Crude Oil 94 डॉलर पर आने से RBI दिसंबर में Repo Rate केवल 25 bps बढ़ा सकता है
कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था और ब्याज दरों को लेकर बाजार की सोच पर भी दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल करीब 94 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। इसके बाद निवेशकों को लगने लगा है कि आरबीआई आने वाले समय में ब्याज दरें पहले के अनुमान से कम बढ़ा सकता है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक युद्ध चलने की आशंका घटने से तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता भी कुछ कम हुई है। इससे भारत के तेल आयात खर्च, महंगाई और रुपये पर दबाव घटने की उम्मीद है।
बाजार अब आने वाले समय में ब्याज दरों में कुल 75 से 100 आधार अंक तक बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहा है। एक बार में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। पहले दिसंबर की बैठक में 50 आधार अंक की बढ़ोतरी की चर्चा थी, लेकिन अब यह अनुमान घटकर 25 आधार अंक रह गया है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, अगले एक साल में कुल बढ़ोतरी का अनुमान भी करीब 100 आधार अंक से घटकर 75 आधार अंक पर आ गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की एक बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच लंबे संघर्ष की आशंका कम होना है। ब्रेंट तेल की कीमत पहले 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी। अब तनाव कम होने की उम्मीद से कीमतों में शामिल युद्ध का अतिरिक्त असर घटा है। हालांकि, पश्चिम एशिया में स्थिति पूरी तरह सामान्य होने को लेकर अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल खरीदकर पूरा करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और रुपये की कीमत कमजोर हो सकती है। कमजोर रुपया विदेश से आने वाली वस्तुओं को महंगा कर देता है, जिसका असर देश में महंगाई पर पड़ता है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के अर्थशास्त्री अभिषेक उपाध्याय का कहना है कि तेल की कीमतों में अब उतनी तेजी आने की आशंका नहीं है, जितनी पहले जताई जा रही थी। उनके मुताबिक, आगे कीमतें बढ़ने पर भी बाजार को इनके फिर नीचे आने की उम्मीद रहेगी। तेल सस्ता रहने से सरकार पर खाद की सब्सिडी का खर्च बढ़ने का दबाव भी कम हो सकता है।
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई को भी अब पहले जितनी सख्ती करने की जरूरत नहीं पड़ सकती। अक्टूबर में केंद्रीय बैंक ने आयातकों की डॉलर मांग कम करने के लिए कुछ कदम उठाए थे और विदेशी मुद्रा बाजार में भी दखल दिया था। गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, इन कदमों का असर दिखा है। 23 अक्टूबर को खत्म हुए सप्ताह में आरबीआई की शुद्ध डॉलर बिक्री घटकर 70 करोड़ डॉलर रह गई, जबकि विशेष अदला-बदली सुविधाएं बंद होने के बाद यह 80 से 100 अरब डॉलर प्रति सप्ताह के स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि, रुपये की स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार के नए आंकड़ों पर भी नजर रहेगी।
तेल सस्ता होने के बावजूद ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसकी वजह घरेलू महंगाई है। सेनगुप्ता का अनुमान है कि महंगाई औसतन करीब 5.2 प्रतिशत रह सकती है और अक्टूबर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों के कारण यह 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। उनका कहना है कि वैश्विक तेल महंगा होने के बावजूद खुदरा ईंधन की कीमतों में करीब 5 प्रतिशत ही बढ़ोतरी हुई, क्योंकि सरकार और तेल कंपनियों ने बढ़े खर्च का कुछ हिस्सा खुद उठाया। कंपनियां अपने पुराने नुकसान की भरपाई करना चाहेंगी, इसलिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत घटने की उम्मीद भी कम है। अल नीनो से जुड़ी आशंकाएं भी खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं।
सेनगुप्ता के मुताबिक, आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाकर मांग कम करने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि वह वास्तविक ब्याज दर को सकारात्मक बनाए रखना चाहता है। उनके अनुसार, देश में मांग के कारण नहीं, बल्कि आपूर्ति से जुड़ी दिक्कतों के चलते महंगाई का दबाव है।
बाजार में ब्याज दरों के उस स्तर का अनुमान भी घटा है, जहां पहुंचकर आरबीआई बढ़ोतरी रोक सकता है। इसे अंतिम दर कहा जाता है। अभिषेक उपाध्याय के मुताबिक, रातोंरात ब्याज दरों से जुड़े बाजार में इसका अनुमान 6.75 प्रतिशत से घटकर 6.25 प्रतिशत हो गया है। हालांकि, वह अभी भी अंतिम दर 6.25 प्रतिशत रहने की उम्मीद कर रहे हैं। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य अर्थशास्त्री कनिका पसरीचा का अनुमान 6 प्रतिशत है। उपाध्याय का मानना है कि रुपये में स्थिरता और विदेशी निवेश बढ़ने से आरबीआई को फैसले लेने में अधिक गुंजाइश मिलेगी। वहीं, बाजार में नकदी कम होने पर रातोंरात ब्याज दरें नीतिगत दर से ज्यादा भी बढ़ सकती हैं। गौरतलब है कि आगे ब्याज दरों की दिशा तेल की कीमतों, खाद्य महंगाई और रुपये की स्थिरता पर निर्भर करेगी।
