नीतीश कुमार के बाद बिहार का कौन होगा मुख्यमंत्री:सम्राट चौधरी रेस में सबसे आगे, नीतीश के हनुमान विजय चौधरी भी दावेदार, देखिए पूरी लिस्ट
नीतीश कुमार ने X पर पोस्ट कर राज्यसभा जाने का ऐलान किया है। उन्होंने बिहार में नई सरकार को अपना पूरा सहयोग करने की भी बात कही है। अब यह भी तय हो गया कि बिहार में अब नीतीश युग का अंत हो गया। साथ ही अब इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि नीतीश कुमार के बाद बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा…? क्या पहली बार बिहार में बीजेपी का CM बनेगा? क्या नीतीश के किसी करीबी को CM बनाया जाएगा। क्या 4 दशक बाद बिहार को सवर्ण CM बन सकता है..? सबसे पहले सत्ता के दो फॉर्मूले को समझिए, जिसकी चर्चा चल रही है… अब इसे विस्तार से समझिए सूत्रों की मानें तो BJP खासकर अमित शाह नहीं चाहते थे कि 20 नवंबर 2025 को गांधी मैदान में नीतीश कुमार CM पद की शपथ लें। BJP की तरफ से ऑफर दिया गया था कि नीतीश कुमार अपनी पसंद के किसी नेता का नाम बता दें। वे जिसे अपनी पसंद बता देंगे BJP उसे CM स्वीकार कर लेगी। BJP 26 साल पुरानी गलती नहीं दोहराना चाहती BJP अब किसी भी सूरत में अपनी 26 साल पुरानी गलती नहीं दोहराना चाहती। तब 2000 विधानसभा चुनाव में BJP को 67 सीटें आईं थी और नीतीश कुमार की अगुआई वाली समता पार्टी को 34 सीटें मिली थी। अब BJP के CM के दावेदारों को जानिए 1. सम्राट को आगे कर लव-कुश समीकरण साधेगी सम्राट चौधरी कोइरी समाज से आते हैं। नीतीश कुमार कुर्मी हैं। इन दोनों को बिहार की सियासत में लव-कुश कहा जाता है। दोनों की आबादी (कोइरी-4.21% कोइरी 2.87%) तकरीबन 7 फीसदी है। इन्हीं के दम पर नीतीश कुमार अपनी राजनीति करते रहे हैं। ऐसे में अगर सम्राट को BJP आगे बढ़ाती है तो नीतीश का ये वोट बैंक उनके पास रह सकता है। BJP बिहार में OBC को साधने के लिए गैर यादव OBC को लगातार साधने का प्रयास कर रही है और इस समीकरण में सम्राट चौधरी बिल्कुल फिट बैठते हैं। कोइरी बिहार में यादव के मुकाबले एक मजबूत पिछड़ी जाति मानी जाती है। सरकार से लेकर संगठन तक का अनुभव सम्राट चौधरी के पास सरकार चलाने से लेकर संगठन चलाने तक का अनुभव है। राबड़ी सरकार में सबसे कम उम्र का मंत्री बनने से लेकर वे मौजूदा समय में दो बार नीतीश सरकार में डिप्टी सीएम रह चुके हैं। इससे पहले वे नीतीश सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। सरकार के साथ-साथ वे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। पार्टी के भीतर वे सचिव, उपाध्यक्ष से लेकर प्रदेश के अध्यक्ष की भूमिका भी निभा चुके हैं। ऐसे में उनके पास हर तरह का अनुभव है। विपक्षी के खिलाफ आक्रामक शैली सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी ताकत है उनकी आक्रामक शैली। बीजेपी के भीतर ये एकमात्र ऐसे नेता हैं जब नीतीश कुमार के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष थे तब उन पर उतना ही तीखा हमला बोला जितना एग्रेसवली ये लालू प्रसाद यादव या तेजस्वी यादव पर अटैक करते हैं। ये बीजेपी की राजनीतिक शैली के लिए फिट हैं। सम्राट के अलावा फिलहाल बिहार में कोई ऐसे नेता नहीं हैं जो लालू और नीतीश दोनों पर आक्रामक रुख रखते हैं। सम्राट के खिलाफ निगेटिव- दूसरी पार्टी से बीजेपी में आए सम्राट चौधरी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है वो है उनका दूसरी पार्टी से बीजेपी में आना। सम्राट बीजेपी में आने से पहले राजद और जदयू में थे। ऐसे में पुराने भाजपाई उनका विरोध करते हैं। जब वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे तब कई दिग्गज नेताओं ने उन्हें आयातित भाजपाई बताया था। हालांकि, असम समेत कई राज्यों में बीजेपी दूसरी पार्टी से शामिल हुए नेताओं को भी शीर्ष पद दे चुकी हैं। 