Congress और CJP के प्रदर्शनों के चलते Delhi में व्यापार ठप, त्योहारों के मौके पर बिक्री बढ़ने की जगह बाजार सूने पड़े
दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात पर लग रही पाबंदियों का असर अब केवल आम यात्रियों तक सीमित नहीं रह गया है। राजधानी के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही घटने, कारोबार प्रभावित होने और दूसरे शहरों से खरीदारी के लिए आने वाले व्यापारियों की संख्या कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नवरात्रि से दिवाली तक का समय खुदरा कारोबार, थोक खरीदारी, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स, आभूषणों, सजावटी सामान और शादी-ब्याह की खरीदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है।
दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के ताजा दावों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में बाजारों की कारोबारी गतिविधियां लगभग 70 प्रतिशत तक गिर गई हैं। यह स्थिति बताती है कि सड़कों पर लगने वाली पाबंदियों और मेट्रो सेवाओं में व्यवधान का आर्थिक असर कितना व्यापक हो सकता है।
हम आपको बता दें कि 8 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेस और विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान राजघाट और कनॉट प्लेस के आसपास यातायात बाधित हुआ। इसके चलते, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने के रास्ते बंद होने और ट्रैफिक प्रतिबंधों के कारण 5,000 से अधिक यात्री अपनी ट्रेनें नहीं पकड़ सके। साथ ही इस घटना का सीधा संबंध व्यापारिक नुकसान से भी है। दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाले कारोबारी अक्सर ट्रेन से पहुंचते हैं। उन्हें स्टेशन से थोक बाजारों तक जाना होता है, माल खरीदना होता है और फिर निर्धारित समय में वापसी करनी होती है। जब स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए, तो उनकी यात्रा, खरीदारी और माल की ढुलाई तीनों प्रभावित होती हैं।
कांग्रेस के प्रदर्शन के ठीक बाद अब 10 अक्टूबर को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है। देखा जाये तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन जब बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन, मेट्रो स्टेशन के प्रवेश-द्वारों पर प्रतिबंध और वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम व्यावसायिक इलाकों को प्रभावित करते हैं, तो उनका आर्थिक असर भी होता है।
विशेष चिंता यह है कि नई दिल्ली, कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के बाजारों में ग्राहक पहुंचने से कतराने लगते हैं। ग्राहक यह सोचकर खरीदारी टाल देते हैं कि बाजार पहुंचना और वहां से लौटना मुश्किल होगा। यहां नुकसान केवल उस दिन की बिक्री का नहीं है। दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों की उपस्थिति, माल की डिलीवरी, थोक खरीदारों की यात्राएं, रेस्तरां की बिक्री और पार्किंग पर निर्भर कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
देखा जाये तो दिल्ली के व्यापारियों की चिंता का सबसे बड़ा कारण समय है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होने वाले हैं। इसके बाद रामलीला, दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह का सीजन कारोबार को गति देते हैं। इस दौरान कपड़े, साड़ियां, रेडीमेड गारमेंट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, सजावट के सामान, पूजा सामग्री, आभूषण और उपहारों की मांग बढ़ती है। दिल्ली के बाजार केवल राजधानी के स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं। देश के अनेक शहरों और कस्बों से छोटे व्यापारी थोक खरीदारी करने आते हैं। वे दिल्ली से माल खरीदकर अपने इलाकों में बेचते हैं। इस तरह दिल्ली के थोक बाजारों की गतिविधियां दूसरे राज्यों के खुदरा कारोबार से भी जुड़ी हैं। दूसरी तरफ, खुदरा खरीदारी करने वाले परिवार भी त्योहारों के लिए कपड़े, उपहार, घरेलू सामान और दूसरी जरूरतें खरीदने बाजार पहुंचते हैं। दुकानदार इसी समय के लिए पहले से स्टॉक जुटाते हैं, कर्मचारियों की व्यवस्था करते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए छूट तथा विशेष सेल चलाते हैं।
ऐसे में यदि बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल दुकान में पड़ा रह सकता है। व्यापारी को किराया, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, परिवहन और स्टॉक पर लगी पूंजी की लागत फिर भी चुकानी पड़ती है। यहां सवाल उठता है कि प्रदर्शनों के चलते आखिर व्यापारियों को कितना नुकसान हुआ और कितना हो सकता है? इस सवाल का सबसे महत्वपूर्ण आधार चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) का 9 अक्टूबर को सामने आया आकलन है। संगठन ने अपने सर्वे के हवाले से कहा है कि पिछले तीन दिनों में दिल्ली के बाजारों की कारोबारी गतिविधियों में करीब 70 प्रतिशत गिरावट आई है। CTI के अनुसार, दिल्ली से बाहर से खरीदारी के लिए आने वाले ग्राहकों की संख्या सामान्य अनुमानित 2 से 3 लाख प्रतिदिन से घटकर करीब 40,000 से 50,000 रह गई। स्थानीय बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी 50 प्रतिशत से अधिक कम होने का दावा किया गया है।
हम आपको यह भी बता दें कि CTI ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में नवरात्रि से दिवाली तक प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें नियंत्रित करने की मांग की है। संगठन ने बड़े जमावड़ों के लिए मध्य दिल्ली से बाहर कोई स्थायी प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है, जिसमें बुराड़ी या रामलीला मैदान जैसे स्थानों का उल्लेख है।
