रिलेशनशिप एडवाइज- शादी-बच्चे की जिम्मेदारियों में फंस गई हूं:मुझे पर्सनल स्पेस चाहिए, लेकिन हसबैंड समझते नहीं, क्या मैं गलत हूं?
सवाल- मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं। 2 साल का बच्चा है। बीते कुछ दिनों से मेरे भीतर अजीब सा अलगाव पैदा हो रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे मैंने पिछले कुछ सालों में अपने लिए कुछ किया ही नहीं है। अब मुझे अकेले रहना ज्यादा अच्छा लगता है। जब मैं ये बात हसबैंड से शेयर करती हूं तो उन्हें लगता है कि मैं उनसे दूर जाना चाहती हूं। वो मुझे समझ ही नहीं पा रहे हैं। मुझे डर है कि कहीं हमारी केमिस्ट्री न खराब हो जाए। क्या रिश्ते में स्पेस मांगना गलत है? मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा जवाब- मैं अपने जवाब की शुुरुआत एक फिल्म से करना चाहूंगी। एक जॉर्जियन फिल्म है, “माय हैप्पी फैमिली।” इसमें एक शादीशुदा, भरे–पूरे परिवार वाली महिला आपकी ही तरह पर्सनल स्पेस चाहती है। थोड़ा अकेले रहना, थोड़ा अपने साथ वक्त बिताना, थोड़ा खुद से बातें करना। सोचिए, हिंदुस्तान से लेकर जॉर्जिया तक औरतें ये करना चाहती हैं। लेकिन बहुत कम में यह हिम्मत होती है कि वो आपकी तरह सवाल लिखकर अपने दिल की बात कहें। आपका सवाल ही बता रहा है कि आप एक संजीदा इंसान हैं। आप खुद को जानने-समझने की यात्रा तय करना चाहती हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भारतीय समाज की मुश्किलें मुश्किल ये है कि हमारे समाज ने खुद के बारे में सोचने को स्वार्थ से जोड़ दिया है। महिलाओं के लिए तो ये और भी मुश्किल है। अगर कोई महिला कहती है कि उसे अकेले रहना अच्छा लगता है या उसे थोड़ा स्पेस चाहिए तो उस पर तुरंत सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। क्या रिश्ता ठीक नहीं है? क्या शादी में प्यार कम हो गया है? क्या पति से दूर जाना चाहती हो? जबकि सच्चाई यह है कि खुद के लिए समय मांगना, खुद को समझना, खुद के साथ रहना, ये सब रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं, उसे बचाने के लिए की गई कोशिशें हैं। शादी का मतलब ‘सेल्फ’ का मर जाना नहीं हमारे समाज और संस्कृति में शादी की बुनियादी परिभाषा ही गलत है। हमें लगता है कि शादी होने का मतलब है, अब महिला की अपनी कोई निजता नहीं रह गई है। उसकी पहचान ही यही है कि वो पत्नी है, मां है, बहू है। लेकिन वो एक इंसान नहीं है, जो आजादी और एजेंसी चाह सकती है। शादी और उसमें भी खासतौर पर छोटे बच्चों की जिम्मेदारी बहुत डिमांडिंग जॉब है। अमूमन औरतों को उतनी मदद नहीं मिलती, जिसकी उन्हें जरूरत है। इन और ऐसे ही तमाम कारणों से अक्सर शादी में दूरियां आ जाती हैं। खुद को जानना है जरूरी इस दुनिया में हर इंसान का अपना अस्तित्व होता है। यहां पर अस्तित्व यानी “मैं कौन हूं, मुझे क्या अच्छा लगता है, मुझे किस चीज से खुशी मिलती है।” यह जानना इसलिए जरूरी है, क्योंकि दुनिया का हर रिश्ता इसके बाद ही आता है। भले ही वह रिश्ता पति-पत्नी का हो, माता-पिता का हो या मां-बच्चे का। अगर कोई इंसान अंदर से खुश नहीं है, संतुष्ट नहीं है, तो वह रिश्तों में भी खुशी नहीं बांट सकता है। स्पेस मांगने में गिल्ट क्यों? अपने लिए स्पेस मांगते हुए बिल्कुल भी संकोच या गिल्ट नहीं फील करना