सिनेमा और समाज सेवा का अनूठा संगम थे नाना पाटेकर
भारतीय कला जगत ने 8 अक्टूबर 2026 को अपना एक ऐसा अनमोल रत्न खो दिया जिसकी भरपाई करना शायद आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। प्रख्यात अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में अचानक हृदय गति रुकने से निधन हो गया। यह दुखद समाचार दावानल की तरह पूरे देश में फैल गया और हर कोई स्तब्ध रह गया। नाना केवल एक साधारण अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी बुलंद आवाज थे जो पर्दे पर आम इंसान की पीड़ा, उसके क्रोध और उसकी लाचारी को बेहद जीवंत रूप में प्रस्तुत करते थे। उनका जाना केवल कला जगत की ही क्षति नहीं है, बल्कि समाज के उस शोषित और वंचित वर्ग की भी बहुत बड़ी क्षति है, जिसके लिए वे हमेशा एक मसीहा बनकर खड़े रहे। उनके निधन से कला, संस्कृति और समाज सेवा के क्षेत्र में जो गहरा सन्नाटा पसरा है, उसे शब्दों में बांधना बेहद कठिन है।
नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता था। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना किया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। एक समय ऐसा भी था जब वे सड़कों पर पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए सफेद पट्टियां रंगने का काम करते थे और उसी से अपनी आजीविका चलाते थे। यह उनके जीवट और अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। इस कठोर संघर्ष ने उन्हें जीवन की उन गहराइयों से परिचित कराया, जो बाद में उनके अभिनय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं। उनके भीतर का कलाकार इसी भट्टी में तपकर कुंदन बना था। नाटकों और रंगमंच के प्रति उनका आकर्षण उन्हें धीरे-धीरे अभिनय की दुनिया की ओर ले गया, जहां उन्होंने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई।
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रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना पाटेकर ने जब रूपहले पर्दे पर कदम रखा, तो उन्होंने नायक की उस पारंपरिक छवि को पूरी तरह से तोड़ दिया जो उस समय तक सिनेमा में स्थापित थी। उनकी आंखें बोलती थीं और उनकी आवाज में वह कशिश थी जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखती थी। उनका संवाद अदायगी का तरीका इतना स्वाभाविक और तेज होता था कि सामने बैठा दर्शक खुद को उस दृश्य का हिस्सा समझने लगता था। उन्होंने क्रांतिवीर, परिंदा, तिरंगा, खामोशी, प्रहार और नटसम्राट जैसी तमाम बेहतरीन रचनाओं में अपने अभिनय का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वह अभिनय की पाठशाला में हमेशा एक मानक के रूप में पढ़ाया जाएगा। चाहे वह एक भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने वाला आम नागरिक हो, एक सख्त सैन्य अधिकारी हो या फिर एक गूंगे बहरे दंपति का संवेदनशील पिता, हर भूमिका में उन्होंने अपने प्राण फूंक दिए। उनके द्वारा बोले गए संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं और वे मात्र संवाद न होकर समाज की कुरीतियों पर एक गहरा कटाक्ष प्रतीत होते हैं।
नाना पाटेकर की एक और बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा मराठी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। उन्होंने जितनी सफलता हिंदी सिनेमा में प्राप्त की, उतनी ही ऊंचाई उन्होंने मराठी सिनेमा और रंगमंच में भी हासिल की। उनकी वाणी में एक विशेष प्रकार का ओज था। जब वे अपने संवाद बोलते थे, तो शब्दों के आरोह और अवरोह पर उनका नियंत्रण अद्भुत होता था। उन्होंने कभी भी किसी विदेशी भाषा या पाश्चात्य संस्कृति को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे और अपनी भारतीय संस्कृति पर हमेशा गर्व करते रहे। उनकी वेशभूषा, उनके विचार और उनका रहन सहन सब कुछ पूरी तरह से भारतीय था। चकाचौंध के इस दौर में भी उन्होंने अपनी भारतीयता को कभी नहीं छोड़ा।
अभिनय की दुनिया में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बावजूद नाना पाटेकर ने कभी दिखावे की दुनिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा एक बेहद सादा और संयमित जीवन व्यतीत किया। जब अन्य कलाकार विलासिता पूर्ण जीवन जी रहे थे, तब नाना अपने गांव में खेती कर रहे थे और एक साधारण इंसान की तरह जीवन बिता रहे थे। उनका यही गुण उन्हें अन्य सभी कलाकारों से अलग और श्रेष्ठ बनाता था। वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और उन्होंने कभी अपने अतीत को नहीं भुलाया। यह उनकी महानता ही थी कि उन्होंने अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज की भलाई के लिए दान कर दिया।
विशेषकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं ने उनके हृदय को गहरे तक झकझोर दिया था। किसानों की पीड़ा को उन्होंने अपना दर्द समझा और उनकी सहायता के लिए एक संस्था का निर्माण किया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने हजारों अनाथ बच्चों, विधवाओं और कर्ज में डूबे किसानों के परिवारों को आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उनके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया। उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें जनता के बीच एक भगवान के समान दर्जा दिला दिया था। लोग उन्हें केवल एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि अपने परिवार के एक बड़े बुजुर्ग के रूप में देखते थे जो संकट के समय हमेशा उनके साथ खड़ा रहता था।
वर्तमान समय में जहां युवा पीढ़ी बहुत जल्दी मानसिक तनाव का शिकार हो जाती है, नाना पाटेकर का जीवन उनके लिए एक खुला मार्गदर्शन है। उनका जीवन सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प है, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। उन्होंने बिना किसी बाहरी सहारे के अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया, जो लाखों लोगों के लिए केवल एक सपना होता है। उनकी यात्रा शून्य से शिखर तक की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है।
8 अक्टूबर 2026 की वह मनहूस सुबह भारतीय कला जगत के लिए एक काला अध्याय लेकर आई। वे गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर थे, जब सुबह के समय उन्हें अचानक गंभीर हृदयघात हुआ। परिजनों द्वारा उन्हें तुरंत समीप के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। वहां मौजूद चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक उनके हृदय को पुनः सक्रिय करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह समाचार जैसे ही बाहर आया, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जो आंखें उनकी कला को देखकर चमक उठती थीं, वे आंसुओं से नम थीं।
चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान और वाहन के माध्यम से महाराष्ट्र के पुणे लाया गया। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव डोंजे में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। हर कोई अपने चहेते नायक के अंतिम दर्शन करना चाहता था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने स्वयं वहां पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया, जो इस बात का प्रतीक था कि उनका कद राजनीति और कला की सीमाओं से कहीं बहुत ऊपर था।
उनके अंतिम सफर में उनके पुराने मित्र, सहकर्मी और हजारों की संख्या में आम लोग शामिल हुए। हर आंख नम थी और हर दिल भारी था। नाना पाटेकर का जाना एक युग का अंत है। उन्होंने अपने अभिनय और अपने कर्मों से जो लकीर खींची है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। उनका भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कला, उनके विचार और मानवता के लिए किए गए उनके निस्वार्थ कार्य उन्हें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रखेंगे। रूपहले पर्दे का वह शेर आज हमेशा के लिए शांत हो गया है, लेकिन उसकी दहाड़ भारतीय सिनेमा और समाज की चेतना में हमेशा गूंजती रहेगी।
- महेन्द्र तिवारी
Congress और CJP के प्रदर्शनों के चलते Delhi में व्यापार ठप, त्योहारों के मौके पर बिक्री बढ़ने की जगह बाजार सूने पड़े
दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात पर लग रही पाबंदियों का असर अब केवल आम यात्रियों तक सीमित नहीं रह गया है। राजधानी के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही घटने, कारोबार प्रभावित होने और दूसरे शहरों से खरीदारी के लिए आने वाले व्यापारियों की संख्या कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नवरात्रि से दिवाली तक का समय खुदरा कारोबार, थोक खरीदारी, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स, आभूषणों, सजावटी सामान और शादी-ब्याह की खरीदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है।
दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के ताजा दावों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में बाजारों की कारोबारी गतिविधियां लगभग 70 प्रतिशत तक गिर गई हैं। यह स्थिति बताती है कि सड़कों पर लगने वाली पाबंदियों और मेट्रो सेवाओं में व्यवधान का आर्थिक असर कितना व्यापक हो सकता है।
