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पेरेंटिंग- बेटी अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें करती है:उसकी ये समझदारी अच्छी है या चिंता की बात, मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल- मैं लखनऊ से हूं। मेरी 13 साल की बेटी काफी समझदार है। लेकिन कई बार वह ऐसी बातें करती है, जो उसकी उम्र के मुकाबले काफी ज्यादा मैच्योर होती हैं। कभी वह रिश्तों, जिम्मेदारियों या जिंदगी को लेकर ऐसी बात बोल देती है कि लगता है कि इतनी छोटी लड़की के दिमाग में ये बात कैसे आई। कभी उसकी समझदारी पर खुशी होती है तो कभी चिंता। मैं समझ नहीं पा रही कि यह समझदारी का संकेत है या कुछ और। कुछ समय से मैंने एक बात नोटिस की है कि अब वह जरूरत से ज्यादा जिम्मेदार, गंभीर और चुप रहने लगी है। क्या यह नॉर्मल डेवलपमेंट का हिस्सा है या इसके पीछे कोई अन्य कारण हो सकता है। बतौर पेरेंट मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- आपकी चिंता वाजिब है। अक्सर जब कोई बच्चा अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें करता है तो पेरेंट्स इसे ‘सयानापन’ मानकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन आप एक समझदार पेरेंट हैं, जो इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों को जानना चाहती हैं। सबसे पहले तो यह समझिए कि 13 साल की उम्र बहुत सेंसिटिव होती है। बच्चा 'किशोरावस्था' की दहलीज पर कदम रख रहा होता है। इस उम्र में बच्चे का ब्रेन बहुत तेजी से विकसित हो रहा होता है। खासकर वह हिस्सा, जो सोचने-समझने, सवाल करने और भविष्य के बारे में विचार करने से जुड़ा होता है। इसलिए इस उम्र में बच्चे हर विषय पर अपनी राय रखना चाहते हैं। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। हालांकि इसके पीछे के कारणों को आइडेंटिफाई करना जरूरी है। बच्चे उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें क्यों करते हैं कई बार ऐसा होता है कि जब बच्चे घर में अक्सर समझदारी और जिम्मेदारी भरी बातें सुनते हैं तो वे सोचते हैं कि उन्हें भी ‘समझदार’ बनना पड़ेगा। इसके अलावा आज की पीढ़ी सोशल मीडिया एक्सपोजर के कारण बहुत जल्दी रिलेशनशिप, जिंदगी, असफलता और तुलना से रूबरू हो जाती है। इससे उनकी बातें बड़ों जैसी लग सकती हैं, लेकिन वे अभी भी बच्चे ही होते हैं। कुछ बच्चे स्वभाव से ही बहुत गहराई से सोचते हैं। वे दूसरों की भावनाएं जल्दी समझ लेते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर मैच्योर लगते हैं, लेकिन उन्हें सपोर्ट की जरूरत होती है। बच्चे के बिहेवियरल मैच्योरिटी के पीछे ऐसे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। बिहेवियरल मैच्योरिटी कब चिंताजनक? हर बच्चा अलग होता है। वह अपनी गति से मानसिक और भावनात्मक रूप से बड़ा होता है। कुछ बच्चों का व्यवहार उम्र से थोड़ा ज्यादा समझदार लग सकता है, जो पूरी तरह नॉर्मल है। लेकिन जब यह मैच्योरिटी बच्चे से उसका बचपन छीनने लगे या वह अपनी भावनाओं को दबाने लगे, तब यह चिंताजनक है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स नॉर्मल और चिंताजनक बिहेवियर के फर्क को समझें। इन संकेतों से आप समय रहते यह जान सकती हैं कि बच्ची की मैच्योरिटी स्वाभाविक है या किसी प्रेशर का नतीजा। इसके अनुसार कुछ जरूरी कदम उठा सकती हैं। ऐसी स्थिति में पेरेंट्स क्या करें? जब बच्चा अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर व्यवहार दिखाए तो घबराने के बजाय संतुलित रवैया अपनाएं। आपकी प्रतिक्रिया ही तय करती है कि बच्चा खुद को कैसे ढालेगा। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। मैच्योरिटी की तारीफ सोच-समझकर करें बच्चे की समझदारी को सराहें, लेकिन बार-बार ये न कहें कि “तुम तो बहुत समझदार हो।“ इससे बच्चे पर यह दबाव बन सकता है कि उसे हर हाल में मजबूत और समझदार ही बने रहना है। उसे बचपन जीने का मौका दें उसे यह महसूस कराएं कि बच्चा होना, गलती करना, परेशान होना और मदद मांगना बिल्कुल ठीक है। उससे कहें, “तुम बच्ची हो, तुम्हें इतना ज्यादा सीरियस होने की जरूरत नहीं है।” खुली बातचीत का माहौल बनाएं बातचीत के दौरान बच्चे को जज बिल्कुल न करें। ऐसे सवाल पूछें– “बेटा, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?“ “तुमने ये कहां सुना?“ “तुम ऐसा क्यों सोचती हो?“ उसकी बातों को बिना टोके और बिना जजमेंट के सुनें। उसे मौज-मस्ती और खेलने का स्पेस दें बच्चा अगर कभी थोड़ी शैतानी करे, मस्ती करे तो बिल्कुल भी टोकें नहीं। उसकी सराहना करें। खुद भी उसके साथ हंसें-खेलें, हल्की-फुल्की बातें करें, मस्ती-मजाक करें। उसे यह एहसास दिलाएं कि बड़ा बनने की कोई जल्दी नहीं है। बचपन जीना भी बेहद जरूरी है। कोशिश करें कि आप भी उसके साथ बच्चे बन जाएं। खुद भी कभी बचपना करें, छोटी–छोटी शैतानियों को साथ मिलकर इंजॉय करें। सोशल मीडिया एक्सपोजर पर नजर रखें इस बात पर नजर रखें कि वह सोशल मीडिया पर क्या देख रही है, किस तरह का कंटेंट उसकी सोच को प्रभावित कर रहा है। जरूरत हो तो स्क्रीन टाइम और कंटेंट को लेकर बातचीत करें। जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल मदद लें अगर बच्ची लगातार चुप रहे, इमोशनली बहुत भारी बातें करने लगे या खुद को ज्यादा दबाकर रखे तो काउंसलर या साइकोलॉजिस्ट से बात करने में बिल्कुल न हिचकें। पेरेंट्स न करें ये गलतियां कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो बच्चे पर प्रेशर बढ़ा देती हैं। अच्छे इरादों के बावजूद कुछ प्रतिक्रियाएं बच्चे को गंभीर या इंट्रोवर्ट बना सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स अपनी भूमिका को लेकर सतर्क रहें और कुछ कॉमन गलतियों से बचें। अंत में मैं यही कहूंगी कि आपकी चिंता बताती है कि आप एक सजग और संवेदनशील मां हैं। समझदारी अच्छी बात है, लेकिन बचपन की कीमत पर नहीं। 13 साल की उम्र में मैच्योर बातें करना कई बार सामान्य होता है। लेकिन अगर इसके साथ चुप्पी बढ़ रही हो, जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी का भाव आ रहा है या बिटिया अपनी भावनाएं दबाने लगी है, तो इसे नजरअंदाज न करें। आपका काम उसे जल्दी बड़ा बनाना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित महसूस कराना है। उसे यह भरोसा दिलाएं, “कोई जिम्मेदारी तुम्हें अकेले नहीं उठानी है। हम तुम्हारे साथ हैं।” ………………… पेरेंटिंग से जुड़ी ये स्टोरी भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटी इंस्टा पर अकाउंट बनाना चाहती है: कहती है, 'सब दोस्तों का है, मेरा क्यों नहीं?' उसे ऑनलाइन दुनिया के खतरे कैसे समझाऊं आपका डर जायज है, लेकिन सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी लगाना ठीक नहीं है। इससे बच्चों की जिज्ञासा बढ़ जाती है और वे इसे चोरी-छिपे इस्तेमाल करने लगते हैं। इसलिए 'पाबंदी' लगाने की बजाय आपको उसे सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में बताना चाहिए। साथ ही इसके खतरों के बारे में भी। पूरी खबर पढ़िए…