बहरहाल, त्योहारों के इस अहम कारोबारी मौसम में दिल्ली के बाजारों को बार-बार ठप होने से बचाना केवल व्यापारियों का मुद्दा नहीं है। यह रोजगार, छोटे कारोबार, थोक-खुदरा आपूर्ति और उपभोक्ताओं की सुविधा से जुड़ा सवाल है। प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है कि राजनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा प्रबंधों की कीमत आम नागरिकों और कारोबारियों को अपनी रोजी-रोटी गंवाकर न चुकानी पड़े।
-नीरज कुमार दुबे
भरोसे पर भी खरे उतरे सेलिब्रिटिज
विज्ञापनों के प्रति सेलिब्रिटिज की जवाबदेही को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हालिया टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज का उपयोग सबसे अधिक किया जाता रहा है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि लक्षित उपभोक्ता तक पहुंचने में सेलिब्रिटिज की भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लोग सेलिब्रिटिज पर विष्वास करते हैं और विज्ञापनदाता कंपनियां इसी का लाभ अपने उत्पादों को बाजार दिलाने में करते आये हैं। इसीलिए राष्ट्र्पति द्रौपदी मुर्मु की टिप्पणी कि सच्चा सितारा रोशनी फैलाता है, अंधेरापन नहीं, आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने के साथ ही सितारों और सेलिब्रिटिज को समाज के प्रति जवाबदेही समझने का संकेत भी है। दर असल हो रहा है कि पैसे की चकाचोंध में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति जवाबदेही से मुहं मोड़ते दिखाई देते हैं। जब आम जन का सेलेब्रिटिज का भरोसा है तो सेलिब्रिटिज की भी इस भरोसे को बनाए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है। दरअसल सेलिब्रिटिज को उत्पाद के साथ देखकर आमआदमी आंख मींच कर भरोसे के सहारे खरीदारी करता है। वह उस उत्पाद और सेलिब्रिटिज द्वारा किये जा रहे वादे को सत्य समझता है। ऐसे में सेलिब्रिटी का समाज या लक्षित वर्ग के प्रति और अधिक जिम्मेदारी बन जाती है। विकेता या निर्माता अपने उत्पाद को बेचने पर ध्यान देता है। इसलिए वह अपने उत्पाद के गुणगान अधिक ही करने लगता है तो सेलिब्रिटी के विज्ञापन के सहारे अतिशयोक्तिपूर्ण दावें करने लग जाते हैं। यहां तक कि कई विज्ञापन के दावें तो सत्य के आसपास भी नहीं होते जैसा कि अक्षय कुमार का डॉबर च्यवनप्राश को लेकर विज्ञापन। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज तो सेरोगेट विज्ञापनों का दौर भी चल निकला है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्राप का इलायची का विज्ञापन सबके सामने है जिसके माध्यम से छद्म रुप से प्रतिबंधित पान मसाला का विज्ञापन किया जा रहा था। इसी तरह के अनेक विज्ञापन हमारे सामने हैं। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता अपने उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए सेलिब्रिटिज को बहुत अधिक पेमेंट किया जाता है और इस पेमेंट के चक्कर में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति अपने दायित्व और कानूनी प्रावधानों को भी दरकिनार कर देते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुखती रग पर हाथ रखते हुए 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिछले माह सितंबर में आयोजित समारोह में आमआदमी का दर्द सामने रखा।
विवादित विज्ञापनों का दौर लंबे समय से चला आता रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज, महिलाओं और बच्चों को केन्द्र में रखा जाता है। दरअसल लक्ष्यित वर्ग को सम्मोहित करना इन विज्ञापनों का खास उद्देश्य हो जाता है। विज्ञापन करते समय कई बार तो सांप्रदायिकता तक सामने आ जाती है। 2020 का तनिष्क का विज्ञापन इसका उदाहरण है तो 2026 का कृति सेनन का गीवा ज्वेलरी का विज्ञापन सामने हैं। विमल इलायची का फिल्म कलाकर त्रय का विज्ञापन सर्वविदित है जिसमें इलायची के नाम पर छद्म रुप से पान मसाला तंबाकू का ही विज्ञापन था। इस तरह के सेरेगेट विज्ञापन आम होते जा रहे हैं। लेविस 501 जिंस का अक्षय कुमार का विज्ञापन, 2021 का आलिया भट्ट का कन्यादान के बहाने कन्यामान विज्ञापन यह फिर 1995 में अजगर से जिस्म को लपेटे मिलिंद सोयन और मधु सप्रे का टफ जूते का विज्ञापन का विवाद आज तक चर्चा में है। 2026 का विक्की कौशल-रश्मिका संधाना का माचो अंडरवियर का विज्ञापन भी विवादों में रहा है।
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विज्ञापनों को लेकर सरकार भी गंभीर रही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 द्वारा जवाबदेही तय की गई है। 10 लाख से 50 लाख तक के जुर्माने के प्रावधान के साथ ही ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर एक साल से तीन साल तक प्रतिबंध के प्रावधान भी है। भ्रामक विज्ञापनों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी गंभीर रहा है और समय समय पर टिप्पणियां की गई है। इस दायरें में चार लाख से अधिक कमाई वाले व 5 लाख फालोवर्स वाले सेलिब्रिटिज को रखा गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझना होगा कि फिल्म कलाकारों के समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस तरह का संदेश देना पड़ा। वैसे भी जिस पर भरोसा होता है या किया जाता है तो भरोसे वाले व्यक्ति पर भी भरोसे को बनाये रखने का दायित्व हो जाता है। विज्ञापननिर्माताओं को भी समाज के प्रति दायित्व को समझना होगा तभी सभी अपने भरोसे पर खरे उतर सकते हैं।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
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