करना, AI, क्वांटम तकनीक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना शामिल है।
# हेक्सागन गठबंधन से भारत का बढ़ेगा रणनीतिक महत्व
देखा जाए तो हेक्सागन गठबंधन की भावी योजनाओं से चीन के BRI जैसे प्रयासों को चुनौती मिल सकती है। इसका अपेक्षित प्रभाव यह होगा कि एक 'नई वैश्विक धुरी' बनाने का जो नेतन्याहू का विजन है, वो विकास-समर्थक राष्ट्रों को शांति और समृद्धि के लिए एकजुट करने वाला है। इसलिए भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकता है।
यही वजह है कि हेक्सागन गठबंधन से भारत को वैश्विक महाशक्ति के केंद्र के रूप में उभरने में रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी लाभ मिलेंगे। क्योंकि यह 'नया नाटो' जैसा समूह भारत को मध्य पूर्व-यूरोप तक सुरक्षित पहुंच प्रदान करेगा। लिहाजा, इस नई स्थिति का प्रमुख लाभ रणनीतिक ऊंचाई प्राप्त करना है।
इससे दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में भारत की गिनती बढ़ेगी, और कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनेगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि अमेरिका-चीन जैसे अहम वैश्विक खिलाड़ी अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद के द्वंद्व में उलझे हुए हैं।
जहां तक भारत की आर्थिक पहुंच की बात है तो IMEC गलियारे से मिडिल ईस्ट-यूरोप तक सीधा सुरक्षित मार्ग मिलेगा, जो चीन के BRI को चुनौती देता हुआ प्रतीत होगा।वहीं भारत को तकनीकी सहयोग मिलेगा। खासकर AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, डिफेंस (मिसाइल, ड्रोन) और सुरक्षा साझेदारी मजबूत होगी।
इसका क्षेत्रीय प्रभाव यह पड़ेगा कि अरब-अफ्रीकी देशों से भारत के संबंध मजबूत होंगे, और अमेरिका के बिना भी भारत का स्वतंत्र सुरक्षा तंत्र मजबूत बना रहेगा। वहीं अपेक्षित प्रभाव यह होगा कि पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से ये सभी लाभ औपचारिक हो सकते हैं, जो भारत को वैश्विक पावर बैलेंस में मजबूत बनाएंगे।
# हेक्सागन गठबंधन बनेगा चीन के लिए चुनौती
सच कहूं तो हेक्सागन गठबंधन चीन के लिए चुनौती है क्योंकि यह चीन के 'वन बेल्ट वन रोड' (BRI) प्रोजेक्ट को सीधे चुनौती देगा। खासकर भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) को मजबूत कर यह वैकल्पिक व्यापार मार्ग बनाएगा। इसका प्रमुख कारण आर्थिक प्रतिस्पर्धा है। IMEC से मिडिल ईस्ट-यूरोप तक चीन-बिना सीधा रास्ता, BRI के प्रभाव को कम करेगा।
इस नए गठबंधन से चीन की रणनीतिक घेराबंदी भी आसान होगी, क्योंकि नया एशियाई-अरब-अफ्रीकी देशों का समूह चीन के मध्य पूर्व विस्तार को रोकेगा। जहां तक भारत की भूमिका की बात है तो भारत को महाशक्ति केंद्र बनाकर चीन के क्षेत्रीय वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है। जबकि तकनीकी व सुरक्षा के दृष्टिगत AI, क्वांटम सहयोग से चीन की तकनीकी श्रेष्ठता पर असर पड़ेगा।
जहां तक वैश्विक प्रभाव की बात है तो यह QUAD/IMEC जैसी पहलों का विस्तार बनेगा, जो चीन के विस्तारवाद को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है।