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बुक रिव्यू: हिमालय में 13 महीने की साधना:करोड़ों का साम्राज्य छोड़ संन्यासी बने साधक की कहानी, जिसमें छिपा है असली खुशी का सूत्र

किताब का नाम: हिमालय में तेरह मास: एक भिक्षु का साधना-वृत्तांत (‘थर्टीन मंथ्स इन द हिमालयाज’ का हिंदी अनुवाद) लेखक: ओम स्वामी अनुवाद: आशुतोष गर्ग प्रकाशक: मंजुल प्रकाशन मूल्य: 350 रुपए आमतौर पर लोग रिटायरमेंट के बाद शांति की तलाश करते हैं। इसके लिए ‘एकांतवास’ चुनते हैं। लेकिन क्या हो, जब एक अरबपति बिजनेसमैन अपना सब कुछ छोड़कर हिमालय पर तपस्या करने चला जाए? मशहूर आध्यात्मिक गुरु और लेखक ओम स्वामी की किताब 'हिमालय में तेरह मास: एक भिक्षु का साधना-वृत्तांत' इसी असाधारण यात्रा का जीवंत दस्तावेज है। यह किताब केवल एक यात्रा वृत्तांत नहीं है। यह उस कठिन साधना की यात्रा है, जिसे पूरा करने का साहस आधुनिक युग में बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। लेखक ने इसमें बताया है कि कैसे उन्होंने 12,000 फीट की ऊंचाई पर शून्य से नीचे के तापमान, भूख और जंगली जानवरों के डर के बीच 13 महीने बिताए। यह किताब हमें बताती है कि साधना या आत्म-साक्षात्कार कोई जादुई घटना नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत, अनुशासन और अटूट श्रद्धा का परिणाम है। किताब का मकसद और अहमियत इस किताब का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिकता के पीछे छिपे रहस्य को हटाकर उसकी कठोर वास्तविकता को सामने लाना है। किताब हमें सिखाती है कि अगर लक्ष्य बड़ा हो तो ‘पागलपन की हद तक’ समर्पण जरूरी है। सोशल मीडिया और इंस्टेंट खुशी के दौर में यह किताब 'धैर्य' और 'मौन' की शक्ति को पुनर्स्थापित करती है। यह उन लोगों के लिए एक गाइड की तरह है, जो यह जानना चाहते हैं कि क्या आज के इस वैज्ञानिक युग में भी प्राचीन वैदिक पद्धतियों से ‘सत्य’ को पाया जा सकता है। नीचे दिए ग्राफिक से किताब के मुख्य सूत्र समझिए- लेखक ने अपनी इस 13 महीने की हिमालय की यात्रा को बहुत ही ईमानदारी से लिखा है। ऐसे में किताब के इन 4 प्रमुख पहलुओं को समझना हर पाठक के लिए जरूरी है। 1. सुख-सुविधाओं का पूर्ण त्याग किताब में ओम स्वामी गुफा में रहने का अपना अनुभव लिखते हैं, ‘’वह गुफा इतनी छोटी थी कि उसमें सीधे खड़े भी नहीं हुआ जा सकता था। वहां न बिजली थी, न ही बिस्तर।’’ लेखक ने अपने गुरु 'नागा बाबा' के आदेश पर सिले हुए कपड़े पहनना छोड़ दिया था और हाड़ कंपाने वाली ठंड में भी केवल एक लंगोट में साधना की। यह हिस्सा हमें सिखाता है कि जब हम बाहरी दुनिया की जरूरतों को कम करते हैं, तभी आंतरिक दुनिया के द्वार खुलते हैं। 2. डर पर विजय: जंगली जानवर और अकेलापन हिमालय की ऊंचाइयों पर अकेले रहना मौत को दावत देने जैसा है। लेखक ने स्वीकार किया है कि उन्हें भी डर लगता था कि कहीं कोई तेंदुआ या भालू उन्हें अपना निवाला न बना ले। उन्होंने एक गहरी बात कही है कि “अगर जीवन पूरी सजगता, शांति और स्वीकार भाव में जिया जाए, तो मृत्यु भी बिना डर और घबराहट के स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य हो जाती है।” ओम स्वामी ने अपने अहंकार को चुनौती दी और डर को अपनी हिम्मत में बदल दिया। 