जरूरत की खबर- डेयरी प्रोडक्ट सेहत के लिए कितना फायदेमंद:जानें इनकी न्यूट्रिशनल वैल्यू, फायदे-नुकसान, किन्हें नहीं खाना चाहिए
पीढ़ियों से डेयरी प्रोडक्ट्स भारतीय खानपान का अहम हिस्सा रहे हैं। चाहे वो शाकाहारियों की फेवरेट सब्जी पनीर हो या सेहत का खजाना दूध–दही। जीवन का शुरुआती भोजन ही दूध होता है। जब छोटा बच्चा कुछ और नहीं खाता तो सिर्फ दूध पीता है। डेयरी प्रोडक्ट्स में कई ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो हमारी सेहत के लिए फायदेमंद हैं। कैल्शियम, हाई-क्वालिटी प्रोटीन और जरूरी विटामिन्स से भरपूर ये फूड्स शरीर की ग्रोथ, हड्डियों की मजबूती और मसल्स ग्रोथ में अहम भूमिका निभाते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा, स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की एक स्टडी के मुताबिक, जो लोग होल-फैट डेयरी प्रोडक्ट्स खाते हैं, उन्हें हार्ट डिजीज का रिस्क कम होता है। लेकिन क्या डेयरी प्रोडक्ट्स उतने ही हेल्दी होते हैं, जितना दावा किया जाता है? आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि- एक्सपर्टः डॉ. अमृता मिश्रा, सीनियर डाइटीशियन, दिल्ली सवाल- डेयरी प्रोडक्ट्स क्या होते हैं? जवाब- डेयरी प्रोडक्ट्स वे सभी फूड आइटम्स हैं, जो जानवरों के दूध से बनाए जाते हैं। पोषण के लिहाज से डेयरी प्रोडक्ट्स प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन D और B12 के अच्छे सोर्स हैं। सवाल- डेयरी प्रोडक्ट्स में कौन–कौन सी चीजें आती हैं? जवाब- डेयरी सिर्फ दूध तक सीमित नहीं है। इसमें वे सभी प्रोडक्ट्स शामिल होते हैं, जो दूध से अलग-अलग प्रक्रियाओं के जरिए तैयार किए जाते हैं। यानी दूध को जमाकर, मथकर, फाड़कर या प्रोसेस करके जो भी प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं, वे सभी डेयरी की कैटेगरी में आते हैं। ग्राफिक से समझते हैं- सवाल- क्या डेयरी प्रोडक्ट्स सेहत के लिए अच्छे होते हैं? जवाब- डेयरी प्रोडक्ट्स को अक्सर ‘कम्प्लीट न्यूट्रिशन’ का हिस्सा माना जाता है। इनमें मौजूद प्रोटीन, कैल्शियम और जरूरी विटामिन्स बॉडी की वर्किंग को सपोर्ट करते हैं। ग्राफिक से समझते हैं कि डेयरी प्रोडक्ट्स से सेहत को कौन-कौन से फायदे मिलते हैं। सवाल– क्या सभी डेयरी प्रोडक्ट्स खाने के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं? जवाब- नहीं, सभी डेयरी प्रोडक्ट्स सभी के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते। दूध– दूध छोटे बच्चों के लिए बेस्ट और कंप्लीट मील है, लेकिन अमूमन वयस्कों को इसकी जरूरत नहीं होती। दही, छाछ– ये सुपाच्य और हेल्दी होता है। सभी के लिए अच्छा है, सिर्फ उन्हें छोड़कर जो लैक्टोज इन्टॉलरेंट हैं। चीज, पनीर– अगर ये अल्ट्राप्रोसेस्ड नहीं है तो तीन साल से बड़ी उम्र के सभी लोगों के लिए हेल्दी है। नोट– सामान्य तौर पर पाश्चराइज्ड और सही तरीके से स्टोर किए गए डेयरी प्रोडक्ट्स सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन कच्चा (अनपाश्चराइज्ड) दूध बैक्टीरियल संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है। सवाल- उम्र के हिसाब से कौन से डेयरी प्रोडक्ट का सेवन बेस्ट होता है? जवाब- डेयरी प्रोडक्ट का चयन उम्र, पाचन क्षमता और पोषण की जरूरतों पर निर्भर करता है। शिशु (0–12 महीने) नवजात शिशु के लिए केवल मां का दूध बेहतर है। 