लाइन पर आ रहा है अमेरिका! भारत के साथ खराब हुए रिश्तों पर लगा रहा है 'तेल' का मरहम, रूस बना 'बाम'
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न कोई दुश्मन, बस 'हित' सर्वोपरि होते हैं। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए तनाव ने अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। कल तक जो अमेरिका रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25% दंडात्मक शुल्क (टैरिफ) लगा रहा था, आज वही अमेरिका भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों की विशेष छूट देने को तैयार है। इसे कूटनीतिक हलकों में भारत की बड़ी जीत और अमेरिका का 'नरम पड़ता रुख' माना जा रहा है।
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ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के बीच अमेरिका ने कहा कि वह भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने के लिए अस्थायी रूप से 30 दिनों की छूट दे रहा है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बृहस्पतिवार को कहा, ‘‘राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऊर्जा एजेंडे के कारण तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गया है। वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति जारी रखने के लिए वित्त मंत्रालय भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने के लिए अस्थायी रूप से 30 दिन की छूट दे रहा है।’’
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उन्होंने कहा कि यह ‘‘सोच-समझकर उठाया गया अल्पकालिक कदम’’ है और इससे रूसी सरकार को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि यह केवल तेल के उन लेनदेन को अधिकृत करता है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए तेल से जुड़े हैं। बेसेंट ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘भारत, अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार है और हमें पूरी उम्मीद है कि नयी दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाएगा। यह अस्थायी कदम ईरान द्वारा वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को अवरुद्ध करने की कोशिश से पैदा हुए दबाव को कम करेगा।’’
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क (टैरिफ) लगाया था। अमेरिकी प्रशासन का कहना था कि नयी दिल्ली द्वारा तेल की खरीद यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को बढ़ावा देने में मदद कर रही है। पिछले महीने अमेरिका और भारत ने घोषणा की थी कि दोनों देशों के बीच व्यापार पर एक अंतरिम समझौते के लिए एक रूपरेखा तय हो गई है। इसके बाद ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क को हटा दिया और यह भी कहा कि नयी दिल्ली ने मॉस्को से ऊर्जा आयात बंद करने एवं अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है।
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पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में संभावित व्यवधानों के बीच, अमेरिका ने भारत को एक भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार का आश्वासन दिया है। अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने गुरुवार को रायसीना डायलॉग में स्पष्ट किया कि अमेरिका, भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित संकरे जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान द्वारा लगभग अवरुद्ध कर दिए जाने के बाद वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। वैश्विक तेल और एलएनजी (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य के जरिये ले जाया जाता है। भारत कच्चे तेल की अपनी 88 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की लगभग 50 प्रतिशत आवश्यकता की पूर्ति आयात से करता है।
ज्यादातर आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है। रायसीना डायलॉग में लैंडौ ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि भारत वैकल्पिक स्रोतों के बारे में सोच रहा है। मुझे अमेरिका से बेहतर कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं दिखता, हम भारत के साथ सहयोग करना चाहते हैं।”
उन्होंने कहा, “हम आपके साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि आपकी अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी हों।” लैंडौ ने भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते का भी जिक्र किया और कहा कि यह ‘‘अब लगभग अंतिम चरण में है।
अमेरिका का प्रस्ताव: एक 'बेहतर विकल्प'
रायसीना डायलॉग में बोलते हुए क्रिस्टोफर लैंडौ ने भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का सुझाव दिया। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:-
वैकल्पिक स्रोत: लैंडौ ने कहा, "मुझे अमेरिका से बेहतर कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं दिखता।" उन्होंने भारत को अमेरिकी ऊर्जा बाजार की ओर देखने के लिए प्रोत्साहित किया।
पूर्ण सहयोग का वादा: उन्होंने भारत को आश्वस्त किया कि अमेरिका अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों ही स्तरों पर भारत की ऊर्जा मांग सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करेगा।
व्यापार समझौता: लैंडौ ने भारत और अमेरिका के बीच चल रहे प्रस्तावित व्यापार समझौते पर भी सकारात्मक अपडेट दिया, उनके अनुसार यह अब "लगभग अंतिम चरण" में है।
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