2. विजय सिन्हाः RSS और मोदी का भरोसा सम्राट चौधरी की तरह विजय सिन्हा भी मौजूदा सरकार में डिप्टी सीएम हैं। विजय सिन्हा की सबसे बड़ी ताकत है संघ का भरोसा। इन्हें संघ का भरोसेमंद नेता माना जाता है। इन्होंने संघ के रास्ते बीजेपी की राजनीति में एंट्री की है और मूल भाजपाई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते है। भरपूर प्रशासनिक अनुभव विजय सिन्हा 2010 से लगातार लखीसराय विधानसभा से चुनाव जीतते आ रहे हैं। इस दौरान वे नीतीश सरकार में मंत्री से लेकर स्पीकर की भूमिका में अपनी छाप छोड़ चुके हैं। नीतीश ने जब बीजेपी का साथ छोड़ा तब विधानसभा में इन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था। इसके बाद दो बार से लगातार ये भी डिप्टी सीएम के पद पर हैं। सख्त एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में अपनी छवि बना चुके हैं। सिन्हा का निगेटिव पक्ष विजय सिन्हा के खिलाफ सबसे बड़ी निगेटिव बात ये है कि ये फॉरवर्ड समाज से आते हैं। उनकी जाति भूमिहार हैं। इनकी आबादी बिहार में फिलहाल 3 फीसदी से कम और 2.87 फीसदी है। बिहार की राजनीति बीते 35 सालों से पिछड़ा की है। ऐसे में भाजपा यह रिस्क लेना चाहेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। हालांकि, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के रूप में प्रयोग सफल रहा है। नया नाम देकर चौंका सकती है बीजेपी BJP हर राज्य में मुख्यमंत्री के चेहरे पर चौंकाते रही है। ऐसे में बीजेपी पहली बार जब बिहार में अपना सीएम बनाएगी तो यहां भी चौंका सकती है। किसी EBC चेहरे या यादव चेहरे पर भी दांव लगा सकती है। हालांकि, प्रदेश स्तर के कोई भी नेता इस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। अब JDU के दावेदारों को जानिए JDU के बारे में दो तरह की चर्चाएं हो रही हैं। अगर नीतीश कुमार की चली तो JDU का अपना सीएम होगा। अगर BJP इस बात पर राजी नहीं होती है तो सरकार के मौजूदा फॉर्मूले की तरह JDU का दो डिप्टी सीएम होगा। नीतीश अपने हनुमान विजय चौधरी पर जता सकते हैं भरोसा विजय चौधरी जदयू के भीतर और बाहर एक ऐसा नेता हैं, जिन्हें नीतीश कुमार का 'नंबर 2' माना जाता है। वे सरकार की पॉलिसियों और रणनीतियों को बनाने वाली 'कोर कमेटी' के अहम सदस्य हैं। नीतीश बिहार में कहीं जाएं विजय चौधरी हमेशा उनके साथ होते हैं। रणनीतिक मामलों में उन्होंने नीतीश कुमार का हनुमान माना जाता है। विजय चौधरी एक ऐसे नेता हैं, जो विवादों से हमेशा दूर रहते हैं। अपनी मृदुभाषी शैली और प्रशासनिक पकड़ के लिए जाने जाते हैं। वित्त, शिक्षा ग्रामीण कार्य, जल संसाधन, संसदीय कार्य जैसे कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इसके अलावा विधानसभा में स्पीकर भी रह चुके हैं। खुद सरकार से हट बेटे की करा सकते हैं एंट्री नीतीश कुमार खुद बिहार की सियासत से अलग होकर अपने बेटे को सरकार और संगठन की कमान सौंप सकते हैं। निशांत अभी तक पॉलिटिक्स से लगभग खुद को अलग रखते ही आए हैं। 2025 विधानसभा चुनाव के दौरान से वे लगातार इसमें एक्टिव हुए हैं। ऐसे में नीतीश कुमार के अलग होने के बाद जाति और पार्टी के बीच कॉम्बिनेशन स्थापित करने के लिए ऐसे नेता की दरकार थी जिनकी स्वीकार्यता सभी के बीच हो। इसमें निशांत कुमार पूरी तरह फिट बैठते हैं। इनके अलावा भी कई नेता रेस में हैं इनके अलावा अशोक चौधरी दलित समाज से आते हैं और नीतीश कुमार को अपना मानस पिता भी कहते रहे हैं। जातीय पॉलिटिक्स के समीकरण में भी पूरी तरह फिट बैठते हैं। ऐसे में उन्हें भी मौका मिल सकता है। नीतीश अपने ही समाज के किसी नेता या EBC चेहरे को भी आगे कर सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश में 8 महीने से CIC-IC पद खाली:1300 से ज्यादा अपीलें लंबित, पूर्व सूचना आयुक्त बोले- RTI को कमजोर कर रही कांग्रेस