6 महीने बाद खाने के साथ थोड़ा दही दिया जा सकता है। टॉडलर्स (1–3 साल) टॉडलर्स के लिए गाय का दूध बेहतर होता है। साथ ही इन्हेें फुल-फैट दही और चीज भी दिया जा सकता है। छोटे बच्चे (4–8 साल) 4 साल की उम्र के बाद बच्चे के लिए फुल-फैट दूध शुरू किया जा सकता है। दूध, दही और पनीर/चीज हड्डियों की मजबूती के लिए फायदेमंद होते हैं। किशोर (9–18 साल) इस उम्र में शरीर तेजी से बढ़ता है। इसलिए कैल्शियम और प्रोटीन की जरूरत ज्यादा होती है। फुल-फैट दूध, दही और चीज अच्छे विकल्प हैं। वयस्क (19–59 साल) वयस्कों के लिए फुल-फैट दूध और दही बेहतर माने जाते हैं। ग्रीक योगर्ट और पनीर भी अच्छे विकल्प हैं। वरिष्ठ नागरिक (60+ साल) इस उम्र में हल्का और पचने में आसान डेयरी प्रोडक्ट जैसे दही और पनीर लेना फायदेमंद है। सवाल- डेयरी प्रोडक्ट (दूध, दही,पनीर, घी) की न्यूट्रिशनल वैल्यू क्या है? जवाब- डेयरी प्रोडक्ट्स कई जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनकी न्यूट्रिशनल वैल्यू मात्रा व प्रकार पर निर्भर करती है। ग्राफिक से अलग-अलग डेयरी प्रोडक्ट्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू के बारे में समझते हैं- गट हेल्थ के लिए हेल्दी दही 100 ग्राम सादी दही में 3.5 ग्राम प्रोटीन, 3.3 ग्राम फैट और 4.7 ग्राम नेचुरल शुगर मौजूद होता है। यह फर्मेंटेड होता है, इस वजह से गट हेल्थ के लिए भी अच्छा होता है। पाचन तंत्र मजबूत करता है घी सिर्फ एक चम्मच घी में लगभग 130 कैलोरी और 15 ग्राम फैट होता है। घी में मौजूद ब्यूटिरिक एसिड आंतों की सेहत को सपोर्ट करता है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करता है। मसल बिल्डिंग के लिए मददगार पनीर पनीर प्रोटीन से भरपूर होता है। यह खासकर मसल बिल्डिंग और लंबे समय तक पेट भरा रखने के लिए जाना जाता है। सवाल- क्या डेयरी प्रोडक्ट्स के कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते हैं? जवाब- हां, डेयरी प्रोडक्ट्स के कुछ संभावित साइड इफेक्ट हो सकते हैं, लेकिन ये हर किसी को नहीं होते। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति कितनी मात्रा में खा रहा है और उसके शरीर की सहने की क्षमता कैसी है। पॉइंटर्स से समझते हैं- सवाल- रोज कितनी मात्रा में डेयरी प्रोडक्ट लेना सही है? जवाब- हेल्दी पर्सन के लिए रोजाना 2 से 3 सर्विंग डेयरी प्रोडक्ट लेना सेफ है। इससे शरीर को आवश्यक कैल्शियम और प्रोटीन मिल जाता है। सवाल- क्या डेयरी प्रोडक्ट्स पचने में भारी होते हैं? जवाब- यह व्यक्ति की पाचन क्षमता पर निर्भर करता है। हर किसी का डाइजेशन अलग होता है। सामान्य तौर पर दही और छाछ जैसे फर्मेंटेड डेयरी प्रोडक्ट्स आसानी से पच जाते हैं। वहीं फुल-फैट दूध, क्रीम या ज्यादा फैट वाले प्रोडक्ट कुछ लोगों को भारी लग सकते हैं। सवाल- किन लोगों को डेयरी प्रोडक्ट लेते समय सावधानी बरतनी चाहिए? जवाब- पॉइंटर्स से समझते हैं कि किन लोगों को सावधान रहना चाहिए- ये लोग लो-फैट या लैक्टोज-फ्री विकल्प चुन सकते हैं। किन लोगों को डेयरी प्रोडक्ट्स नहीं खाने चाहिए, ग्राफिक में देखिए- सवाल- अगर किसी को लैक्टोज इन्टॉलरेंस है तो उसके लिए डेयरी प्रोडक्ट का अल्टरनेटिव क्या हो सकता है? जवाब- ऐसे लोग लैक्टोज-फ्री दूध का विकल्प चुन सकते हैं। इसके अलावा उनके लिए ये प्लांट-बेस्ड विकल्प विकल्प हो सकते हैं– कैल्शियम और विटामिन B12 की जरूरत पूरी करने के लिए फोर्टिफाइड (पोषक तत्वों से भरपूर) विकल्प चुनना बेहतर होता है। ………………………………………… जरूरत की ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- एलोवेरा जूस के 11 हेल्थ बेनिफिट्स:डॉक्टर से जानें किन्हें नहीं पीना चाहिए, खरीदते हुए बरतें ये जरूरी सावधानियां हम बचपन से एलोवेरा के हेल्थ बेनिफिट्स के बारे में सुनते आए हैं। स्किन में निखार लाने से लेकर पाचन तंत्र को बेहतर बनाने तक, इसके कई फायदे बताए जाते हैं। यही वजह है कि लोग इसका खूब इस्तेमाल करते हैं। आयुर्वेद और मेडिकल साइंस दोनों ही इसे एक बेहद उपयोगी औषधीय पौधा मानते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
पेरेंटिंग- बेटी अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें करती है:उसकी ये समझदारी अच्छी है या चिंता की बात, मुझे क्या करना चाहिए?
