वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है होली। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पड़ने वाला रंगों का यह त्योहार सामाजिक भेदभाव को मिटाकर सबको गले मिलने का अवसर उपलब्ध कराता है। इस दिन हर वर्ग के लोग टोलियां बनाकर अपने घर से निकलते हैं और दूसरों के घर जाकर रंग लगाते हैं, मिठाई खाते, खिलाते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। कई जगह तो इन टोलियों की ओर से सांस्कृतिक आयोजन भी किये जाते हैं। यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुलेंडी कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं और ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं।
होली पर्व के आने की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है, होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जा सकता है। होली ब्रज क्षेत्र में तो पूरे 9 दिनों के त्योहार के रूप में मनाई जाती है। धुलेंडी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है। होली के इन 9 दिनों का उल्लास और मस्ती ब्रज क्षेत्र में देखते ही बनती है। बरसाने की लठमार होली काफी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। मथुरा और वृंदावन में तो 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है।
होली में जिस तरह रंगों की विभिन्नता देखने को मिलती है उसी प्रकार इसको मनाये जाने के प्रकार में भी देश के विभिन्न प्रांतों में भिन्नता देखने को मिलती है। इस दिन उत्तराखंड के कुमाऊं की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं तो हरियाणा में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने का सब आनंद लेते हैं। महाराष्ट्र में सूखा गुलाल खेलने और गोवा में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है तथा पंजाब में होला मोहल्ला में सिखों की ओर से शक्ति प्रदर्शन किये जाने की परंपरा है। छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्य प्रदेश के मालवा अंचल तथा दक्षिण गुजरात के आदिवासी इलाकों में यह पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। बिहार में फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस दिन डीजे और ढोल की थापों पर लोग नाचते गाते और एक दूसरे को गुजिया खिलाते नजर आते हैं।
बंगाल में होली को 'डोल यात्रा' व 'डोल पूर्णिमा' कहते हैं और होली के दिन श्री राधा और कृष्ण की प्रतिमाओं को डोली में बैठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है। बंगाल में होली को 'बसंत पर्व' भी कहते हैं। इसकी शुरुआत रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शान्ति निकेतन में की थी। ओडिशा में भी होली को 'डोल पूर्णिमा' कहते हैं और इस दिन भगवान जगन्नाथ जी की डोली निकाली जाती है। राजस्थान में मुख्यतः तीन प्रकार की होली होती है। माली होली- इसमें माली जात के मर्द, औरतों पर पानी डालते हैं और बदले में औरतें मर्दों की लाठियों से पिटाई करती हैं। इसके अलावा गोदाजी की गैर होली और बीकानेर की डोलची होली भी काफी चर्चित हैं। कर्नाटक में यह त्योहार कामना हब्बा के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से जला दिया था। इस दिन कूड़ा-करकट फटे वस्त्र, एक खुली जगह एकत्रित किए जाते हैं तथा इन्हें अग्नि को समर्पित किया जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व से सामाजिक जुड़ाव काफी गहरा देखने को मिलता है क्योंकि होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाना प्रारम्भ हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं। होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कण्डे आदि रखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। उनमें ही रख दी जाती हैं मालाएं। अनेक क्षेत्रों में इन सामूहिक होलिकाओं के साथ−साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार मिलकर अतिरिक्त रूप से भी होलियां जलाते हैं। होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परम्परा है। होलिका दहन तो रात्रि में होता है, परन्तु महिलाओं