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एजीआई तेजी से बढ़ेगा, एआई भारतीय युवाओं के लिए बड़ा अवसर : गूगल डीपमाइंड सीईओ

नई दिल्ली, 18 फरवरी (आईएएनएस)। गूगल डीपमाइंड के सीईओ और को-फाउंडर डेमिस हसाबिस ने बुधवार को कहा कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (एजीआई) आने वाले पांच से आठ वर्षों में तेजी से बढ़ेगा और एआई इंडस्ट्री भारतीय युवाओं के लिए बड़े अवसर लेकर आ रहा है।

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में पैनल चर्चा के दौरान बोलते हुए, उन्होंने कहा कि बीते एक दशक में एआई में हुई प्रगति काफी शानदार है। यह समिट ऐसे समय पर हो रही है, जब दुनिया तेजी से ऑटोनॉमस सिस्टम की तरफ बढ़ रही है।

उन्होंने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म को काफी जरूरी बताया, जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक साथ लाते हैं।

उन्होंने एआई विकास के वर्तमान चरण को महत्वपूर्ण मोड़ बताया।

उनके अनुसार, दुनिया वैज्ञानिक खोजों के स्वर्ण युग में प्रवेश कर रही है, एआई एक बिल्कुल नए युग की शुरुआत है।

हस्साबिस ने कहा कि रीइन्फोर्समेंट लर्निंग इसलिए सफल रही है क्योंकि सीखना ही कुंजी है, प्रोग्रामिंग नहीं। उन्होंने बताया कि सिस्टम को सीधे डेटा से सीखने की अनुमति देना ही आधुनिक एआई को शक्तिशाली बनाता है।

गूगल डीपमाइंड के सीईओ के अनुसार, एआई में प्रगति कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल करने में मदद कर सकती है और मानव प्रगति के एक नए चरण की शुरुआत कर सकती है।

‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ में राष्ट्राध्यक्ष और सरकारी अधिकारी, मंत्री, वैश्विक प्रौद्योगिकी नेता, बड़े शोधकर्ता, बहुपक्षीय संस्थान और उद्योग जगत के हितधारक एक साथ मिलकर समावेशी विकास को बढ़ावा देने, सार्वजनिक प्रणालियों को मजबूत करने और सतत विकास को सक्षम बनाने में एआई की भूमिका पर विचार-विमर्श करेंगे। यह शिखर सम्मेलन वैश्विक दक्षिण में इस विषय पर आयोजित होने वाला पहला ऐसा वैश्विक सम्मेलन है।

पांच दिवसीय शिखर सम्मेलन में 100 से अधिक सरकारी प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं, जिनमें 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख तथा 60 मंत्री शामिल हैं। इसके अलावा, सीईओ, संस्थापक, शिक्षाविद और शोधकर्ता सहित 500 से अधिक वैश्विक एआई नेता भी इसमें शामिल होंगे।

--आईएएनएस

एबीएस/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट बनेगा भारत का 'नया हांगकांग' या पर्यावरण का कब्रिस्तान? NGT की हरी झंडी के बाद उठ रहे सवाल

Great Nicobar Project: भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार परियोजना को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से हाल ही में मंजूरी मिल गई है. जिससे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के इस द्वीप को ग्लोबल व्यापारिक केंद्र में बदलने का मार्ग साफ हो गया है. 

इस परियोजना को 'भारत का हांगकांग' करार दिया जा रहा है, क्योंकि यह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और व्यापार के लिए रणनीतिक हब बन सकता है. हालांकि, पर्यावरणविदों और स्थानीय जनजातियों के विरोध के बीच यह फैसला विवादों को भी हवा दे रहा है. आइए ये मामला क्या है आसान भाषा में आपको समझाते हैं.


क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट

यह परियोजना जिसका आधिकारिक नाम 'ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास' है, करीब 92 हजार करोड़ रुपये की लागत से बनाई जा रही है. इसका मुख्य उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी छोर पर एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, सैन्य और नागरिक उपयोग वाला हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र, नया शहर और पर्यटन सुविधाएं विकसित करना है. 

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से क्या होगा फायदा

सरकार का दावा है कि इससे भारत विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करेगा और सालाना अरबों रुपये की बचत होगी, क्योंकि वर्तमान में भारत का ज्यादातर ट्रांसशिपमेंट कार्गो सिंगापुर या कोलंबो जैसे विदेशी हब से गुजरता है. यहां व्यापार, पर्यटन और रक्षा सुविधाओं का मिश्रण होगा. यह परियोजना 30 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से पूरी होगी. एक रिपोर्ट के अनुसार अनुमान है कि इससे द्वीप की आबादी 6.5 लाख तक पहुंच सकती है, जो वर्तमान में मात्र 8 हजार के आसपास है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की हांगकांग से तुलना क्यों 

विशेषज्ञों के मुताबिक ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे हांगकांग या सिंगापुर जैसा मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने के लिए आदर्श बनाती है. यह द्वीप इंडियन ओशन रीजन में प्रमुख शिपिंग मार्गों के करीब है, जो चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति का सामना करने में भारत की मदद कर सकता है. यही वजह है कि लोग इसे 'नई दिल्ली का हांगकांग जैसा प्रोजेक्ट' बता रहे हैं. 

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का क्यों हो रहा है विरोध

आलोचक इसे पर्यावरणीय आपदा करार दे रहे हैं. परियोजना से लगभग 9.64 लाख पेड़ कटेंगे, जो यूनेस्को द्वारा घोषित बायोस्फियर रिजर्व को प्रभावित करेगा. बताया जा रहा है कि इससे शॉम्पेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदायों को बाहरी संपर्क से बीमारियों का खतरा है, जो उनके अस्तित्व को संकट में डाल सकता है. वहीं, द्वीप के भूकंप संवेदनशील क्षेत्र होने से इसके डूबने का भी जोखिम है.

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