सवाल- मैं लखनऊ से हूं। मेरी 13 साल की बेटी काफी समझदार है। लेकिन कई बार वह ऐसी बातें करती है, जो उसकी उम्र के मुकाबले काफी ज्यादा मैच्योर होती हैं। कभी वह रिश्तों, जिम्मेदारियों या जिंदगी को लेकर ऐसी बात बोल देती है कि लगता है कि इतनी छोटी लड़की के दिमाग में ये बात कैसे आई। कभी उसकी समझदारी पर खुशी होती है तो कभी चिंता। मैं समझ नहीं पा रही कि यह समझदारी का संकेत है या कुछ और। कुछ समय से मैंने एक बात नोटिस की है कि अब वह जरूरत से ज्यादा जिम्मेदार, गंभीर और चुप रहने लगी है। क्या यह नॉर्मल डेवलपमेंट का हिस्सा है या इसके पीछे कोई अन्य कारण हो सकता है। बतौर पेरेंट मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- आपकी चिंता वाजिब है। अक्सर जब कोई बच्चा अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें करता है तो पेरेंट्स इसे ‘सयानापन’ मानकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन आप एक समझदार पेरेंट हैं, जो इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों को जानना चाहती हैं। सबसे पहले तो यह समझिए कि 13 साल की उम्र बहुत सेंसिटिव होती है। बच्चा 'किशोरावस्था' की दहलीज पर कदम रख रहा होता है। इस उम्र में बच्चे का ब्रेन बहुत तेजी से विकसित हो रहा होता है। खासकर वह हिस्सा, जो सोचने-समझने, सवाल करने और भविष्य के बारे में विचार करने से जुड़ा होता है। इसलिए इस उम्र में बच्चे हर विषय पर अपनी राय रखना चाहते हैं। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। हालांकि इसके पीछे के कारणों को आइडेंटिफाई करना जरूरी है। बच्चे उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें क्यों करते हैं कई बार ऐसा होता है कि जब बच्चे घर में अक्सर समझदारी और जिम्मेदारी भरी बातें सुनते हैं तो वे सोचते हैं कि उन्हें भी ‘समझदार’ बनना पड़ेगा। इसके अलावा आज की पीढ़ी सोशल मीडिया एक्सपोजर के कारण बहुत जल्दी रिलेशनशिप, जिंदगी, असफलता और तुलना से रूबरू हो जाती है। इससे उनकी बातें बड़ों जैसी लग सकती हैं, लेकिन वे अभी भी बच्चे ही होते हैं। कुछ बच्चे स्वभाव से ही बहुत गहराई से सोचते हैं। वे दूसरों की भावनाएं जल्दी समझ लेते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर मैच्योर लगते हैं, लेकिन उन्हें सपोर्ट की जरूरत होती है। बच्चे के बिहेवियरल मैच्योरिटी के पीछे ऐसे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। बिहेवियरल मैच्योरिटी कब चिंताजनक? हर बच्चा अलग होता है। वह अपनी गति से मानसिक और भावनात्मक रूप से बड़ा होता है। कुछ बच्चों का व्यवहार उम्र से थोड़ा ज्यादा समझदार लग सकता है, जो पूरी तरह नॉर्मल है। लेकिन जब यह मैच्योरिटी बच्चे से उसका बचपन छीनने लगे या वह अपनी भावनाओं को दबाने लगे, तब यह चिंताजनक है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स नॉर्मल और चिंताजनक बिहेवियर के फर्क को समझें। इन संकेतों से आप समय रहते यह जान सकती हैं कि बच्ची की मैच्योरिटी स्वाभाविक है या किसी प्रेशर का नतीजा। इसके अनुसार कुछ जरूरी कदम उठा सकती हैं। ऐसी स्थिति में पेरेंट्स क्या करें? जब बच्चा अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर व्यवहार दिखाए तो घबराने के बजाय संतुलित रवैया अपनाएं। आपकी प्रतिक्रिया ही तय करती है कि बच्चा खुद को कैसे ढालेगा। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। मैच्योरिटी की तारीफ सोच-समझकर करें बच्चे की समझदारी को सराहें, लेकिन बार-बार ये न कहें कि “तुम तो बहुत समझदार हो।“ इससे बच्चे पर यह दबाव बन सकता है कि उसे हर हाल में मजबूत और समझदार ही बने रहना है। उसे बचपन जीने का मौका दें उसे यह महसूस कराएं कि बच्चा होना, गलती करना, परेशान होना और मदद मांगना बिल्कुल ठीक है। उससे कहें, “तुम बच्ची हो, तुम्हें इतना ज्यादा सीरियस होने की जरूरत नहीं है।” खुली बातचीत का माहौल बनाएं बातचीत के दौरान बच्चे को जज बिल्कुल न करें। ऐसे सवाल पूछें– “बेटा, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?“ “तुमने ये कहां सुना?“ “तुम ऐसा क्यों सोचती हो?“ उसकी बातों को बिना टोके और बिना जजमेंट के सुनें। उसे मौज-मस्ती और खेलने का स्पेस दें बच्चा अगर कभी थोड़ी शैतानी करे, मस्ती करे तो बिल्कुल भी टोकें नहीं। उसकी सराहना करें। खुद भी उसके साथ हंसें-खेलें, हल्की-फुल्की बातें करें, मस्ती-मजाक करें। उसे यह एहसास दिलाएं कि बड़ा बनने की कोई जल्दी नहीं है। बचपन जीना भी बेहद जरूरी है। कोशिश करें कि आप भी उसके साथ बच्चे बन जाएं। खुद भी कभी बचपना करें, छोटी–छोटी शैतानियों को साथ मिलकर इंजॉय करें। सोशल मीडिया एक्सपोजर पर नजर रखें इस बात पर नजर रखें कि वह सोशल मीडिया पर क्या देख रही है, किस तरह का कंटेंट उसकी सोच को प्रभावित कर रहा है। जरूरत हो तो स्क्रीन टाइम और कंटेंट को लेकर बातचीत करें। जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल मदद लें अगर बच्ची लगातार चुप रहे, इमोशनली बहुत भारी बातें करने लगे या खुद को ज्यादा दबाकर रखे तो काउंसलर या साइकोलॉजिस्ट से बात करने में बिल्कुल न हिचकें। पेरेंट्स न करें ये गलतियां कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो बच्चे पर प्रेशर बढ़ा देती हैं। अच्छे इरादों के बावजूद कुछ प्रतिक्रियाएं बच्चे को गंभीर या इंट्रोवर्ट बना सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स अपनी भूमिका को लेकर सतर्क रहें और कुछ कॉमन गलतियों से बचें। अंत में मैं यही कहूंगी कि आपकी चिंता बताती है कि आप एक सजग और संवेदनशील मां हैं। समझदारी अच्छी बात है, लेकिन बचपन की कीमत पर नहीं। 13 साल की उम्र में मैच्योर बातें करना कई बार सामान्य होता है। लेकिन अगर इसके साथ चुप्पी बढ़ रही हो, जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी का भाव आ रहा है या बिटिया अपनी भावनाएं दबाने लगी है, तो इसे नजरअंदाज न करें। आपका काम उसे जल्दी बड़ा बनाना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित महसूस कराना है। उसे यह भरोसा दिलाएं, “कोई जिम्मेदारी तुम्हें अकेले नहीं उठानी है। हम तुम्हारे साथ हैं।” ………………… पेरेंटिंग से जुड़ी ये स्टोरी भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटी इंस्टा पर अकाउंट बनाना चाहती है: कहती है, 'सब दोस्तों का है, मेरा क्यों नहीं?' उसे ऑनलाइन दुनिया के खतरे कैसे समझाऊं आपका डर जायज है, लेकिन सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी लगाना ठीक नहीं है। इससे बच्चों की जिज्ञासा बढ़ जाती है और वे इसे चोरी-छिपे इस्तेमाल करने लगते हैं। इसलिए 'पाबंदी' लगाने की बजाय आपको उसे सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में बताना चाहिए। साथ ही इसके खतरों के बारे में भी। पूरी खबर पढ़िए…
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