चाहिए। यह अकेलेपन की मांग नहीं, खुद के लिए स्पेस की चाहत है। रिश्ते में स्पेस मांगने का मतलब यह नहीं है कि आप अपने पति से दूर जाना चाहती हैं। इसका मतलब यह है कि आप खुद के करीब आना चाहती हैं। यह फर्क समझना बहुत जरूरी है। पर्सनल स्पेस में इंसान अपने इमोशंस को बेहतर ढंग से प्रोसेस करना सीखता है। वह खुशी और दुख को पहचानकर उनसे डील करना सीखता है। नकारात्मकता और एंग्जाइटी से निपटना सीखता है। इसका सकारात्मक असर उसके सभी रिश्तों पर पड़ता है। पर्सनल स्पेस के फायदे ग्राफिक में देखिए- कंपैशन और जिम्मेदारी से कहें अपनी बात बहुत मुमकिन है कि जब आप अपने हसबैंड से ये बात शेयर करेंगी तो उन्हें लगे कि आप उनसे दूर जाना चाहती हैं। यह उनकी गलतफहमी हो सकती है, लेकिन उनकी अपनी भावनाएं भी जायज हैं। इसलिए ऐसे मामले में बातचीत बहुत सोच-समझकर करनी चाहिए। ऐसी बातें भावनाओं में बहकर नहीं, समझदारी और थोड़ी डिप्लोमेसी के साथ करनी चाहिए। डिप्लोमेसी का मतलब चालाकी से नहीं, बल्कि सही भाषा से है। हसबैंड से पूछें ये सवाल जब वह इन सवालों का जवाब देंगे तो उन्हें धीरे-धीरे समझ आएगा कि जैसे उन्हें अपने तरीके से रिचार्ज होने का हक है, वैसे ही आपको भी हक है। यह तुलना नहीं, जरूरी उदाहरण है। असली समस्या न भूलें बात करते हुए यह न भूलें कि असल समस्या क्या है। उन्हें यह समझाने की कोशिश करें कि अगर आप खुद को नहीं संभालेंगी तो आगे चलकर इसका असर रिश्ते पर पड़ सकता है। बताएं कि आपको इसी बात का डर है। यहां ये समझना भी जरूरी है कि जब आप स्पेस मांगेंगी तो सामने वाला इंसान असहज हो सकता है। कुछ लोग इसे समझते हैं, जबकि कुछ लोग इसे अपने इगो पर ले लेते हैं। यह भी संभव है कि आपके पति साइलेंट ट्रीटमेंट देने लगें, आपसे बात करना कम कर दें, इंटिमेसी से दूरी बनाने लगें। आपको यह जताने लगें कि जैसे उन्हें आपकी जरूरत ही नहीं है। मानसिक रूप से तैयार रहें पति के इस तरह के रिएक्शंस उनकी अपनी असुरक्षा के कारण हो सकते हैं। उन्हें यह डर हो सकता है कि उनका आप पर कोई कंट्रोल नहीं रहेगा। इसलिए जरूरी है कि आप मानसिक रूप से तैयार रहें कि शुरुआत में सब कुछ स्मूद नहीं होगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि आप गलत हैं। यहां आपको इमोशनल नहीं, लॉजिकल रहना पड़ेगा। अगर वो आपसे कहें कि तुम ऐसा करोगी तो घर में सबकुछ बिगड़ जाएगा तो आप पूछ सकती हैं, कैसे बिगड़ेगा? उनके सवालों के हल बताएं भावनात्मक समस्याओं का समाधान रोना-धोना नहीं, बल्कि ठोस और एक्शन-ओरिएंटेड प्लान होता है। आप कुछ ऐसा प्लान कर सकती हैं, जिससे बच्चे की बेहतर देखरेख हो सके। जैसे उसके लिए नैनी रख सकती हैं या बच्चे की दादी-नानी को घर बुला सकती हैं। अगर वह कहें कि “तुम्हारे इस फैसले से बच्चे की देखरेख पर असर पड़ेगा” तो आप बता सकती हैं कि “जब मैं खुश रहूंगी तो बच्चा भी ज्यादा सुरक्षित महसूस करेगा।” आपका डर जायज है आपको लग रहा है कि कहीं आपके और आपके पति के बीच की केमिस्ट्री खराब न हो जाए। लेकिन आपको ये भी समझना होगा कि अगर आप खुद ही अंदर से परेशान, थकी हुई रहेंगी या घुटन महसूस करेंगी तो इसके नाकारात्मक असर होंगे। इसका असर सिर्फ इस रिश्ते पर ही नहीं, बल्कि आपकी जिंदगी के हर काम पर पड़ेगा। इसलिए सबसे जरूरी है कि आप पहले खुद के साथ अपने रिश्ते