तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की आहट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मदुरै और तिरुपरंकुंड्रम में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान उन्होंने जहां राज्य की सत्तारुढ़ द्रमुक सरकार पर तीखा हमला बोला, वहीं दीपम अधिकार के मुद्दे को उठाने वाले एक श्रद्धालु के घर जाकर बड़ा संदेश भी दिया। इस कदम ने पूरे राज्य में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।
हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री ने तिरुपरंकुंड्रम स्थित श्री सुब्रह्मण्य स्वामी मंदिर में पूजा अर्चना की। यह मंदिर तमिल आस्था का प्रमुख केंद्र है और कार्तिगई दीपम पर्व के समय यहां विशेष महत्व होता है। पिछले वर्ष दीप प्रज्वलन अधिकार को लेकर हुए विवाद के दौरान एक युवा श्रद्धालु ने अपना जीवन समाप्त कर लिया था। इस घटना ने राज्य भर में भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न की थी। प्रधानमंत्री ने उसी श्रद्धालु के घर जाकर उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि उनका मन भारी है और किसी भी परिवार को ऐसी पीड़ा से नहीं गुजरना चाहिए। इस मुलाकात को प्रतीकात्मक रूप से उस भावना से जोड़ा जा रहा है कि केंद्र सरकार तमिल संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान रखती है। चुनावी माहौल में यह संदेश विशेष महत्व रखता है, क्योंकि द्रमुक पर आरोप लगते रहे हैं कि वह परंपरागत धार्मिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं है।
साथ ही मदुरै की जनसभा में प्रधानमंत्री ने द्रमुक पर कई घोटालों में लिप्त होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सामान्यतः मंत्री अच्छे कार्यों में प्रतिस्पर्धा करते हैं, परंतु यहां मंत्री घोटालों में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। उन्होंने स्थानांतरण, नौकरी, ठेका और बालू खनन से जुड़े कथित घोटालों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सरकार गरीबों, युवाओं और किसानों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है। प्रधानमंत्री ने पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज का उल्लेख करते हुए उनकी ईमानदारी को आदर्श बताया और कहा कि आज की सत्ता उस परंपरा से भटक चुकी है। उन्होंने दावा किया कि राज्य की जनता परिवर्तन का मन बना चुकी है और आगामी चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को अवसर देगी, जिसमें अन्नाद्रमुक प्रमुख सहयोगी है।
प्रधानमंत्री ने साथ ही कच्चातीवु द्वीप का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कच्चातीवु को श्रीलंका को सौंपे जाने पर तमिल हितों की अनदेखी हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि जल्लीकट्टु पर जब प्रतिबंध लगा था, तब केंद्र ने अध्यादेश के माध्यम से उसे जारी रखने का मार्ग प्रशस्त किया। जल्लीकट्टु तमिल पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। उन्होंने संसद भवन में सेंगोल की स्थापना का उल्लेख करते हुए कहा कि तमिल परंपरा को राष्ट्रीय सम्मान दिया गया है। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि केंद्र सरकार तमिल संस्कृति के गौरव को सुदृढ़ कर रही है।
प्रधानमंत्री ने साथ ही राज्य के उपमुख्यमंत्री उदयनीधि स्टालिन के उस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कि उन्हें किसी से भय नहीं है। प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में भय का स्थान नहीं होता। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण बताया। साथ ही उन्होंने कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और मादक पदार्थों की समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि गठबंधन सत्ता में आता है तो अपराध और मादक जाल पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता को स्मरण करते हुए कहा कि राज्य को सुशासन की दिशा में पुनः अग्रसर करना आवश्यक है।
