राजस्थान में मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन 2026 पूरा हो गया है और चुनाव आयोग ने शनिवार को अंतिम अधिसूचना जारी कर दी है। संशोधित सूचियों में अंता विधानसभा को छोड़कर 199 विधानसभा क्षेत्रों के लगभग 5.15 करोड़ मतदाता शामिल हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, संशोधन प्रक्रिया 27 अक्टूबर, 2025 से 21 फरवरी, 2026 तक चली। 27 अक्टूबर, 2025 तक कुल मतदाताओं की संख्या 5,46,56,215 थी। मसौदा प्रकाशन के दौरान, 41,84,891 मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप 16 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित मसौदे में 5,04,71,324 मतदाताओं को सूचीबद्ध किया गया।
राजस्थान: 2.42 लाख नाम हटाए गए
मसौदा प्रकाशित होने के बाद, 12,91,365 नए मतदाता जोड़े गए और 2,42,760 नाम हटाए गए। आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, अंतिम प्रकाशित मतदाता सूची में अब 5,15,19,929 मतदाता शामिल हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने व्यापक संशोधन प्रक्रिया में भाग लेने के लिए मतदाताओं, चुनाव अधिकारियों, राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों को बधाई दी। अंतिम मतदाता सूची में 2.69 करोड़ पुरुष मतदाता, 2.45 करोड़ महिला मतदाता और 562 ट्रांसजेंडर मतदाता शामिल हैं।
दिसंबर 2025 के मसौदा प्रकाशन के बाद, मतदाता सूची में 10.48 लाख मतदाताओं की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई, जो 2.08% की वृद्धि दर्शाती है। जयपुर में सबसे अधिक 3.45% की वृद्धि दर्ज की गई, इसके बाद फलोदी में 3.22%, भरतपुर में 2.78%, सिरोही में 2.72% और बूंदी में 2.71% की वृद्धि हुई।
लिंग अनुपात में सुधार
संशोधन प्रक्रिया के बाद लिंग अनुपात में भी सुधार हुआ है, जो 909 से बढ़कर 911 हो गया है, यानी 2 अंकों की वृद्धि हुई है। जयपुर में 7 अंकों की वृद्धि हुई, जबकि कोटा में 6 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। 18 से 19 वर्ष की आयु के युवा मतदाताओं की संख्या में 43 लाख से अधिक की वृद्धि हुई है, जिसमें जयपुर में सबसे अधिक 13% की वृद्धि हुई है। अंतिम प्रकाशन से पहले, सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ जिला स्तर पर बैठकें आयोजित की गईं। अद्यतन मतदाता सूचियों की प्रतियां उन्हें हार्डकवर और सॉफ्टकवर दोनों प्रारूपों में वितरित की गईं। इस व्यापक प्रक्रिया में 41 जिला निर्वाचन अधिकारी, 199 मतदाता पंजीकरण अधिकारी, 1,651 सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारी, 61,136 बूथ स्तरीय अधिकारी, राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त 1 लाख से अधिक बूथ स्तरीय एजेंट और लाखों स्वयंसेवक शामिल थे। विज्ञप्ति में आगे कहा गया है कि मीडिया संगठनों ने भी जागरूकता बढ़ाने और संशोधन प्रक्रिया के दौरान प्रतिक्रिया देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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जाने माने अभिनेता अनु कपूर ने राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र की बहस को केंद्र में ला खड़ा किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह श्लोक गाने के निर्देश का उन्होंने खुलकर स्वागत करते हुए इसे “अद्भुत और ऐतिहासिक निर्णय” बताया है। अनु कपूर ने कहा कि यह राष्ट्र की चेतना के लिए शुभ संकेत है। अनु कपूर ने साथ ही वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत को शांति, करुणा और विश्वकल्याण का संदेश देने वाला बताते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता की आत्मा अहिंसा और सहअस्तित्व में विश्वास करती है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की कामना करने वाला समाज किसी के लिए खतरा कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि अगर हिंदू प्रार्थना करता है तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समूचे विश्व के लिए मंगलकामना करता है। ऐसे में हिंदू पहचान से डर क्यों? उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू-मुस्लिम विभाजन की कथित खाई दरअसल राजनीतिक स्वार्थों की उपज है।
उन्होंने कहा कि जब दुनिया में ईसाई राष्ट्र हो सकते हैं, मुस्लिम राष्ट्र हो सकते हैं, यहूदी राष्ट्र हो सकते हैं, बौद्ध राष्ट्र हो सकते हैं तो एक हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं हो सकता? अनु कपूर ने कहा कि समय आ गया है कि हिंदू एकता कायम हो और भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाये।
दूसरी ओर, अनु कपूर के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए? देखा जाये तो भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक जड़ें हिंदू सभ्यता में निहित हैं। यहां की परंपराएं, त्योहार, जीवन-दर्शन और सामाजिक संरचना उसी धरोहर से निर्मित हुए हैं। हिंदू राष्ट्र का अर्थ किसी अन्य धर्म के प्रति घृणा नहीं, बल्कि उस मूल सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक स्वीकृति देना है, जिसने इस भूमि को आकार दिया।
यह भी सत्य है कि “धर्मनिरपेक्षता” की आड़ में अक्सर तुष्टिकरण की राजनीति ने बहुसंख्यक समाज को अपराधबोध में जीने पर मजबूर किया है। यदि भारत स्वयं को हिंदू राष्ट्र घोषित करता है, तो इसका संदेश होगा कि यह राष्ट्र अपनी जड़ों पर गर्व करता है। यह वैसा ही होगा जैसे कई इस्लामी या ईसाई राष्ट्र अपनी धार्मिक पहचान के साथ भी लोकतांत्रिक ढांचा बनाए रखते हैं। इसके अलावा, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ कर सकती है। जब पहचान स्पष्ट होती है, तब भ्रम कम होता है। अनु कपूर का आह्वान इसी स्पष्टता की मांग करता है यानि धर्म, जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जाए, लेकिन अपनी मूल पहचान से समझौता किए बिना।
जहां तक हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर आरएसएस के विचार की बात है तो हम आपको बता दें कि संघ प्रमुख मोहन भागवत समय समय पर यह स्पष्ट करते रहे हैं कि भारत प्राचीन काल से ही हिंदू राष्ट्र है भले संविधान में इस प्रकार का कोई औपचारिक दर्जा ना हो लेकिन भारत हिंदू राष्ट्र ही है।
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