को समझें, उसे समय दें और मजबूत बनाएं…। खुद के लिए स्पेस जरूरी अब बात करते हैं कि पर्सनल स्पेस का मतलब क्या है। स्पेस का मतलब घर छोड़कर जाना नहीं है। यह छोटी-छोटी चीजों से शुरू होता है। जैसे सुबह अकेले कॉफी पीना, किताब पढ़ना, वॉक पर जाना या कोई हॉबी शुरू करना। बच्चे के साथ रहते हुए भी आप खुद के लिए समय निकाल सकती हैं। जब बच्चा सोता है, तो आप योग करें या म्यूजिक सुनें। पति से मदद मांगें, कभी वह बच्चे को संभालें, आप बाहर घूमकर आएं। इस बीच खुद का ख्याल रखें इस तरह की मुश्किल से गुजरते हुए खुद का ख्याल रखना बहुत जरूरी है। इस फेज में आप थकान महसूस कर सकती हैं। इसलिए सेल्फ-केयर रूटीन बनाएं। हेल्दी खाना खाएं, नींद पूरी करें, दोस्तों से बात करें। अगर जरूरत लगे तो काउंसलर से कंसल्ट करें। हर अनुभव कुछ सिखाता है जीवन में हर अनुभव कुछ-न-कुछ सिखाता है। आपको इस अलगाव से यह सीख मिलेगी कि तमाम जिम्मेदारियों के बीच खुद को कभी नहीं भूलना चाहिए। खुद को खोजकर ये सीख मिलेगी कि रिश्ते में स्पेस मांगना गलत नहीं, जरूरी है। आप गलत नहीं हैं। आप खुद को पहचानने की कोशिश कर रही हैं। यह अपने आप में ही बेहद खूबसूरत बात है। ……………… ये खबर भी पढ़िए रिलेशनशिप एडवाइज- बॉयफ्रेंड रखता है हर चीज का हिसाब:प्यार में किसने ज्यादा किया, किसने कम, मोहब्बत स्कोरकार्ड बन गई है, मैं क्या करूं आपके सवाल पूछने के तरीके से लगता है कि आप एक समझदार इंसान हैं, जो रिश्ता बचाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन खुद को भी दर्द नहीं देना चाहतीं। ये अच्छी बात है। चलिए, धीरे-धीरे समझते हैं कि आपके रिश्ते में क्या हो रहा है और ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिए। आगे पढ़िए…
जरूरत की खबर- लगाओ ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’- सुप्रीम कोर्ट:पैकेट पर लिखा होगा, “फूड हेल्दी या अनहेल्दी” जानें ये क्यों जरूरी
हम अक्सर चिप्स, कुकीज या नमकीन का पैकेट खरीदते हैं और खा लेते हैं। बहुत कम लोग पैकेट को पलटकर उसके पीछे देखते हैं कि जो फूड वो खा रहे हैं, उसकी न्यूट्रिशनल वैल्यू क्या है। उसमें कितना शुगर, नमक या फैट है। पैकेट पर लिखी ये इंफॉर्मेशन ही बताती है कि फूड कितना हेल्दी है या कितना अनहेल्दी। लेकिन अगर यह जानकारी पैकेट के फ्रंट पर रंगों और ग्राफिक्स के साथ आसान तरीके से लिखी हो तो एक ही नजर में बहुत आसानी से ये जानकारी हमें मिल जाएगी। हमारे लिए हेल्दी फूड का चुनाव भी आसान हो जाएगा। इसे ‘फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग’ कहते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) और केंद्र सरकार को एक जरूरी निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पैकेज्ड फूड पर “फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल” लगाने पर विचार किया जाए। यह लेबल पैकेट के सामने ही जरूरी जानकारी दिखाएगा ताकि कंज्यूमर खरीदने से पहले ही जान सकें कि उसमें कितना शुगर, नमक और फैट है। इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. नरेंद्र कुमार सिंगला, प्रिंसिपल कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्या है? जवाब- फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) वह लेबल है, जो किसी फूड