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अमेरिका में अब्दुल ने रचा इतिहास! ट्रंप के प्रत्याशी को हराकर बने पहले मुस्लिम सीनेटर

First Muslim Senator Abdul: अमेरिकी चुनाव में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. सीनेट में पहली बार मुस्लिम सदस्य की एंट्री होने जा रही है. डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल ने मिशिगन में रिपब्लिकन उम्मीदवार को हरा दिया है. अमेरिकी इतिहास में यह पहली बार हो रहा है. 

फॉक्स न्यूज डिसीजन डेस्क के अनुमान के मुताबिक, डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने मिशिगन में रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को हरा दिया है. इस जीत के साथ अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बनकर इतिहास रचेंगे. उनकी जीत को अमेरिकी राजनीति में एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है.

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SIR पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, फॉर्म 6 से हटाया घोषणा पत्र, अब नए वोटरों को भरने होंगे दो अलग-अलग दस्तावेज

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर अपनी व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है. अब नए मतदाताओं को वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन फॉर्म 6 के साथ SIR से संबंधित घोषणा पत्र नहीं भरना होगा. आयोग ने इस घोषणा पत्र को फॉर्म 6 से अलग कर दिया है. अब नए वोटरों को दोनों दस्तावेज अलग-अलग जमा करने होंगे. यह बदलाव ऐसे समय किया गया है, जब फॉर्म 6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त शर्त शामिल करने को लेकर आयोग के भीतर ही सवाल उठ रहे थे. दो चुनाव आयुक्तों ने इस व्यवस्था की कानूनी वैधता पर आपत्ति जताई थी. इनमें सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं.

21 अक्टूबर को लिया गया फैसला

'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने 21 अक्टूबर 2026 को SIR घोषणा पत्र को फॉर्म 6 से अलग करने का फैसला लिया था. आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी इस बदलाव की जानकारी दी. दरअसल, पहले ऑनलाइन फॉर्म 6 के साथ SIR का घोषणा पत्र भी जोड़ दिया गया था. इसके पीछे आयोग का तर्क था कि इससे आवेदकों को एक ही OTP और ई-सिग्नेचर के जरिए दोनों प्रक्रियाएं पूरी करने की सुविधा मिलेगी. हालांकि, इस व्यवस्था पर कानूनी सवाल उठने लगे। इसके बाद आयोग ने दोनों दस्तावेजों को अलग-अलग करने का निर्णय लिया.

क्या जानकारी मांगी जाती थी घोषणा पत्र में?

फॉर्म 6 का इस्तेमाल 18 साल की उम्र पूरी करने वाले नए मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए किया जाता है. ऑनलाइन आवेदन में पहले SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा शामिल थी. इसमें आवेदक को तीन विकल्पों में से किसी एक को चुनना पड़ता था. पहले विकल्प में पूछा जाता था कि क्या आवेदक का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार हुई मतदाता सूची में शामिल था. दूसरे विकल्प में माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस सूची में होने की जानकारी मांगी जाती थी. तीसरे विकल्प में यह बताना होता था कि आवेदक और उसके माता-पिता का नाम पुरानी सूची में दर्ज नहीं था. इस घोषणा का जवाब दिए बिना आवेदन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती थी. विवाद इसी बात को लेकर था कि क्या चुनाव आयोग निर्धारित नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म 6 में ऐसी अतिरिक्त शर्त जोड़ सकता है.

दो चुनाव आयुक्तों ने उठाए थे सवाल

इस व्यवस्था को लेकर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. उनका कहना था कि फॉर्म 6 का प्रारूप मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय किया गया है. इसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. ऐसे में आयोग अपनी ओर से इसमें कोई नई शर्त नहीं जोड़ सकता. इसके बाद 13 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाए. उन्होंने SIR घोषणा को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए इसे हटाने की बात कही थी. हालांकि, अगस्त में भी ऑनलाइन फॉर्म में यह कॉलम मौजूद रहा. 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद यह मामला और चर्चा में आ गया.

सुप्रीम कोर्ट में आयोग ने क्या कहा?

चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में कोई कानूनी संशोधन नहीं किया गया था. SIR घोषणा को ऑनलाइन आवेदन के साथ जोड़ने का मकसद केवल प्रक्रिया को आसान बनाना था, ताकि आवेदकों को दो बार OTP और ई-सिग्नेचर की जरूरत न पड़े. हालांकि, आयोग ने माना कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर घोषणा पत्र को जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव कर दिया गया है. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म के निर्धारित प्रारूप में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. इसी कानूनी चिंता को देखते हुए 21 अक्टूबर को घोषणा पत्र को अलग करने का फैसला लिया गया.

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पांच हफ्तों में आयोग ने बदले कई फैसले

SIR घोषणा पत्र को अलग करना चुनाव आयोग के हालिया बदलावों में से एक है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मुद्दों पर कुल 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इसके बाद बीते करीब पांच हफ्तों में आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली से जुड़े कई फैसलों में बदलाव किए हैं. अब आयोग की बैठकों का एजेंडा पहले साझा करने और बैठक के बाद कार्यवाही का विवरण जारी करने का फैसला लिया गया है. इसके अलावा अधिकारियों को विदेश यात्रा पर जाने के लिए आयोग की मंजूरी लेनी होगी. नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल तैयार करने से पहले उन्हें अधिकारियों की समिति और फिर पूरे आयोग की मंजूरी से गुजरना होगा. ECINet सिस्टम को कानूनी प्रावधानों के अनुरूप बनाने के लिए भी एक समिति गठित की गई है. वहीं, महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से सुझाए गए कुछ बदलाव भी लागू किए गए हैं. अब मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने के लिए पहले से तय 13 श्रेणियों तक सीमित नहीं रखा जाएगा. तार्किक विसंगतियों वाले मामलों में फैसला लेने का अधिकार जिला निर्वाचन अधिकारी के अलावा निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को भी दिया गया है.

गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी चर्चा में

इस बीच गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया है. इन लोगों के नाम शुरुआती मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. बाद में दस्तावेज जमा करने पर स्थानीय अधिकारियों ने उनके नाम बहाल करने की मंजूरी दे दी, लेकिन ECINet सॉफ्टवेयर में नाम दोबारा जोड़ने का विकल्प उपलब्ध नहीं था. आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, इन 97 लोगों में से 88 ने फॉर्म 6 भर दिया है और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए हैं. छह लोग देश से बाहर हैं, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट हैं. फॉर्म 6 से SIR घोषणा पत्र को अलग करने का फैसला ऐसे समय आया है, जब मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है. अब देखना होगा कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है. 

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