हिमाचल सरकार 8 महीने से चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर (CIC) और इन्फॉर्मेशन कमिश्नर (IC) की तैनाती नहीं कर पाई है। इससे सूचना का अधिकार कानून (RTI) एक्ट के तहत इन्फॉर्मेशन कमीशन ऑफिस में अपीलों के ढेर लग गए हैं। CIC और IC की तैनाती नहीं होने से अपीलों की सुनवाई नहीं हो पा रही है। कमीशन ऑफिस इससे सफेद हाथी साबित हो रहा है। राज्य सरकार बार-बार CIC और IC के लिए आवेदन आमंत्रित कर रही है। एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म डिपार्टमेंट ने तीसरी बार इच्छुक दावेदारों से फ्रेश आवेदन आमंत्रित किए हैं। इसकी अंतिम तिथि 20 मार्च रखी गई है। इससे पहले सरकार जून 2025 और दिसंबर 2025 में भी CIC और IC के लिए आवेदन मांग चुकी है। एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म डिपार्टमेंट की सेक्रेटरी ए. शेनामोल ने बताया कि CIC और IC के लिए फ्रेश आवेदन मांगे गए हैं। जिन्होंने पहले आवेदन कर रखा है, उन्हें भी दोबारा एप्लिकेशन देनी होगी। सूचना के अनुसार, इन्फॉर्मेशन कमीशन ऑफिस में RTI के तहत जानकारी नहीं देने की 1300 से ज्यादा नई शिकायतें प्राप्त हो चुकी हैं। पुरानी शिकायतें भी सुनवाई नहीं होने की वजह से लंबित पड़ी हैं। इससे लोगों को RTI के तहत सूचनाएं नहीं मिल पा रही हैं। RTI को कमजोर कर रही सरकार: बातिश प्रदेश के पूर्व सूचना आयुक्त केडी बातिश ने बताया कि CIC और IC की नियुक्ति न कर सरकार RTI को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार का RTI में कोई विश्वास नहीं है। UPA सरकार ने कानून तो जरूर बना दिया, लेकिन कांग्रेस को पारदर्शिता पर विश्वास नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि राज्य में अमूमन रिटायर IAS ही CIC और IC लगाए जाते रहे हैं, जबकि एक्ट में एडवोकेट, प्रोफेसर, साइंटिस्ट आदि को भी नियुक्त किए जाने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि रिटायर व थके अधिकारी नियुक्ति के बाद काम नहीं करते। ऐसे में एक्ट के प्रावधान के मुताबिक अन्य लोगों को भी अवसर मिलना चाहिए। क्यों जरूरी है CIC-IC? सरकारी विभाग से जब कोई व्यक्ति RTI के तहत सूचना मांगता है और संबंधित विभाग के जन सूचना अधिकारी (PIO) जानकारी देने से इनकार करते हैं, तो उस स्थिति में लोग संबंधित विभाग की फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी के पास पहली अपील करते हैं। फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी से भी जब सूचना नहीं मिलती, तब सूचना मांगने वाला व्यक्ति इन्फॉर्मेशन कमीशन के पास पहुंचता है। इसके बाद सूचना आयोग अपीलकर्ता और संबंधित विभाग, दोनों को सुनता है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग RTI के तहत मांगी गई जानकारी देने को लेकर फैसला सुनाता है। हिमाचल में कब से और क्यों खाली पड़े CIC-IC के पद पूर्व IAS एसएस गुलेरिया IC थे और आरडी धीमान CIC थे। एसएस गुलेरिया 3 जुलाई 2025 को रिटायर हुए। जून 2025 में ही पूर्व CIC आरडी धीमान को रेरा (रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण) में चेयरमैन लगाया गया। तब से CIC का पद भी खाली पड़ा है। CIC-IC के पास अपीलों की सुनवाई का अधिकार सूचना आयोग में अपील की सुनवाई का अधिकार CIC और IC के पास है। प्रदेश में अभी तक सूचना आयोग का मुख्यालय शिमला में है। सूचना आयोग शिमला के अलावा धर्मशाला और मंडी में भी बीच-बीच में अपनी कोर्ट लगाता रहा है। इन जिलों में जाकर आयोग अपीलों का निपटारा करता रहा है। हालांकि, अब दफ्तर को कांगड़ा शिफ्ट करने की तैयारी है। इन्फॉर्मेशन कमीशन ऑफिस में स्टाफ अभी भी मौजूद है, लेकिन CIC और IC के बिना उनके होने का कोई फायदा नहीं है। कमीशन ऑफिस की कोर्ट CIC और IC की तैनाती के बाद ही संभव है। कौन बन सकता है CIC और IC? CIC और IC बनने के लिए व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित होना चाहिए, जिसके पास लॉ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंचार माध्यम या प्रशासन और शासन जैसे क्षेत्रों में व्यापक ज्ञान और अनुभव हो। ऐसे व्यक्ति CIC और IC बन सकते हैं। संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य इसके लिए आवेदन नहीं कर सकता।
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