हम आपको बता दें कि 8 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेस और विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान राजघाट और कनॉट प्लेस के आसपास यातायात बाधित हुआ। इसके चलते, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने के रास्ते बंद होने और ट्रैफिक प्रतिबंधों के कारण 5,000 से अधिक यात्री अपनी ट्रेनें नहीं पकड़ सके। साथ ही इस घटना का सीधा संबंध व्यापारिक नुकसान से भी है। दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाले कारोबारी अक्सर ट्रेन से पहुंचते हैं। उन्हें स्टेशन से थोक बाजारों तक जाना होता है, माल खरीदना होता है और फिर निर्धारित समय में वापसी करनी होती है। जब स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए, तो उनकी यात्रा, खरीदारी और माल की ढुलाई तीनों प्रभावित होती हैं।
कांग्रेस के प्रदर्शन के ठीक बाद अब 10 अक्टूबर को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है। देखा जाये तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन जब बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन, मेट्रो स्टेशन के प्रवेश-द्वारों पर प्रतिबंध और वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम व्यावसायिक इलाकों को प्रभावित करते हैं, तो उनका आर्थिक असर भी होता है।
विशेष चिंता यह है कि नई दिल्ली, कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के बाजारों में ग्राहक पहुंचने से कतराने लगते हैं। ग्राहक यह सोचकर खरीदारी टाल देते हैं कि बाजार पहुंचना और वहां से लौटना मुश्किल होगा। यहां नुकसान केवल उस दिन की बिक्री का नहीं है। दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों की उपस्थिति, माल की डिलीवरी, थोक खरीदारों की यात्राएं, रेस्तरां की बिक्री और पार्किंग पर निर्भर कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
देखा जाये तो दिल्ली के व्यापारियों की चिंता का सबसे बड़ा कारण समय है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होने वाले हैं। इसके बाद रामलीला, दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह का सीजन कारोबार को गति देते हैं। इस दौरान कपड़े, साड़ियां, रेडीमेड गारमेंट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, सजावट के सामान, पूजा सामग्री, आभूषण और उपहारों की मांग बढ़ती है। दिल्ली के बाजार केवल राजधानी के स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं। देश के अनेक शहरों और कस्बों से छोटे व्यापारी थोक खरीदारी करने आते हैं। वे दिल्ली से माल खरीदकर अपने इलाकों में बेचते हैं। इस तरह दिल्ली के थोक बाजारों की गतिविधियां दूसरे राज्यों के खुदरा कारोबार से भी जुड़ी हैं। दूसरी तरफ, खुदरा खरीदारी करने वाले परिवार भी त्योहारों के लिए कपड़े, उपहार, घरेलू सामान और दूसरी जरूरतें खरीदने बाजार पहुंचते हैं। दुकानदार इसी समय के लिए पहले से स्टॉक जुटाते हैं, कर्मचारियों की व्यवस्था करते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए छूट तथा विशेष सेल चलाते हैं।
ऐसे में यदि बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल दुकान में पड़ा रह सकता है। व्यापारी को किराया, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, परिवहन और स्टॉक पर लगी पूंजी की लागत फिर भी चुकानी पड़ती है। यहां सवाल उठता है कि प्रदर्शनों के चलते आखिर व्यापारियों को कितना नुकसान हुआ और कितना हो सकता है? इस सवाल का सबसे महत्वपूर्ण आधार चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) का 9 अक्टूबर को सामने आया आकलन है। संगठन ने अपने सर्वे के हवाले से कहा है कि पिछले तीन दिनों में दिल्ली के बाजारों की कारोबारी गतिविधियों में करीब 70 प्रतिशत गिरावट आई है। CTI के अनुसार, दिल्ली से बाहर से खरीदारी के लिए आने वाले ग्राहकों की संख्या सामान्य अनुमानित 2 से 3 लाख प्रतिदिन से घटकर करीब 40,000 से 50,000 रह गई। स्थानीय बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी 50 प्रतिशत से अधिक कम होने का दावा किया गया है।
हम आपको यह भी बता दें कि CTI ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में नवरात्रि से दिवाली तक प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें नियंत्रित करने की मांग की है। संगठन ने बड़े जमावड़ों के लिए मध्य दिल्ली से बाहर कोई स्थायी प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है, जिसमें बुराड़ी या रामलीला मैदान जैसे स्थानों का उल्लेख है।
बहरहाल, त्योहारों के इस अहम कारोबारी मौसम में दिल्ली के बाजारों को बार-बार ठप होने से बचाना केवल व्यापारियों का मुद्दा नहीं है। यह रोजगार, छोटे कारोबार, थोक-खुदरा आपूर्ति और उपभोक्ताओं की सुविधा से जुड़ा सवाल है। प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है कि राजनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा प्रबंधों की कीमत आम नागरिकों और कारोबारियों को अपनी रोजी-रोटी गंवाकर न चुकानी पड़े।
-नीरज कुमार दुबे
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