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नेपाल में नई पार्टी के सत्ता संभालने की तैयारी, भारत से संबंध बेहतर होने की संभावना

काठमांडू, 8 मार्च (आईएएनएस)। नेपाल के चुनाव परिणाम काठमांडू और नई दिल्ली के बीच संबंधों को फिर से पटरी पर लाने का अवसर दे सकते हैं, जो हाल के समय में खासे मधुर नहीं रहे हैं। हिमालयी देश नेपाल में अब एक मजबूत सरकार बनने की उम्मीद है, जो जमी बर्फ को पिघलाने के लिए जरूरी पहल कर सकती है।

भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि द्विपक्षीय संबंधों की आधारशिला है, जो खुले सीमा संबंधों और सांस्कृतिक निकटता पर जोर देती है। भारत नेपाल का प्रमुख सहयोगी रहा है और व्यापार व निवेश पहलों में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है।

इसके अलावा दोनों देशों के संबंध सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव से भी गहरे जुड़े हैं, जिनमें लोगों के बीच व्यापक संपर्क शामिल हैं।

मजबूत संबंधों के बावजूद नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण रिश्तों में उतार-चढ़ाव भी आए हैं। सीमा विवाद, बढ़ता अविश्वास, सुरक्षा चिंताएं और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों ने द्विपक्षीय संबंधों को और जटिल बना दिया है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने 5 मार्च को हुए चुनावों के सफल आयोजन का स्वागत करते हुए कहा, “भारत ने हमेशा नेपाल में शांति, प्रगति और स्थिरता का समर्थन किया है। इसी प्रतिबद्धता के तहत नेपाल सरकार के अनुरोध पर इन चुनावों के लिए आवश्यक लॉजिस्टिक सहायता भी प्रदान की है।”

विदेश मंत्रालय ने कहा, हम नेपाल की नई सरकार के साथ मिलकर दोनों देशों और लोगों के बीच बहुआयामी मजबूत संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए काम करने की उम्मीद करते हैं और सरकार तथा नेपाल की जनता को बधाई दी।

जब चुनाव परिणाम आकार ले रहे थे, तब नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत जयंत प्रसाद ने आईएएनएस से कहा, “मेरी एकमात्र आशा व इच्छा और कुछ हद तक विश्वास यह है कि चुनाव ऐसा स्पष्ट जनादेश दे, जिससे नेपाल में सुशासन स्थापित हो सके।”

हाल के वर्षों में नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ा है, जिसने भारत की कुछ क्षेत्रों में चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालांकि अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेपाल में अगली सरकार बनाने की संभावना है, लेकिन कूटनीतिक समीकरणों में तुरंत बड़े बदलाव की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के “प्रो-चीन” रुख से अलग, जब पार्टी ने भारत की सीमा से सटे पूर्वी जिले झापा में एक प्रमुख परियोजना का उल्लेख नहीं किया, तो इसे नीति में संभावित बदलाव के संकेत के रूप में देखा गया।

झापा जिले में प्रस्तावित दमक इंडस्ट्रियल पार्क बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का हिस्सा था, जिसे भारत ने रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र मानते हुए पहले ही चिंता जताई थी, क्योंकि यह भारत के संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर या “चिकन नेक” के पास स्थित है।

हालांकि उसी घोषणापत्र में आरएसपी ने भारत के साथ विनिमय दर की समीक्षा का भी वादा किया है। 1993 से 100 भारतीय रुपये के बराबर 160 नेपाली रुपये तय हैं, चाहे वैश्विक अर्थव्यवस्था में कुछ भी हो रहा हो।

चुनाव से पहले पार्टी ने घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर वह भारत के साथ मुद्रा विनिमय दर में बदलाव पर विचार करेगी। आरएसपी ने अपने वादे में कहा, “भारतीय रुपये के साथ विनिमय दर तीन दशकों से स्थिर है, इसलिए हम अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की भागीदारी के साथ इस व्यवस्था का अध्ययन और समीक्षा करेंगे।”