द्वारा इस सामूहिक होली की पूजा दिन में दोपहर से लेकर शाम तक की जाती है। महिलाएं एक पात्र में जल और थाली में रोली, चावल, कलावा, गुलाल और नारियल आदि लेकर होलिका माई की पूजा करती हैं। इन सामग्रियों से होली का पूजन किया जाता है और जल चढ़ाया जाता है। होलिका के चारों ओर परिक्रमा देते हुए सूत लपेटा जाता है। शास्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतया वर्जित है। इस दिन पुरुषों को भी हनुमानजी और भगवान भैरवदेव की विशिष्ट पूजा अवश्य करनी चाहिए। प्रत्येक स्त्री पुरुष को होलिका दहन के समय आग की लपटों के दर्शन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
होली के दिन घरों में गुजिया, खीर, पूरी और गुलगुले आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। बेसन के सेव और दही बड़े भी उत्तर प्रदेश में इस दिन खूब बनाये जाते हैं। इस पर्व पर कांजी, भांग और ठंडाई विशेष पेय होते हैं।
कथा− कहा जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
शुभा दुबे
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यह सुहागिन नारियों का विशिष्ट व्रत है, जबकि पुरूषों के लिए इस व्रत की पूजा का देखना तक निषेध है। गणगौर पार्वतीजी के निमित्त व्रत और उनकी शोडषोपचार पूजा−आराधना करने का पर्व है, परन्तु व्यावहारिक रूप में इसने एक उल्लासपूर्ण सामाजिक उत्सव का रूप धारण कर लिया है। गणगौर पर विशेष रूप से मैदा के गुने बनाये जाते हैं। शादी के बाद पहली बार लड़की अपने मायके में गणगौर मनाती है और इन गुनों तथा सास के कपड़ों का वायना निकालकर ससुराल में भेजती है। यह प्रथम वर्ष में ही होता है। बाद में तो प्रतिवर्ष गणगौर ससुराल में ही मनाई जाती है। ससुराल में भी बहु गणगौर का उद्यापन करती है और अपनी सास को वायना, कपड़े तथा सुहाग का सारा समान देती है। इसके साथ ही सोलह सुहागिन ब्राह्मणियों को भोजन कराकर प्रत्येक को सम्पूर्ण श्रृंगार की वस्तुएं और यथाशक्ति दक्षिणा दी जाती है। इस विधि−विधान में देश और काल के अनुरूप थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है परन्तु आधारभूत विधान यही रहता है।
गणगौर के दिन पार्वतीजी की प्रतिमा अथवा चित्र की नहीं, बल्कि स्वयं बालू से गौराजी की मूर्ति बनाकर पूजा करने का विधान है। पूजा करने के पूर्व स्त्रियां सुंदर से सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण करके संपूर्ण श्रृंगार करती हैं। घर के किसी कमरे में एक पवित्र स्थान पर चौबीस अंगुल चौड़ी और चौबीस अंगुल लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर हल्दी, चंदन, कपूर, केसर आदि से उस पर चौक पूरा जाता है। इस चौक पर बालू से गौरी अर्थात् पार्वती की प्रतिमा बनाकर उस पर सुहाग की सभी वस्तुएं, कांच की चूड़ियां, महावर, सिंदूर, रोली आदि चढ़ाते हैं। गौरी की इस प्रतिमा को फल−फूल, नैवेद्य आदि अर्पण करते हुए पूर्ण भक्तिभाव से की जाती है। पार्वतीजी अर्थात् गौराजी की पूजा गौर पर चढ़ाया हुआ सिंदूर महिलाएं अपनी मांग में भरती हैं। पूजन दोपहर को होता है और इसके बाद कभी भी भोजन किया जा सकता है, परन्तु पूरे दिन में एक ही बार भोजन करने का विधान है। अनेक नगरों में आज के दिन दोपहर के समय गौराजी के जलूस भी निकाले जाते हैं।
कथा
प्राचीन काल की बात है। भगवान शिवजी पार्वतीजी और नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते−चलते वे तीनों एक गांव में पहुंचे। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी। गांव वालों ने जब सुना कि भगवान शिवजी पार्वतीजी सहित यहां पधारे हैं तब कुलीन स्त्रियां तो उनके पूजन के लिए सुंदर−सुंदर और स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। इसी तैयारी में उन्हें देर हो गई। किन्तु निम्न वर्ग की स्त्रियां जैसे बैठी थीं वैसे ही थालियों में हल्दी−चावल रखकर दौड़ी हुई शिव−पार्वती के पास पहुंच गई।