# क्या हेक्सागन गठबंधन QUAD या AUKUS से अलग है?
हां, हेक्सागन गठबंधन QUAD और AUKUS से स्पष्ट रूप से अलग है। यह इजरायल-प्रमुखित मध्य पूर्व-केंद्रित रणनीतिक समूह है, जबकि QUAD और AUKUS इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर केंद्रित हैं।
देखा जाए तो हेक्सागन गठबंधन, QUAD और AUKUS के क्षेत्र, उनमें शामिल देश, उनका उद्देश्य व प्रकृति सबकुछ अलग-अलग है। जहां तक क्षेत्र की बात है तो हेक्सागन गठबंधन मध्य पूर्व, भूमध्य सागर व अफ्रीका-एशिया में सक्रिय होगा, जबकि क्वाड गठबंधन इंडो-पैसिफिक में चीन पर फोकस करते हुए सक्रिय है, जबकि AUKUS इंडो-पैसिफिक (सुरक्षा) से जुड़ा गठबंधन है।
जहां तक देशों की बात है तो हेक्सागन गठबंधन में इजरायल, भारत, ग्रीस, साइप्रस, अरब-अफ्रीकी राष्ट्र शामिल होंगे। जबकि क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान व ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। वहीं AUKUS गठबंधन में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व ब्रिटेन शामिल हैं।
जहां तक उद्देश्य की बात है तो हेक्सागन गठबंधन का ध्येय कट्टरपंथ विरोध, IMEC और AI-सुरक्षा है। जबकि क्वाड का ध्येय खुला हिंद महासागर व जलवायु-सहयोग हैं। वहीं AUKUS का ध्येय परमाणु पनडुब्बी व सैन्य तकनीक सहयोग है।
जहां तक इन गठबंधनों की प्रकृति की बात है तो हेक्सागन गठबंधन प्रस्तावित छह-पक्षीय धुरी है। जबकि क्वाड अनौपचारिक वार्ता मंच है। वहीं AUKUS औपचारिक सैन्य गठबंधन है, जो चीनी वर्चस्व को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है।
जहां तक इन गठबंधनों की रणनीतिक स्थिति की बात है तो हेक्सागन गठबंधन भारत को मध्य पूर्व में नई भूमिका देगा, और बिना QUAD/AUKUS के अमेरिका-केंद्रित दायरे से भी संभावित टकराव से बचते हुए हेक्सागन गठबंधन के भागीदार देश एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं, जो भारत-इजरायल दोनों के लिए अहम बात होगी।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया। यह प्रतिमा उस स्थान पर स्थापित की गई है जहां पहले ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा लगी थी। सरकार ने इसे औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। यह कार्यक्रम राजाजी उत्सव के अंतर्गत आयोजित हुआ, जिसमें उपराष्ट्रपति और कई केंद्रीय मंत्री उपस्थित रहे।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि राजाजी ने स्वतंत्रता के बाद अपने कक्ष में रामकृष्ण परमहंस और महात्मा गांधी के चित्र लगाए थे, जो मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति का प्रतीक था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रपति भवन में अब ब्रिटिश अधिकारियों के चित्रों के स्थान पर परम वीर चक्र विजेताओं के चित्र लगाए जा रहे हैं और परिसर को आम जनता के लिए अधिक खुला बनाया गया है। बाद में राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी कर कहा कि यह पहल औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को मिटाने और भारत की समृद्ध संस्कृति, विरासत, शाश्वत परंपराओं को गर्व से अपनाने तथा भारत माता की सेवा में असाधारण योगदान देने वालों को सम्मानित करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों की श्रृंखला का हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस अवसर पर भेजे गए एक संदेश में कहा कि राजाजी और महात्मा गांधी के बीच गहरे आपसी विश्वास और मित्रता से चिह्नित घनिष्ठ संबंध थे जो सर्वविदित हैं।
देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अवसरों पर गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान किया है। मोदी सरकार का तर्क है कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है। सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा की इंडिया गेट के निकट स्थापना, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण, सेंट्रल विस्टा का पुनर्विकास, नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना और कई औपनिवेशिक नामों के परिवर्तन इसी क्रम में देखे जा रहे हैं।
राष्ट्रपति भवन में लुटियंस की प्रतिमा हटाकर राजाजी की स्थापना इसी वैचारिक धारा का विस्तार है। यह केवल एक प्रतिमा का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रतीकों की राजनीति के माध्यम से इतिहास की पुनर्व्याख्या है। संदेश स्पष्ट है कि सत्ता के केंद्र में अब औपनिवेशिक स्मृति नहीं, भारतीय चेतना का प्रतिनिधित्व होगा।
इस कदम की जहां देशभर में सराहना हो रही है वहीं ब्रिटेन के लेखक मैट रिडले ने खेद व्यक्त किया, क्योंकि लुटियंस उनके परदादा थे। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें दुख है कि उनके परदादा की प्रतिमा हटा दी गई। किंतु भारतीय संदर्भ में यह परिवर्तन एक व्यापक वैचारिक पुनर्स्थापन का संकेत देता है।