जहां पहले की सरकारों को अक्सर “प्रो-इंडिया” या “प्रो-चीन” नीतियों के रूप में देखा जाता रहा है, वहीं आरएसपी के संभावित प्रधानमंत्री उम्मीदवार बालेंद्र शाह को मजबूत राष्ट्रवादी माना जाता है। उनकी पीढ़ी के कई नेताओं की तरह वे दोनों पड़ोसी शक्तियों से समान दूरी बनाए रखने और किसी भी टकराव की स्थिति में पक्ष न लेने के पक्षधर माने जाते हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने “नेपाल फर्स्ट” का नारा देकर मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश की। हालांकि अतीत में उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे बयान भी दिए थे, जिन्हें कोई राजनेता या राजनयिक सामान्यतः नहीं कहता। उनके समर्थक मानते हैं कि वह केवल नेपाल के हितों के लिए काम करेंगे।

इंजीनियर-रैपर से राजनेता बने शाह ने अपने मेयर कार्यालय में “ग्रेटर नेपाल” का एक नक्शा भी लगाया था, जिसमें भारत के कुछ क्षेत्रों को शामिल दिखाया गया था। इसे नई संसद भवन में लगे “अखंड भारत” भित्तिचित्र के प्रतीकात्मक जवाब के रूप में देखा गया।

उन्होंने एक समय भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की थी, जब एक फिल्म में देवी सीता को “भारत की बेटी” बताया गया था। शाह ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि परंपराओं के अनुसार उनका जन्मस्थान नेपाल की सीमा के भीतर या बिहार से सटे क्षेत्र में माना जाता है।

जब वह पद संभालेंगे, तो यह नेपाल में 2015 में संविधान लागू होने के बाद पहली बार होगा जब किसी एक दल की सरकार बनेगी।

रोजगार और अर्थव्यवस्था प्रमुख मुद्दे होने के कारण आरएसपी नेता ‘नेपाल फर्स्ट’ नीति पर जोर देंगे। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जहां से 8.6 अरब डॉलर यानी लगभग 63 प्रतिशत आयात होता है, जबकि चीन 1.8 अरब डॉलर यानी 13 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है।

--आईएएनएस

जेबी/डीपीबी/पीयूष

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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तेहरान में घटाया गया ईंधन कोटा, तेल ठिकानों पर हमलों के बाद फैसला

तेहरान, 8 मार्च (आईएएनएस)। तेहरान स्थित तेल ठिकानों पर हमले के बाद प्रशासन ने लोगों के लिए ईंधन कोटा कम करने का फैसला लिया है। फार्स समाचार एजेंसी ने इसकी जानकारी दी है।

एजेंसी के अनुसार, तेहरान प्रांत के गवर्नर ने पर्सनल कार्ड से फ्यूल कोटा 30 लीटर (7.9 गैलन) हर दिन से घटाकर 20 लीटर (5.2 गैलन) करने की अपील की। अधिकारी ने यह भी कहा कि लोगों को फ्यूल की चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि फ्यूल सप्लाई में रुकावटों को जल्द ही ठीक कर लिया जाएगा, और दो या तीन दिन बाद इस कदम को वापस लेने का वादा किया।

गवर्नर ने कहा कि यह व्यवस्था अस्थायी है और स्थिति सामान्य होने पर दो या तीन दिनों के भीतर पहले की तरह ईंधन कोटा बहाल कर दिया जाएगा।

तेहरान के तेल ठिकानों पर हमले के बाद घंटों आग धधकती देखी गई। कई वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें हमले के कुछ घंटों बाद, ईरान की राजधानी के ऊपर आसमान धुएं से ढका हुआ देखा जा सकता है।

स्टेट टेलीविजन पर एक अधिकारी ने बताया कि अमेरिका-इजरयाल ने राजधानी और उसके आसपास रात भर में पांच तेल ठिकानों पर हमला किया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई।

वहीं, ईरान की रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने ऑयल प्लांट्स में धमाकों के बाद जहरीली बारिश की चेतावनी दी है। ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी (आईआरसीएस) ने आम लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी। सोसाइटी ने कहा है कि तेल प्लांट में धमाकों के बाद जहरीली बारिश हो सकती है। ऐसी बारिश से स्किन पर केमिकल बर्न हो सकता है और फेफड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।

सैन्य संघर्ष के नौ दिन पूरे हो चुके हैं। इजरायली मीडिया वाइनेट ने बताया कि ईरान के 30 फ्यूल टैंकों और 3 तेल डिपो को निशाना बनाया गया है।

ईरान ने भी पलटवार करते हुए 5 देशों को निशाने पर लिया। इजरायल के अलावा कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात पर हमले किए। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कहा है कि वे अमेरिका और इजरायल के खिलाफ छह महीने तक युद्ध लड़ने में सक्षम हैं।

--आईएएनएस

केआर/

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