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Gangaur 2026: क्या है इस व्रत का महत्व? सुहागिनें क्यों करती हैं पूजा?

यह सुहागिन नारियों का विशिष्ट व्रत है, जबकि पुरूषों के लिए इस व्रत की पूजा का देखना तक निषेध है। गणगौर पार्वतीजी के निमित्त व्रत और उनकी शोडषोपचार पूजा−आराधना करने का पर्व है, परन्तु व्यावहारिक रूप में इसने एक उल्लासपूर्ण सामाजिक उत्सव का रूप धारण कर लिया है। गणगौर पर विशेष रूप से मैदा के गुने बनाये जाते हैं। शादी के बाद पहली बार लड़की अपने मायके में गणगौर मनाती है और इन गुनों तथा सास के कपड़ों का वायना निकालकर ससुराल में भेजती है। यह प्रथम वर्ष में ही होता है। बाद में तो प्रतिवर्ष गणगौर ससुराल में ही मनाई जाती है। ससुराल में भी बहु गणगौर का उद्यापन करती है और अपनी सास को वायना, कपड़े तथा सुहाग का सारा समान देती है। इसके साथ ही सोलह सुहागिन ब्राह्मणियों को भोजन कराकर प्रत्येक को सम्पूर्ण श्रृंगार की वस्तुएं और यथाशक्ति दक्षिणा दी जाती है। इस विधि−विधान में देश और काल के अनुरूप थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है परन्तु आधारभूत विधान यही रहता है।

गणगौर के दिन पार्वतीजी की प्रतिमा अथवा चित्र की नहीं, बल्कि स्वयं बालू से गौराजी की मूर्ति बनाकर पूजा करने का विधान है। पूजा करने के पूर्व स्त्रियां सुंदर से सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण करके संपूर्ण श्रृंगार करती हैं। घर के किसी कमरे में एक पवित्र स्थान पर चौबीस अंगुल चौड़ी और चौबीस अंगुल लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर हल्दी, चंदन, कपूर, केसर आदि से उस पर चौक पूरा जाता है। इस चौक पर बालू से गौरी अर्थात् पार्वती की प्रतिमा बनाकर उस पर सुहाग की सभी वस्तुएं, कांच की चूड़ियां, महावर, सिंदूर, रोली आदि चढ़ाते हैं। गौरी की इस प्रतिमा को फल−फूल, नैवेद्य आदि अर्पण करते हुए पूर्ण भक्तिभाव से की जाती है। पार्वतीजी अर्थात् गौराजी की पूजा गौर पर चढ़ाया हुआ सिंदूर महिलाएं अपनी मांग में भरती हैं। पूजन दोपहर को होता है और इसके बाद कभी भी भोजन किया जा सकता है, परन्तु पूरे दिन में एक ही बार भोजन करने का विधान है। अनेक नगरों में आज के दिन दोपहर के समय गौराजी के जलूस भी निकाले जाते हैं।

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कथा


प्राचीन काल की बात है। भगवान शिवजी पार्वतीजी और नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते−चलते वे तीनों एक गांव में पहुंचे। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी। गांव वालों ने जब सुना कि भगवान शिवजी पार्वतीजी सहित यहां पधारे हैं तब कुलीन स्त्रियां तो उनके पूजन के लिए सुंदर−सुंदर और स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। इसी तैयारी में उन्हें देर हो गई। किन्तु निम्न वर्ग की स्त्रियां जैसे बैठी थीं वैसे ही थालियों में हल्दी−चावल रखकर दौड़ी हुई शिव−पार्वती के पास पहुंच गई।
  
पार्वतीजी ने उनकी पूजा स्वीकार करके उनके उपर तमाम सुहाग रस छिड़क दिया और इस प्रकार वे स्त्रियां अटल सौभाग्य प्राप्त कर लौट गईं। कुछ समय बाद उच्च कुल की नारियां सोलह श्रृंगार और आभूषणों से सजी हुई, अनेक प्रकार के पकवान और पूजा की सामग्रियां सोने चांदी के थालों में सजाकर पूजन के लिए आई। उन्हें देखकर शिवजी ने कहा− हे पार्वती! तुमने तमाम सुहाग रस तो साधारण स्त्रियों में बांट दिया, अब इन्हें क्या दोगी? पार्वतीजी ने उत्तर दिया− आप इसकी चिंता न करें। उन्हें सिर्फ उपरी पदार्थों से बना रस दिया गया है, इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा। परंतु इनको में अपनी अंगुली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूंगी। जिसकी मांग में यह सुहाग रस पड़ेगा वह मेरे समान ही तन−मन से अटल सौभाग्यवती रहेगी। जब उच्च कुल की स्त्रियां पूजन कर चुकीं तब पार्वतीजी ने अपनी अंगुली चीरकर उन पर अपना रक्त छिड़का। जिस पर जैसे छींटे पड़े, उसने वैसा ही सुहाग पाया।