प्रोडक्ट के पैकेट के आगे के हिस्से में लिखा रहता है। इसमें खाने के मेन इंग्रीडिएंट्स जैसे शुगर, नमक और फैट की जानकारी को आसान और जल्दी समझ आने वाले तरीके से दिखाया जाता है। इसका मकसद ये है कि ग्राहक तुरंत समझ सके कि वो जो फूड खरीद रहा है, वह स्वास्थ्य के लिए कितना सही है। ये जानकारी पैकेट के बैक पर लिखे लंबे‑चौड़े न्यूट्रिशनल फैक्ट्स से अलग होती है। इसमें सिर्फ जरूरी जानकारी को सरल ग्राफिक्स या रंगों के जरिए दिखाया जाता है। सवाल- मौजूदा पैकेज्ड फूड पर फूड से जुड़ी न्यूट्रिशनल जानकारी कहां लिखी होती है? जवाब- यह आमतौर पर पैकेज्ड फूड के पीछे या किनारे पर एक टेबल के फॉर्म में लिखी होती है। यह जानकारी प्रोडक्ट के 100 ग्राम, 100 मिलीलीटर या हर सर्विंग में मौजूद न्यूट्रिशनल वैल्यू जैसे- कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर और सोडियम की मात्रा बताती है। सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से क्या पता चलता है? जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग से पता चलता है कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। उसमें कितनी कैलोरी, शुगर, नमक और फैट है और क्या वह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें– सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्यों जरूरी है? जवाब- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ इसलिए जरूरी है ताकि लोग पैकेज्ड फूड खरीदते समय जल्दी और स्पष्ट रूप से उसके हेल्थ इम्पैक्ट को समझ सकें। इससे उनके लिए हेल्दी ऑप्शन्स चुनना आसान हो जाएगा और अनहेल्दी फूड के अधिक सेवन को रोका जा सकेगा। सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से हमें क्या फायदा होगा? जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग का मकसद न्यूट्रिशन की जटिल जानकारी को सरल बनाना है, ताकि ग्राहक खरीदते समय ही बेहतर फैसला ले सकें और अनहेल्दी विकल्पों से बच सकें। नीचे दिए ग्राफिक से इसके फायदे समझिए- सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से लोगों की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जवाब- न्यूट्रिशनल वैल्यू पढ़कर लोग तय कर पाएंगे कि उनके लिए वो फूड कितना हेल्दी है। साथ ही इससे कई गंभीर बीमारियों का रिस्क कम हो सकेगा, जैसेकि मोटापा, डायबिटीज, हार्ट डिजीज। यह हेल्दी ईटिंग हैबिट्स को भी बढ़ावा देगा। नीचे दिए ग्राफिक से सेहत पर इसका प्रभाव समझिए- सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) को यह निर्देश क्यों दिया है कि वह हरेक पैकेज्ड खाद्य पदार्थ पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लगाने पर विचार करें? जवाब- देश में लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह अनहेल्दी खान-पान है। पैकेज्ड और अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड में मौजूद अधिक शुगर, नमक और फैट की मात्रा इन बीमारियों का बड़ा कारण बन रही है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से कहा है कि वह पैकेज्ड फूड पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लागू करने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि लोग खरीदते समय ही संभावित हेल्थ रिस्क समझ सकें। ग्राफिक