वाईएसआरसीपी प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने बुधवार को कहा कि चंद्रबाबू नायडू सरकार द्वारा पेश किया गया बजट भ्रामक आंकड़ों और झूठे दावों से भरा है। जगन ने कहा कि चंद्रबाबू के सत्ता में आने के बाद से राज्य का कर्ज लगातार बढ़ रहा है। हमारे पांच साल के शासनकाल में कुल कर्ज लगभग 33 लाख करोड़ रुपये था। लेकिन चंद्रबाबू के शासन के सिर्फ दो वर्षों में ही कर्ज 32 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।
जगन ने कहा कि जब भी चंद्रबाबू सत्ता में आते हैं, राजस्व घट जाता है और कर्ज बढ़ जाता है। इसका कारण स्पष्ट है - व्यापक भ्रष्टाचार और संसाधनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग। सरकारी जमीनें निजी रियल एस्टेट कंपनियों को कौड़ियों के भाव में सौंपी जा रही हैं। विशाखापत्तनम में हजारों करोड़ रुपये की जमीनें रिश्तेदारों और सहयोगियों को आवंटित की जा रही हैं। जगन रेड्डी ने टीडीपी पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार खजाने में न्यूनतम शेष राशि भी नहीं रख पा रही है।
उन्होंने आगे कहा कि विधानसभा सत्र जनता की समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय नाटक, नुक्कड़ नाटक और आत्म-प्रशंसा में सिमट गए। हमने सुपर सिक्स योजनाओं के वादों के बारे में सवाल पूछे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। महिलाओं से किए गए वादों का क्या हुआ? गरीबों के लिए आवास का क्या हुआ? पिछले दो वर्षों में क्या उन्होंने गरीबों को एक भी जमीन दी है या एक भी घर बनाया है?उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन सरकार उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है। हालांकि, जब चंद्रबाबू राजनीतिक सभाएं आयोजित करते हैं, तो वे आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की उपस्थिति की उम्मीद करते हैं।
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देश में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 31 वर्ष के हरीश राणा के लिए जीवन रक्षक चिकित्सा उपचार वापस लेने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को निर्देश दिया है कि वह हरीश राणा को भर्ती कर आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराए और जीवन समर्थन प्रणाली हटाने की प्रक्रिया को नियमों के अनुसार पूरा करे। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। यह फैसला देश में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु से संबंधित मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
हम आपको बता दें कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है कि किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को जीवित रखने वाली चिकित्सा सहायता को रोकने या जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति देना ताकि उसकी स्वाभाविक रूप से मौत हो सके। हरीश राणा 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के कारण सिर में चोट लगने से घायल हो गया था और वह एक दशक से अधिक समय से कोमा में है। अदालत में पेश की गयी जानकारी के अनुसार हरीश राणा पिछले कई वर्षों से कोमा में हैं और उन्हें शत प्रतिशत विकलांगता तथा चारों अंगों के पक्षाघात की गंभीर समस्या है। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें सांस लेने, भोजन देने और रोजमर्रा की देखभाल के लिए लगातार चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता पड़ती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी व्यक्ति का जीवन केवल कृत्रिम जीवन समर्थन प्रणाली के सहारे चल रहा हो और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना न हो, तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति की गरिमा को ध्यान में रखते हुए जीवन समाप्त करने का विकल्प भी स्वीकार्य हो सकता है। न्यायालय ने कहा कि गरिमापूर्ण जीवन की तरह गरिमापूर्ण मृत्यु भी व्यक्ति का अधिकार है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने हरीश राणा के माता-पिता से मिलने की इच्छा भी जताई थी। अदालत के सामने हरीश की चिकित्सा स्थिति से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की द्वितीय चिकित्सा समिति ने तैयार किया था। न्यायालय ने उस रिपोर्ट को अत्यंत दुखद बताया था। प्राथमिक चिकित्सा समिति ने हरीश राणा की स्थिति का परीक्षण करने के बाद बताया था कि उनके स्वस्थ होने की संभावना लगभग न के बराबर है। इस मामले में सुनवाई करते हुए पिछले वर्ष 11 दिसंबर को अदालत ने टिप्पणी की थी कि रिपोर्ट के अनुसार रोगी अत्यंत दयनीय स्थिति में है और उसकी हालत में सुधार की कोई वास्तविक उम्मीद दिखाई नहीं देती।
हम आपको याद दिला दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी शाक अवस्था वाले रोगी के लिए कृत्रिम जीवन समर्थन प्रणाली हटाने से पहले दो अलग-अलग चिकित्सा समितियों की राय लेना अनिवार्य है। इनमें एक प्राथमिक समिति और दूसरी द्वितीय समिति शामिल होती है, जो रोगी की स्थिति का स्वतंत्र रूप से आकलन करती हैं।
हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने अदालत में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि एक पिता के लिए अपने बेटे को वर्षों तक बिस्तर पर इस हालत में देखना अत्यंत दर्दनाक है। उन्होंने भावुक स्वर में कहा, हर सुबह हम किसी चमत्कार की उम्मीद करते हैं, लेकिन हर दिन हमें वही खामोशी और बेबसी दिखाई देती है। भावनात्मक और आर्थिक रूप से हम पूरी तरह टूट चुके हैं। हमारे पास अब कुछ भी नहीं बचा है। उन्होंने आगे कहा कि जब वह अपने बेटे की आंखों में देखते हैं तो वहां पहचान या प्रतिक्रिया का कोई संकेत नहीं मिलता। हरीश अपने सिर तक को घुमा नहीं सकता। ऐसे में माता-पिता के रूप में यह पीड़ा असहनीय हो गई है।
हम आपको बता दें कि हरीश राणा कभी एक खुशमिजाज युवक थे और पंजाब विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन वर्ष 2013 में उनके जीवन में एक भयावह दुर्घटना हुई। वह अपने रहने के स्थान की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी। इस हादसे के बाद वह शत प्रतिशत पक्षाघात से ग्रस्त हो गए और तब से कोमा में हैं। हरीश के भाई आशीष राणा ने बताया कि परिवार ने कई वर्षों तक उम्मीद बनाए रखी कि वह एक दिन जागेंगे, फिर से बात करेंगे और सामान्य जीवन जी सकेंगे। लेकिन लंबा चला इलाज परिवार के लिए भारी आर्थिक बोझ बन गया।
आशीष के अनुसार हरीश के इलाज और देखभाल के लिए हर महीने लगभग चौबीस हजार से तीस हजार रुपये तक खर्च होते हैं। इसमें दवाइयां, ट्यूब, चिकित्सा उपकरण और अन्य जरूरी साधन शामिल हैं। उन्होंने बताया कि परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं है, इसलिए हरीश की देखभाल जारी रखने के लिए उन्हें द्वारका स्थित अपना घर तक बेचना पड़ा।
बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल एक परिवार की पीड़ा को समझने वाला निर्णय माना जा रहा है, बल्कि यह देश में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर भी एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित हो सकता है।
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