तेहरान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फोआद इजादी ने अल जजीरा के साथ बातचीत में एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने (बाल्कनाइजेशन) की योजना बना रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस पुराने बयान की ओर इशारा किया, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि युद्ध के बाद ईरान का नक्शा शायद वैसा न रहे जैसा आज है। प्रोफेसर के अनुसार, इसका सीधा मतलब है कि ईरान के भूगोल को बदलने की तैयारी चल रही है।
तेल पर कब्जे की राजनीति
प्रोफेसर इजादी का मानना है कि ट्रंप की मुख्य दिलचस्पी ईरान के उन हिस्सों में है जहां तेल का भारी भंडार है। उन्होंने कहा कि अमेरिका शायद फारस की खाड़ी के उत्तरी किनारे पर स्थित तेल से भरपूर इलाकों को ईरान से अलग कर सकता है और वहां अपना कोई इंचार्ज बिठा सकता है। उनके मुताबिक, ट्रंप को तेल पसंद है, चाहे वह वेनेजुएला का हो या ईरान का। बाकी का ईरान, जिसमें तेल नहीं होगा, उसे पड़ोसी देशों के कब्जे के लिए या अकेले छोड़ दिया जाएगा।
सरकार गिराने की आशंका
प्रोफेसर ने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान की सरकार को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे ईरान के राष्ट्रपति को निशाना बना सकते हैं ताकि पूरी व्यवस्था ढह जाए और देश का बंटवारा करना आसान हो जाए। उनके अनुसार, यह पूरी रणनीति ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खत्म करने के लिए बनाई जा रही है।
कितना विशाल है ईरान?
ईरान दुनिया का 17वां सबसे बड़ा देश है, जो लगभग 16.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसकी विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह भारत के आकार का लगभग आधा और इजरायल से 80 गुना बड़ा है। इसकी सीमाएं सात देशों से लगती हैं, जिनमें इराक के साथ सबसे लंबी सीमा है। इसके अलावा तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, अजरबैजान, तुर्किये और आर्मेनिया इसके पड़ोसी देश हैं।
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श्रीलंका के पास हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को डुबोए जाने के मामले में एक नया खुलासा हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में मारे गए एक नाविक ने अपने पिता को फोन पर बताया था कि अमेरिकी सेना ने जहाज छोड़ने के लिए क्रू को दो बार चेतावनी दी थी। यह जानकारी ईरान के उस आधिकारिक दावे को झुठलाती है, जिसमें कहा गया था कि हमला बिना किसी चेतावनी के किया गया था।
कमांडर और क्रू के बीच बहस
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चेतावनी मिलने के बाद क्रू के सदस्यों और युद्धपोत के कमांडर के बीच बहस हुई थी। नाविक जहाज छोड़ना चाहते थे, लेकिन कमांडर ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी। बुधवार को हुए इस हमले में अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो का इस्तेमाल किया, जिसमें दर्जनों नाविकों की जान चली गई। श्रीलंका की नौसेना ने बचाव अभियान चलाकर 87 शव बरामद किए हैं और 32 लोगों को सुरक्षित बचाया है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐतिहासिक घटना
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस हमले को शांत मौत करार दिया है। उन्होंने बताया कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है जब अमेरिका ने किसी दुश्मन के युद्धपोत को डुबोने के लिए पनडुब्बी का इस्तेमाल किया है। इस घटना से अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है।
भारत के लिए क्यों है यह खबर अहम?
यह ईरानी युद्धपोत हाल ही में भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नौसेना अभ्यास मिलन 2026 और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में शामिल हुआ था। इस वजह से भारतीय रक्षा विशेषज्ञ भी इस पूरी घटना पर करीब से नजर रख रहे हैं।
बचे हुए नाविकों पर फंसा पेंच
इस बीच, एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका ने श्रीलंका सरकार से संपर्क किया है। अमेरिका ने श्रीलंका से आग्रह किया है कि वह बचाए गए 32 नाविकों और एक अन्य ईरानी जहाज IRIS बूशहर के 208 नाविकों को फिलहाल वापस ईरान न भेजे।
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