Brazil to vote in second round of presidential election | BBC News
Brazilians will be voting for a new president on Sunday in a run-off election in which the veteran incumbent, Luiz Inácio Lula da Silva, is being challenged by right-wing Senator Flávio Bolsonaro. Bolsonaro, the son of convicted former president Jair Bolsonaro, beat Lula in the first round of voting on 4 October by a narrow margin, but fell short of the 50% of valid votes needed to win outright, triggering Sunday's run-off. Polls ahead of the second round put them neck and neck. Subscribe to our channel here: https://bbc.in/bbcnews For the latest news download the BBC News app or visit BBC.com/news #BBCNews
Israel Election Countdown: ऐसा क्या हुआ? जीतकर भी PM नहीं बन पाएंगे नेतन्याहू! सत्ता परिवर्तन से गाजा को मिलेगी राहत या आएगी और बड़ी आफत
27 अक्टूबर 2026 इजराइल के इतिहास का एक ऐसा मोड़ जिस पर आज पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई है। यह सिर्फ एक आम चुनाव नहीं है बल्कि दुनिया के सबसे अनुभवी और कद्दावर राजनेताओं में से एक बेंजामिन नेतन्याहू के पूरे राजनीतिक जीवन की सबसे अनोखी परीक्षा है। एक ऐसा नेता जिसने हर संकट से देश को निकालने का दावा किया। आज इजराइल के ही एक अनोखे राजनीतिक चक्रव्यूह में वह घिरा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स एक बेहद दिलचस्प संभावना की तरफ इशारा कर रही हैं कि नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर तो सकती है लेकिन इजराइल के पेंचीदा चुनावी गणित और गठबंधन की शर्तों के कारण शायद शायद सत्ता की चाबी उनके हाथ से फिसल जाए। जीत की दहलीज पर खड़े होकर भी सरकार बनाने का यह रास्ता इतना मुश्किल क्यों हो गया है? वो कौन सा एक नया कानून और अंदरूनी खींचतान है जिसने इस पूरी चुनावी बाजी को एक सस्पेंस थ्रिलर बना दिया है? क्या इस बार इजराइल में एक नया इतिहास लिखा जाएगा या राजनीति का यह सबसे बड़ा खिलाड़ी कोई नया समीकरण बिठा लेगा।
इजरायल का चुनावी सिस्टम भारत से कितना अलग?
इस पूरे गणित को समझने के लिए पहले हमें इजराइल के चुनावी सिस्टम को समझना होगा जो भारत या अमेरिका से बिल्कुल अलग है। इजराइल में जनता किसी एक प्रधानमंत्री उम्मीदवार को सीधा वोट नहीं देती। वहां लोग पार्टियों को वोट देते हैं। संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा है 61 सीटों का। इजराइल के इतिहास में आज तक किसी भी सिंगल पार्टी को अकेले 61 सीटें नहीं मिली हैं। इसका मतलब इसका मतलब है कि वहां हमेशा खिचड़ी सरकार यानी गठबंधन वाली गवर्नमेंट होती है। नेतन्याहू इसी गठबंधन के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। वो छोटी-छोटी कट्टरपंथी और दक्षिणपंथी पार्टियों को मिलाकर किसी तरह 61 वाला आंकड़ा जुटा लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स कहती है इस बार इसी दक्षिणपंथी वोट बैंक में एक बहुत बड़ी दरार आ चुकी है।
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नेतन्याहू के लिए क्या है मुसीबत
अब बात करते हैं उस बारूद के ढेर यानी सेना में भर्ती वाला कानून की जिसने नेतन्याहू की सरकार को हिलाया है। इजराइल में एक नियम है कि हर नागरिक चाहे लड़का हो या लड़की उसे दो से तीन साल तक इजराइल के डिफेंस फोर्स में देश की सेवा करनी ही होगी। लेकिन 1948 से इजराइल के अतिरूढ़िवादी यानी हारेदी यहूदी को इससे छूट मिली हुई थी। वो सिर्फ धार्मिक पढ़ाई करते थे और उन्हें सेना में नहीं जाना पड़ता था। लेकिन 7 अक्टूबर के हमलों और लगातार चल रहे बहु मोर्चे के युद्ध के बाद इजराइल की सेना थक चुकी है। सेना के चीफ ने साफ कह दिया कि अब हमें और सैनिक चाहिए और यह भेदभाव नहीं चलेगा। इजराइल की सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दे दिया कि रूढ़िवादी यहूदियों को भी सेना में भर्ती होना पड़ेगा। फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक इजराइल की आम जनता इस बात से बेहद गुस्से में है और वह पूछ रहे हैं कि हमारे बच्चे सीमा पर जान दें और यह कुछ लोग घर में बैठकर सिर्फ पूजा क्यों करें? 72% इजराइली चाहते हैं कि सबके लिए सेना का नियम बराबर होना चाहिए। लेकिन नेतन्याहू की कुर्सी जिन पार्टियों के दम पर टिकी है जैसे शास और यूनाइटेड टोरा जुडाइज्म वो कट्टर धार्मिक पार्टियां हैं। उन्होंने नेतन्याहू को धमकी दी है कि अगर हमारे बच्चों को सेना में भेजा गया तो हम सरकार गिरा देंगे।
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सर्वे ने उड़ाई नेतन्याहू की नींद
दक्षिणपंथी नेता ऑफर विंटर ने साफ कह दिया है कि वह चुनाव के बाद राष्ट्रपति से नेतन्याहू को पीएम बनाने की सिफारिश तो कर देंगे लेकिन वह उनकी सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे जब तक सेना में भर्ती का कानून पूरी तरह लागू नहीं होता। दूसरी तरफ द जेरुशसलम पोस्ट की तरफ से शेयर किए गए मारिव के लेटेस्ट पोल के नतीजे नेतन्याहू के लिए नींदें उड़ाने वाले हैं। इस सर्वे के मुताबिक 48% इजराइली जनता मानती है कि पूर्व सेना प्रमुख गादी आयदन कोर्ट नेतन्याहू से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे। आयदन कोर्ट की पार्टी याशार लगातार मजबूत भी हो रही है।
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गाजा में बदलेंगे हालात
गाजा में युद्ध, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का विस्तार और फिलिस्तीनियों के लिए अलग देश बनाने का सवाल। लंबे समय से विवाद की वजह बने हुए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर नेतन्याहू की जगह विपक्षी नेता सत्ता में आते हैं तो फिलिस्तीनियों के लिए कुछ मामलों में हालात संभालने की कोशिश हो सकती है। लेकिन फिलिस्तीन को एक अलग देश बनाने के सवाल पर बड़े बदलाव की उम्मीद कम नजर आती है। हालांकि नए प्रधानमंत्री के आने पर सैन्य कारवाई का तरीका कूटनीति का इस्तेमाल और अमेरिका के साथ बातचीत की रणनीति बदल सकती है। यानी बदलाव हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दोनों देशों के बीच तनाव खत्म हो जाएगा। इजराइल में सत्ता परिवर्तन का असर सिर्फ ईरान और फिलिस्तीन तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर अमेरिका के साथ उसके रिश्तों और पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
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