पार्वतीजी ने शिवजी की आज्ञा से नदी तट पर जाकर स्नान किया। फिर बालू के महादेव बनाकर वह उनका पूजन करने लगी। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया इसके बाद प्रदक्षिणा की और नदी के किनारे की मिट्टी का टीका माथे पर लगाकर दो कण बालू का प्रसाद पाया और शिवजी के पास लौट आईं। इस सब पूजन आदि में पार्वतीजी को नदी किनारे बहुत देर हो गई थी। महादेवजी ने उनसे देरी का कारण पूछा तो पार्वतीजी ने कहा कि वहां मेरे भाई−भाभी आदि मायके से आये हुए थे, इसी कारण देर हो गई। शिवजी ने हंसकर कहा− तब तो वहां तुम्हारी बहुत खातिर हुई होगी। तब पार्वतीजी ने कहा− उन्होंने मुझे और भात खिलाया है, उसे ही खाकर मैं चली आ रही हूं।

पार्वतीजी की यह बात सुनकर भगवान शिवजी भी दूध−भात खाने के लिए वहां चल पड़े। नारदजी भी साथ थे। पार्वतीजी दुविधा में पड़ गईं। उन्होंने शिवजी का ध्यान करके प्रार्थना की हे प्रभु! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूं तो आप ही इस समय मेरी लाज रखिये। मन ही मन इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पार्वतीजी भी शंकरजी के पीछे−पीछे चलने लगीं। अभी वे तीनों कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें नदी के किनारे एक अत्यन्त सुंदर महल दिखाई देने लगा। जब वे उस महल के भीतर पहुंचे तब वहां शिवजी के साले और सलहज आदि परिवार के सभी लोग मौजूद थे। उन्होंने बहन−बहनोई का बड़े प्रेम से स्वागत किया। दो दिन तक खूब मेहमानदारी होती रही।

तीसरे दिन सवेरे पार्वतीजी ने शिवजी से चलने के लिए कहा, किन्तु वे तैयार नहीं हुए। पार्वतीजी रूठकर चल दीं। तब तो शिवजी को उनका साथ देना ही पड़ा। नारदजी भी साथ ही थे। तीनों चलते−चलते बहुत दूर निकल गये। सायंकाल होने पर शिवजी बोले, मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूं। पार्वतीजी माला लेने के लिए जाने को तैयार हुईं, किन्तु शिवजी के मना करने पर वे ना जा सकीं और नारदजी माला लेने गये। नारदजी ने वहां पहुंचकर देखा कि किसी महल का निशान भी नहीं है। चारों ओर घोर वन हैं और हिंसक पशु घूम रहे हैं। नारदजी घंटों तक अंधकार में भूलते−भटकते रहे। सहसा बिजली के चमकने पर उन्हें शिवजी की माला एक वट वृक्ष पर टंगी हुई दिखाई दी। नारदजी उसे लेकर वहां से भागे और शिवजी के पास पहुंचकर संपूर्ण वृतांत सुनाने लगे। शिवजी ने हंसते हुए कहा कि यह पार्वतीजी की लीला है। गौरी पार्वती ने विनम्र होकर कहा कि मैं किस योग्य हूं, यह सब तो आपकी कृपा का ही प्रभाव है।

नारदजी समझ गये कि वह महल और वहां उपस्थित पार्वतीजी के भाई−भाभी आदि वास्तविक नहीं थे बल्कि भगवान शिव ने पार्वतीजी की बात पूरी करने के लिए वह माया का महल बनाया था। नारदजी ने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और पार्वतीजी से कहा− माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ और सौभाग्य प्रदायक आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत धर्म का ही प्रभाव था। संसार की सभी नारियां आपके नाम का स्मरण करने मात्र से अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को अपना बना सकती हैं। फिर आज के दिन आपकी भक्तिभाव से पूजा−आराधना करने बलियों को तो आपकी कृपा से अटल सौभाग्य अवश्य ही मिलेगा।

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