BSE Sensex में 2009 अंकों का जबर्दस्त उछाल, Nifty 24500 के पार बंद
मुंबई, पांच नवंबर स्थानीय शेयर बाजार में दिवाली से पहले जश्न जारी है। बाजार में बृहस्पतिवार लगातार छठे कारोबारी सत्र में तेजी रही और बीएसई सेंसेक्स करीब 2,009 अंक की छलांग लगा गया जबकि एनएसई निफ्टी 24,500 अंक के पार पहुंच गया। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद पश्चिम एशिया संघर्ष के समाधान की उम्मीद, कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के साथ यह तेजी आई।
अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को अमेरिकी संसद पर नियंत्रण मिल गया है। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों की लगातार लिवाली और अमेरिकी बाजारों में जोरदार तेजी से भी निवेशकों की धारणा मजबूत हुई। तीस शेयरों पर आधारित बीएसई सेंसेक्स 2,008.61 अंक यानी 2.60 प्रतिशत उछलकर 79,310.01 अंक पर बंद हुआ।
कारोबार के दौरान एक समय यह 2,168.63 अंक की बढ़त के साथ 79,470.03 अंक पर पहुंच गया था। एनएसई का 50 शेयरों वाला निफ्टी भी 576 अंक यानी 2.40 प्रतिशत चढ़कर तीन महीने के उच्चतम स्तर 24,536.60 अंक पर बंद हुआ। इससे पहले सात अगस्त को निफ्टी 24,550 अंक के स्तर के पार गया था।
सेंसेक्स की 30 कंपनियों में बजाज फाइनेंस के शेयर में सबसे अधिक 7.77 प्रतिशत की तेजी आई। इसके अलावा इंटरग्लोब एविएशन में 5.80 प्रतिशत, आईसीआईसीआई बैंक में 5.29 प्रतिशत, मारुति 5.28 प्रतिशत, महिंद्रा एंड महिंद्रा 5.15 प्रतिशत और बजाज फिनसर्व में 4.66 प्रतिशत की बढ़त रही। दूसरी ओर नुकसान में रहने वाले शेयरों में एनटीपीसी, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, अदाणी पोर्ट्स और आईटीसी शामिल हैं।
पिछले लगातार छह कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स 6,063.98 अंक यानी 8.27 प्रतिशत चढ़ा है, जबकि निफ्टी में 1,837.75 अंक यानी आठ प्रतिशत की तेजी आई है। वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 1.59 प्रतिशत बढ़कर 96.12 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स लि. के शोध प्रमुख विनोद नायर ने कहा, अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों से भारतीय शेयर बाजार को नई गति मिली है।
बाजार में तेजी इस उम्मीद से और बढ़ी है कि अमेरिका का रुख नरम पड़ने से ईरान संघर्ष और शुल्क नीतियों में तनाव कम हो सकता है। उन्होंने कहा, ‘‘वैश्विक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम होने से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। इसके अलावा, अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल और डॉलर में नरमी से भारत में महंगाई की संभावनाओं और बाह्य खातों पर दबाव कम हुआ है।’’ उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में बड़ा झटका लगा है।
देश के मतदाताओं ने मंगलवार को हुए बहुचर्चित मध्यावधि चुनावों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को संसद के उच्च सदन सीनेट का नियंत्रण सौंप दिया और डेमोक्रेट ने कई अहम राज्यों में गवर्नर पदों पर भी जीत दर्ज की। इन नतीजों का असर न केवल अमेरिका, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने बुधवार को 7,284.03 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
नायर के अनुसार, विदेशी निवेशकों की लगातार लिवाली और दूसरी तिमाही के कंपनियों के बेहतर नतीजों से बाजार में सकारात्मक माहौल को और मजबूती मिली। निवेशकों की बढ़ती भागीदारी ने इस तेजी को अधिक भरोसेमंद बनाया। मझोली कंपनियों से जुड़ा बीएसई मिडकैप सेलेक्ट सूचकांक 1.79 प्रतिशत उछला, जबकि छोटी कंपनियों के स्मॉलकैप सेलेक्ट में 0.22 प्रतिशत की तेजी रही।
बीएसई में सूचीबद्ध शेयरों में से कुल 2,994 शेयरों में तेजी रही जबकि 1,453 शेयरों में गिरावट आई। वहीं 200 शेयर के भाव अपरिवर्तित रहे। शोध विश्लेषण कंपनी एचएसटी वेल्थ के संस्थापक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) हरिसेल्वन राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘भारतीय शेयर बाजार में लगातार छठे कारोबारी सत्र में तेजी रही।
अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों से ईरान के साथ बातचीत के जरिये तनाव कम होने की उम्मीदें बढ़ीं, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से कमी आई। इसका बाजार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। एशिया के अन्य बाजारों में दक्षिण कोरिया का कॉस्पी और जापान का निक्की भारी गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि चीन में शंघाई एसएसई कम्पोजिट और हांगकांग का हैंग सेंग बढ़त में रहे।
यूरोप के बाजारों में दोपहर के कारोबार में सकारात्मक रुख था। अमेरिकी बाजार बुधवार को मजबूत बढ़त के साथ बंद हुए थे। डाउ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज में 3.03 प्रतिशत, एसएंडपी 500 में 1.58 प्रतिशत और नैस्डैक कम्पोजिट में 1.44 प्रतिशत की तेजी आई।
सेंसेक्स बुधवार को 383.55 अंक यानी 0.50 प्रतिशत बढ़कर दो महीने से अधिक के उच्चतम स्तर 77,301.40 अंक पर बंद हुआ था। निफ्टी भी 149.75 अंक यानी 0.63 प्रतिशत चढ़कर 23,960.60 अंक पर रहा था।
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