पार्वतीजी ने उनकी पूजा स्वीकार करके उनके उपर तमाम सुहाग रस छिड़क दिया और इस प्रकार वे स्त्रियां अटल सौभाग्य प्राप्त कर लौट गईं। कुछ समय बाद उच्च कुल की नारियां सोलह श्रृंगार और आभूषणों से सजी हुई, अनेक प्रकार के पकवान और पूजा की सामग्रियां सोने चांदी के थालों में सजाकर पूजन के लिए आई। उन्हें देखकर शिवजी ने कहा− हे पार्वती! तुमने तमाम सुहाग रस तो साधारण स्त्रियों में बांट दिया, अब इन्हें क्या दोगी? पार्वतीजी ने उत्तर दिया− आप इसकी चिंता न करें। उन्हें सिर्फ उपरी पदार्थों से बना रस दिया गया है, इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा। परंतु इनको में अपनी अंगुली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूंगी। जिसकी मांग में यह सुहाग रस पड़ेगा वह मेरे समान ही तन−मन से अटल सौभाग्यवती रहेगी। जब उच्च कुल की स्त्रियां पूजन कर चुकीं तब पार्वतीजी ने अपनी अंगुली चीरकर उन पर अपना रक्त छिड़का। जिस पर जैसे छींटे पड़े, उसने वैसा ही सुहाग पाया।
पार्वतीजी ने शिवजी की आज्ञा से नदी तट पर जाकर स्नान किया। फिर बालू के महादेव बनाकर वह उनका पूजन करने लगी। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया इसके बाद प्रदक्षिणा की और नदी के किनारे की मिट्टी का टीका माथे पर लगाकर दो कण बालू का प्रसाद पाया और शिवजी के पास लौट आईं। इस सब पूजन आदि में पार्वतीजी को नदी किनारे बहुत देर हो गई थी। महादेवजी ने उनसे देरी का कारण पूछा तो पार्वतीजी ने कहा कि वहां मेरे भाई−भाभी आदि मायके से आये हुए थे, इसी कारण देर हो गई। शिवजी ने हंसकर कहा− तब तो वहां तुम्हारी बहुत खातिर हुई होगी। तब पार्वतीजी ने कहा− उन्होंने मुझे और भात खिलाया है, उसे ही खाकर मैं चली आ रही हूं।
पार्वतीजी की यह बात सुनकर भगवान शिवजी भी दूध−भात खाने के लिए वहां चल पड़े। नारदजी भी साथ थे। पार्वतीजी दुविधा में पड़ गईं। उन्होंने शिवजी का ध्यान करके प्रार्थना की हे प्रभु! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूं तो आप ही इस समय मेरी लाज रखिये। मन ही मन इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पार्वतीजी भी शंकरजी के पीछे−पीछे चलने लगीं। अभी वे तीनों कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें नदी के किनारे एक अत्यन्त सुंदर महल दिखाई देने लगा। जब वे उस महल के भीतर पहुंचे तब वहां शिवजी के साले और सलहज आदि परिवार के सभी लोग मौजूद थे। उन्होंने बहन−बहनोई का बड़े प्रेम से स्वागत किया। दो दिन तक खूब मेहमानदारी होती रही।
तीसरे दिन सवेरे पार्वतीजी ने शिवजी से चलने के लिए कहा, किन्तु वे तैयार नहीं हुए। पार्वतीजी रूठकर चल दीं। तब तो शिवजी को उनका साथ देना ही पड़ा। नारदजी भी साथ ही थे। तीनों चलते−चलते बहुत दूर निकल गये। सायंकाल होने पर शिवजी बोले, मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूं। पार्वतीजी माला लेने के लिए जाने को तैयार हुईं, किन्तु शिवजी के मना करने पर वे ना जा सकीं और नारदजी माला लेने गये। नारदजी ने वहां पहुंचकर देखा कि किसी महल का निशान भी नहीं है। चारों ओर घोर वन हैं और हिंसक पशु घूम रहे हैं। नारदजी घंटों तक अंधकार में भूलते−भटकते रहे। सहसा बिजली के चमकने पर उन्हें शिवजी की माला एक वट वृक्ष पर टंगी हुई दिखाई दी। नारदजी उसे लेकर वहां से भागे और शिवजी के पास पहुंचकर संपूर्ण वृतांत सुनाने लगे। शिवजी ने हंसते हुए कहा कि यह पार्वतीजी की लीला है। गौरी पार्वती ने विनम्र होकर कहा कि मैं किस योग्य हूं, यह सब तो आपकी कृपा का ही प्रभाव है।
नारदजी समझ गये कि वह महल और वहां उपस्थित पार्वतीजी के भाई−भाभी आदि वास्तविक नहीं थे बल्कि भगवान शिव ने पार्वतीजी की बात पूरी करने के लिए वह माया का महल बनाया था। नारदजी ने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और पार्वतीजी से कहा− माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ और सौभाग्य प्रदायक आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत धर्म का ही प्रभाव था। संसार की सभी नारियां आपके नाम का स्मरण करने मात्र से अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को अपना बना सकती हैं। फिर आज के दिन आपकी भक्तिभाव से पूजा−आराधना करने बलियों को तो आपकी कृपा से अटल सौभाग्य अवश्य ही मिलेगा।
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