3. साधना की बारीकियां और 'क्राइंग मेडिटेशन' किताब में केवल दार्शनिक बातें नहीं हैं, बल्कि मंत्र योग और साधना की सटीक प्रक्रियाएं भी हैं। ओम स्वामी बताते हैं कि कैसे घंटों एक ही मुद्रा में बैठने से शरीर जवाब देने लगता था, लेकिन संकल्प उन्हें थामे रखता था। उन्होंने 'क्राइंग मेडिटेशन' का जिक्र किया है, जहां ईश्वर के प्रेम में आंसू बहते हैं। यह किताब के सबसे भावुक हिस्सों में से एक है, जो पाठक की आंखों को भी नम कर देता है। 4. अनुशासन बनाम संदेह साधु होने का मतलब यह नहीं कि मन में शंकाएं नहीं आती हैं। ओम स्वामी बड़ी ईमानदारी से बताते हैं कि कई बार उनके मन में भी संदेह उठा कि क्या ये सब सच है? क्या मां भगवती वास्तव में दर्शन देंगी? लेकिन उन्होंने सीखा कि 'संदेह' आने पर साधना छोड़नी नहीं है, बल्कि उस पर और फोकस करना है। यही वो 'स्पार्क' है, जो एक साधारण साधक को सिद्ध बनाता है। यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? यह किताब केवल संन्यासियों के लिए नहीं है। अगर आप एक कॉर्पोरेट प्रोफेशनल हैं और तनाव में रहते हैं तो यह आपको मानसिक मजबूती सिखाएगी। अगर आप स्टूडेंट हैं तो यह आपको एकाग्रता का महत्व बताएगी। नीचे दिए ग्राफिक से समझिए कि ये किताब किन लोगों के लिए बेहतर है। किताब के बारे में मेरी राय यह किताब एक 'अनुभव' है। ओम स्वामी की लेखनी में एक अद्भुत सादगी और गहराई है। वह किसी उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि एक दोस्त की तरह अपनी कमियां और अपनी जीत साझा करते हैं। ओम स्वामी अपनी 13 महीनों की साधना के जरिए बताते हैं कि कैसे कठिनाइयों से गुजरकर आंतरिक शांति मिलती है। सबसे अच्छी बात यह है कि लेखक ने कभी भी आध्यात्मिकता का महिमामंडन नहीं किया। उन्होंने भूख, दर्द और अकेलेपन की कड़वी सच्चाई को वैसे ही पेश किया, जैसे वह महसूस होता है। किताब का 18वां अध्याय इतना भावुक है कि वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को झकझोर सकता है। यह किताब हमें याद दिलाती है कि सबसे कठिन और सबसे खूबसूरत यात्रा हमारे भीतर ही होती है। ……………… ये बुक रिव्यू भी पढ़िए बुक रिव्यू- सफलता के लिए जरूरी चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की मॉडर्न व्याख्या, भारतीय दर्शन समझना है तो ये किताब पढ़ें ‘इकिगाई’ किताब से दुनिया भर के लोगों को लंबी और खुशहाल जिंदगी का राज बताने वाले लेखक हेक्टर गार्सिया और फ्रांसेस्क मिरालेस अब भारत की प्राचीनता की ओर मुड़े हैं। उनकी नई किताब ‘चार पुरुषार्थ’ हिंदू दर्शन के उन चार लक्ष्यों पर आधारित है, जिन्हें हर इंसान की जिंदगी का आधार माना जाता है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। पूरी खबर पढ़िए...

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टीम इंडिया का पाकिस्तान-कनाडा से भी ज्यादा बुरा हाल… T20 World Cup का चौंकाने वाला सच

T20 World Cup 2026: टी20 वर्ल्ड कप 2026 में अब सुपर-8 स्टेज के रोमांचक मैच खेले जाएंगे. इन बड़े मुकाबलों से पहले टीम इंडिया की एक कमजोरी सामने आई है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है. ये कमजोरी टीम इंडिया को बड़े मैचों में भारी पड़ सकती है. Thu, 19 Feb 2026 09:32:33 +0530

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