हम आपको बता दें कि राजगोपालाचारी, जिन्हें स्नेहपूर्वक राजाजी कहा जाता है, स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल थे। उन्होंने 1948 से 1950 तक इस पद पर कार्य किया। वह उसी भवन में रहे थे जिसे कभी वायसराय हाउस कहा जाता था और जो ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक था। अब उसी भवन की भव्य सीढ़ियों के निकट उनकी प्रतिमा स्थापित होना इतिहास के एक चक्र के पूर्ण होने जैसा प्रतीत होता है।
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म 1878 में तमिलनाडु में हुआ था। वह पेशे से वकील थे, वह स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी बने और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी रहे। स्वतंत्रता के बाद वह भारत के गवर्नर जनरल बने। राजाजी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वह लेखक, विचारक और सामाजिक सुधारक भी थे। उन्होंने तमिल में रामायण और महाभारत की लोकप्रिय व्याख्याएं लिखीं। वह नैतिक राजनीति और सादगी के प्रतीक माने जाते थे।
हालांकि उनका राजनीतिक जीवन जटिलताओं से भरा रहा। 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रीमियर के रूप में उन्होंने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया, जिसका तीव्र विरोध हुआ और द्रविड आंदोलन को बल मिला। बाद में वह हिंदी थोपने के विरोध में भी खड़े हुए। 1959 में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की, जो आर्थिक स्वतंत्रता और मिनिमम गवर्नेंस की पक्षधर थी। 1967 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उस चुनाव ने राज्य की राजनीति में कांग्रेस वर्चस्व का अंत कर दिया। इस दृष्टि से वह तमिल राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति के बीच सेतु के रूप में देखे जाते हैं।
जहां तक इस कदम को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखे जाने की बात है तो आपको बता दें कि तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड दलों के वर्चस्व में रही है। भाषा, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता वहां के प्रमुख मुद्दे हैं। भारतीय जनता पार्टी को वहां अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। ऐसे में राजाजी की प्रतिमा की स्थापना का समय महत्वपूर्ण है। आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह कदम प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है। राजाजी एक ऐसे तमिल नेता थे जो राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित रहे। वह द्रविड दलों से जुड़े नहीं थे, परंतु तमिल समाज में उनका सम्मान है।
नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना और काशी तमिल संगमम जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से केंद्र सरकार ने तमिल सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया है। राजाजी की प्रतिमा उसी कड़ी का अगला कदम प्रतीत होती है। यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि तमिल परंपरा और राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इससे भाजपा को यह कहने का अवसर मिलेगा कि वह तमिल गौरव को राष्ट्रीय सम्मान दे रही है।
देखा जाये तो मोदी सरकार यह स्थापित करना चाहती है कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी यदि औपनिवेशिक प्रतीक सत्ता के केंद्र में बने रहें तो मानसिक स्वतंत्रता अधूरी है। इस दृष्टि से यह कदम गुलामी की मानसिकता को ध्वस्त करने के अभियान का हिस्सा है। हालांकि आलोचक इसे चुनावी राजनीति से जोड़कर देख सकते हैं, परंतु यह भी सच है कि राष्ट्र निर्माण में प्रतीकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि सार्वजनिक स्थलों पर भारतीय नायकों को प्रमुखता दी जाती है तो वह आत्मविश्वास को मजबूत करता है।
तमिलनाडु के संदर्भ में यह कदम भाजपा को वैचारिक और भावनात्मक आधार प्रदान कर सकता है। जिस भवन में गवर्नर जनरल के रूप में राजाजी रहे, उसी भवन में वह प्रतिमा के रूप में लौटे हैं तो क्या इससे चुनावी परिणाम बदलेंगे, यह तो भविष्य बताएगा, परंतु इतना निश्चित है कि राजाजी की प्रतिमा ने इतिहास, राजनीति और पहचान की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।
बहरहाल, राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों पर स्थापित यह प्रतिमा केवल धातु की आकृति नहीं, बल्कि उस विचार का प्रतीक है जो कहता है कि भारत अब अपने अतीत को स्वयं परिभाषित करेगा और गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर विकसित भारत की ओर अग्रसर होगा।
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