तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और DMK अध्यक्ष एमके स्टालिन ने बुधवार को TVK की अगुवाई वाली रील सरकार के पहले बजट को बेकार बताया। उन्होंने कहा कि इसमें कोई नई सोच नहीं थी और यह पूरी तरह से फीका था। उन्होंने कहा कि जिस बजट से कुछ लोगों को बहुत शानदार होने की उम्मीद थी, वह पूरी तरह बेकार साबित हुआ। स्टालिन ने X पर लिखा कि इतना ही नहीं, यह द्रविड़ियन मॉडल सरकार की योजनाओं का 'रीमेक वर्शन' बजट है।" उन्होंने आगे कहा, "'रील सरकार' का पहला बजट पूरी तरह से निराशाजनक रहा है - इसमें कोई नई सोच नहीं है, यह वादे पूरे करने में नाकाम रहा है और पूरी तरह से फीका है।
DMK अध्यक्ष ने कहा कि आज तमिलनाडु विधानसभा में राज्य सरकार द्वारा पेश किया गया बजट किसानों से जुड़े मुद्दों और बढ़ती महंगाई की समस्याओं को हल करने में नाकाम रहा है। उन्होंने कहा कि आम लोगों की भाषा में कहें तो, यह बजट किसानों की समस्याओं, बिजली की दरों में विसंगतियों या बढ़ती महंगाई जैसे मुद्दों पर कोई ध्यान नहीं देता है और राज्य के लिए ज़रूरी कोई भी नई दूरदर्शी योजना पेश करने में नाकाम रहा है।
स्टालिन ने कहा कि यह बजट 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले किए गए वादों को पूरा करने में नाकाम रहा है; इन वादों में महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए भत्ता और राज्य के किसानों के फसल ऋण की पूरी माफ़ी शामिल थी। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यह ऐसा बजट है जिसमें महिलाओं के लिए 2,500 रुपये का मासिक भत्ता, बेरोजगार युवाओं के लिए 4,000 रुपये, सालाना छह मुफ़्त LPG सिलेंडर और फसल ऋण की पूरी माफ़ी जैसे अहम वादों का ज़िक्र तक नहीं है।
इससे पहले दिन में, तमिलनाडु में विपक्ष के नेता (LoP) उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि बजट में चुनावी वादों को पूरा करने के लिए कोई योजना पेश नहीं की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने लैपटॉप योजना जैसी मौजूदा योजनाओं पर बस अपनी पार्टी का नाम चिपका दिया है। उन्होंने आगे कहा कि बुधवार को TVK सरकार द्वारा पेश किए गए बजट में इनके कार्यान्वयन के संबंध में कोई रोडमैप या घोषणा नहीं है।
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जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा में धांधली के विरोध में उपजे आंदोलन और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा बुलाए गए 'संसद मार्च' के दौरान हुई हिंसा ने एक बार फिर पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर बहस छेड़ दी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने बर्बरता और पैलेट गन का इस्तेमाल किया, जबकि पुलिस का कहना है कि भीड़ के उग्र होने और बैरिकेड्स तोड़ने के बाद कार्रवाई मजबूरी बन गई थी। इसी पूरे घटनाक्रम, क्राउड कंट्रोल की एसओपी (SOP) और भारतीय राजनीति में आंदोलनों के बदलते स्वरूप पर प्रभात साक्षी के विशेष शो 'No Filter' में पूर्व संयुक्त पुलिस आयुक्त (Ex-IPS) ओपी मिश्रा ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बेबाक राय रखी।
प्रदर्शन और पुलिस की सीमा: जब टूटती है 'लक्ष्मण रेखा'
पूर्व आईपीएस अधिकारी ओपी मिश्रा के अनुसार, संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है और पुलिस का पहला कर्तव्य इस अधिकार की रक्षा करना है [04:25]। लेकिन नई दिल्ली जैसा क्षेत्र, जहाँ संसद और राष्ट्रपति भवन जैसे अति-संवेदनशील संस्थान हैं, वहाँ सुरक्षा के कड़े मानदंड लागू होते हैं । सीजेपी प्रदर्शन का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि समस्या तब उत्पन्न हुई जब प्रदर्शनकारियों ने पूर्व निर्धारित शर्ते और पुलिस के साथ तय लक्ष्मण रेखा को लांघा। संसद जैसे प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर जबरन बढ़ने की कोशिश के बाद ही स्थिति तनावपूर्ण हुई।
लाठीचार्ज और बल प्रयोग:क्या कहता है नियम?
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस बल का प्रयोग अचानक या मनमाने ढंग से नहीं करती। क्राउड कंट्रोल की एक लिखित एसओपी (SOP) और 'ग्रेडेड रिस्पांस' होता है:
पहला चरण: लाउड हेलर से चेतावनी
दूसरा चरण: वॉटर कैनन (पानी की बौछार) का प्रयोग
तीसरा चरण: लाठीचार्ज (केन चार्ज)
अंतिम चरण: आंसू गैस के गोले छोड़ना
ओपी मिश्रा ने कहा कि जब उग्र भीड़ सारे बैरिकेड्स तोड़कर आगे बढ़ने पर आमादा हो, तो मौके पर तैनात सक्षम अधिकारी को सार्वजनिक संपत्ति और जान-माल की रक्षा के लिए सख्त निर्णय लेने ही पड़ते हैं।
बिना वर्दी में डंडे और सोशल मीडिया का 'हाफ ट्रुथ'
प्रदर्शन के दौरान बिना वर्दी और बिना नेम प्लेट के हाथों में डंडे लिए घूम रहे संदिग्धों पर उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग में इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी से जुड़ी कई विंग्स प्लेन क्लोथ्स में तैनात होती हैं । हालाँकि, भीड़ में डंडे लेकर घूम रहे हर व्यक्ति को सीधे पुलिसकर्मी मान लेना सही नहीं है, इसकी निष्पक्ष जाँच आवश्यक है। सोशल मीडिया और 15-20 सेकंड के वायरल वीडियो पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अनुशासित बल होने के नाते पुलिस हर वीडियो पर तुरंत बयानबाजी नहीं कर सकती । आधिकारिक माध्यमों से ही अफवाहों का खंडन किया जाता है
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