देखा जाये तो तमिलनाडु लंबे समय से द्रविड़ राजनीति का गढ़ रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री का सीधे एक श्रद्धालु के घर जाकर संवेदना प्रकट करना केवल मानवीय पहल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का संकेत भी है। इससे धार्मिक भावनाओं को सम्मान देने का संदेश गया है, जो ग्रामीण और पारंपरिक मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है। आगामी विधानसभा चुनाव में यह विमर्श महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, क्योंकि सांस्कृतिक पहचान और भ्रष्टाचार के आरोप दोनों ही प्रमुख चुनावी विषय बनने जा रहे हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो यह दौरा केवल विकास परियोजनाओं के शिलान्यास या जनसभा तक सीमित नहीं रहा। श्रद्धालु के घर की यात्रा ने इसे भावनात्मक आयाम दिया है, जिसने चुनावी परिदृश्य को नई दिशा देने की संभावना पैदा कर दी है।
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पश्चिम एशिया में तनाव ने भीषण रूप ले लिया है और ईरान, इजराइल तथा अमेरिका के बीच छिड़ी जंग ने पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। सोमवार को संघर्ष का दायरा अचानक बढ़ गया जब तेहरान समर्थित मिलिशिया भी खुलकर मैदान में उतर आईं और हमलों का भूगोल कई देशों तक फैल गया। ईरान ने इजराइल और कई अरब देशों पर मिसाइलें दागीं, जबकि लेबनान से हिजबुल्लाह ने रॉकेट और ड्रोन के जरिये इजराइल को निशाना बनाया। जवाब में इजराइल ने बेरूत के दक्षिणी उपनगरों और दक्षिणी लेबनान पर भारी हवाई हमले किये, जिनमें कम से कम 31 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। इजराइल ने एक लाख से अधिक आरक्षित सैनिकों को जुटा लिया है और लम्बे संघर्ष की चेतावनी दी है।
इस भीषण टकराव की पृष्ठभूमि में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की लक्षित हत्या को निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। इसके बाद ईरान ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए संवैधानिक प्रक्रिया के तहत अलीरेजा अराफी को अंतरिम सर्वोच्च नेता नियुक्त किया, ताकि सत्ता संरचना में निरंतरता का संदेश दिया जा सके। ईरानी अधिकारियों का दावा है कि अभियान शुरू होने के बाद से सैकड़ों लोग मारे गये हैं। ईरानी रेड क्रेसेंट के अनुसार 131 शहरों में हमलों के बीच कम से कम 555 लोगों की जान जा चुकी है। इजराइल में 11 और लेबनान में 31 मौतें दर्ज की गयी हैं।
उधर, संघर्ष के बीच कुवैत में एक चौंकाने वाली घटना सामने आयी। अमेरिकी सेना ने कहा कि सक्रिय युद्ध अभियान के दौरान कुवैत की वायु सुरक्षा ने गलती से तीन अमेरिकी एफ 15 ई लड़ाकू विमानों को मार गिराया। सभी छह चालक सुरक्षित बाहर निकल आये और उन्हें बचा लिया गया। घटना की जांच जारी है। इस बीच तेहरान समर्थित समूहों द्वारा कुवैत स्थित अमेरिकी दूतावास परिसर को भी निशाना बनाये जाने की खबर है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और गहरा गया है।
इस बीच, ऊर्जा सुरक्षा पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ईरानी ड्रोन हमलों ने सऊदी अरब की रस तनुरा रिफाइनरी को प्रभावित किया, जिससे अस्थायी रूप से संचालन ठप करना पड़ा। यह संयंत्र प्रतिदिन पांच लाख बैरल से अधिक कच्चे तेल का प्रसंस्करण करता है। होरमुज जलडमरूमध्य के आसपास हमलों और धमकियों ने वैश्विक आपूर्ति मार्गों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख राफेल ग्रोसी ने कहा है कि फिलहाल ईरान के परमाणु स्थलों को नुकसान का संकेत नहीं है, लेकिन सक्रिय रिएक्टरों की मौजूदगी किसी गंभीर रेडियोलाजिकल हादसे का जोखिम बढ़ाती है।
तनाव का असर खाड़ी क्षेत्र से बाहर भी दिखा। ओमान के तट से 52 समुद्री मील दूर एमकेडी व्योम नामक तेल टैंकर पर मानवरहित नौका से हमला किया गया, जिससे इंजन कक्ष में विस्फोट और आग लग गयी। इस घटना में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गयी। बढ़ते संघर्ष के बीच हवाई क्षेत्र बंद किये जा रहे हैं, दूतावासों ने चेतावनी जारी की है और कई देशों ने अपने नागरिकों की निकासी शुरू कर दी है। इस बीच, ईरान ने इजराइली प्रधानमंत्री के कार्यालय को भी निशाना बनाने का दावा किया है।
उधर, वाशिंगटन और तेल अवीव को उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व को हटाने से ईरान की सत्ता संरचना दरक जायेगी, लेकिन तेहरान ने त्वरित उत्तराधिकार और सैन्य सक्रियता से संकेत दिया है कि व्यवस्था इतनी आसानी से बिखरने वाली नहीं है। अब सवाल यह है कि क्या यह निर्णायक प्रहार अपेक्षित परिणाम देगा या फिर पूरा क्षेत्र और गहरे अस्थिरता के दौर में धकेल दिया जायेगा। बहरहाल, आइये देखते हैं रक्षा विशेषज्ञ कर्नल टीपी त्यागी इस मुद्दे पर क्या कह रहे हैं।
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