से समझते हैं कि भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों की स्थिति कितनी गंभीर है- सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से ये पता लगाने में कैसे मदद मिलेगी कि कोई पैकेज्ड फूड कितना हेल्दी है? जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग फूड की हेल्थ ग्रेडिंग की तरह काम करती है। जैसे ‘हाई शुगर’ वाला लेबल आपको चेतावनी देता है कि यह फूड बार-बार खाने के लिए हेल्दी नहीं है। वहीं ‘लो फैट/लो सॉल्ट’ वाला संकेत हेल्दी विकल्प चुनने में मदद करता है। इस तरह ग्राहक को एक नजर में ही यह समझ आता है कि कोई पैकेज्ड फूड हेल्थ के लिए सुरक्षित, संतुलित या जोखिम भरा है। साथ ही कई देशों में ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ को तीन अलग रंगों से दिखाया जाता है। जिस फूड में सॉल्ट, शुगर फैट की मात्रा ज्यादा होती है, उस पर रेड लेबल होता है और जिसमें कम होती है, उस पर ग्रीन लेबल होता है। ऐसे में लोग बिना न्यूट्रिशन डिटेल्स पढ़े सिर्फ रंग देखकर यह जान सकते हैं कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। आंख मूंदकर वे ग्रीन लेबल वाले फूड खरीद सकते हैं या ये तय कर सकते हैं कि रेड लेबल वाले फूड महीने में एक–दो बार ही खाना है। सवाल- क्या यह लेबलिंग मोटापा, डायबिटीज और हाई BP जैसी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है? जवाब- लेबलिंग हमें सिर्फ जागरूक करने में मदद करती है। ये इस बात की गारंटी नहीं है कि अब गंभीर बीमारियां नहीं होंगी। लेबलिंग सिर्फ हमें यह बताएगी कि फूड अनहेल्दी है, लेकिन अगर फिर भी हम उसे खाते हैं तो हम बीमारियों का रिस्क बढ़ा रहे होंगे। ये जरूर कहा जा सकता है कि लोग जो भी फैसला करें, वह एक इंफॉर्म्ड फैसला होगा। सवाल- पैकेज्ड फूड में वो कौन से तत्व होते हैं, जो सेहत के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक हैं? जवाब- हर पैकेज्ड फूड हानिकारक नहीं होता, लेकिन कुछ तत्व ऐसे हैं, जिनका ज्यादा सेवन शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक से समझिए- सवाल- कितनी मात्रा में पैकेज्ड फूड लेना सेफ है? जवाब- पैकेज्ड फूड को सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए। महीने में एक बार या विशेष अवसरों पर ले सकते हैं। सवाल- पैकेज्ड फूड के हेल्दी ऑप्शन क्या हैं? जवाब- पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड के बजाय ऐसे विकल्प चुनना बेहतर है, जो कम प्रोसेस्ड, प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर हों। पॉइंटर्स से समझते हैं- ये ऑप्शन शरीर को जरूरी विटामिन, फाइबर और मिनरल देते हैं। साथ ही अतिरिक्त शुगर, सोडियम और ट्रांस फैट से बचाते हैं। ………………………… जरूरत की ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- 900 किलो मिलावटी सौंफ बरामद:आपकी सौंफ में मिलावट तो नहीं, 5 तरीकों से चेक करें, खरीदते हुए 8 बातें ध्यान रखें देश में हर दिन कहीं-न-कहीं से खाद्य पदार्थों में मिलावट की खबरें आती रहती हैं। बीते दिनों मध्य प्रदेश के इंदौर (सियागंज) में खाद्य सुरक्षा विभाग और जिला प्रशासन की टीम ने छापेमारी कर 900 किलो मिलावटी सौंफ जब्त की। पूरी खबर पढ़ें…
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