15 फरवरी 2026 को जब समूचा भारत महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाएगा, तब यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होगा, बल्कि आत्मजागरण का विराट अवसर होगा। महाशिवरात्रि वह रात्रि है जब साधक अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर शिवत्व के प्रकाश से उसे आलोकित करने का संकल्प लेता है। शिव केवल देवता नहीं, वे चेतना के शाश्वत आयाम हैं-महाकाल, जो समय से परे हैं, नटराज, जो सृष्टि की लय और ताल के अधिपति हैं और नीलकंठ, जो विष को पीकर भी अमृत का संदेश देते हैं। आज का युग विज्ञान, तकनीक और उपभोग का युग है। मानव ने अंतरिक्ष को नापा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित की, लेकिन अपने भीतर की शांति खो बैठा। तनाव, अवसाद, असंतोष, युद्ध, आतंकवाद और नैतिक विघटन की घटनाएँ विश्व को विचलित कर रही हैं। ऐसे दौर में शिव की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। शिव भक्ति कोई चमत्कारिक जादू नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग है।
शिव का स्वरूप द्वंद्वों से परे है। वे संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो जड़, जर्जर और अनैतिक है, उसका विनाश आवश्यक है ताकि नवजीवन अंकुरित हो सके। जब हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह का संहार करते हैं, तभी सच्चा निर्माण संभव होता है। यही शिव का वास्तविक चमत्कार है भीतर के विष का रूपांतरण। समुद्र-मंथन की कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मानवीय जीवन का प्रतीक है। जब संसार अमृत की खोज में लगा, तब सबसे पहले विष निकला। आज भी जब मानव प्रगति की दौड़ में है, तो साथ में प्रदूषण, हिंसा और असंतुलन का विष भी उत्पन्न हो रहा है। उस विष को कौन पियेगा? शिव का नीलकंठ रूप हमें सिखाता है कि समाज के संकट को दूर करने के लिए त्याग और सहनशीलता आवश्यक है। जब हम अपने स्तर पर कटुता को निगल लेते हैं और उसे बाहर नहीं फैलाते, तभी समाज में शांति बनी रहती है। इसी प्रकार गंगा के अवतरण की कथा बताती है कि अनियंत्रित शक्ति विनाशकारी हो सकती है। शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण कर संतुलित प्रवाह दिया। आज के संदर्भ में यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। तकनीक, धन, सत्ता-ये सभी शक्तियाँ हैं। यदि वे अनियंत्रित हों तो विध्वंसक बनती हैं, और यदि शिव-संयम में हों तो कल्याणकारी। अतः शिव भक्ति का अर्थ है-शक्ति का संतुलन।
आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है-तनाव। प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं और असुरक्षा ने उसे अशांत बना दिया है। शिवरात्रि की रात्रि जागरण की रात्रि है, लेकिन यह बाह्य जागरण से अधिक आंतरिक जागरण है। जब साधक “ऊँ नमः शिवाय” का जप करता है, तो वह अपने भीतर के कंपन को संतुलित करता है। यह पंचाक्षरी मंत्र मन, प्राण और चेतना को एकाग्र करता है। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि नियमित ध्यान और मंत्रजाप से तनाव कम होता है, रक्तचाप संतुलित होता है और मानसिक स्थिरता बढ़ती है। यह शिव साधना का प्रत्यक्ष प्रभाव है। शिव पुराण में वर्णित है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की निशीथ बेला में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ। यह ज्योति केवल पत्थर की आकृति नहीं, बल्कि अनंत प्रकाश का प्रतीक है। शिवलिंग का अर्थ है-चिह्न, जो निराकार ब्रह्म का संकेत देता है। आधुनिक मनुष्य के लिए यह बोध आवश्यक है कि ईश्वर किसी सीमित रूप में बंधा नहीं है। वह ऊर्जा है, चेतना है, जो प्रत्येक कण में विद्यमान है।
आज विश्व युद्ध और आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहा है। हिंसा की ज्वाला में मानवता झुलस रही है। शिव का तांडव केवल विनाश नहीं, बल्कि संतुलन का नृत्य है। जब अन्याय बढ़ता है, तब परिवर्तन अनिवार्य होता है। किंतु शिव का संदेश यह भी है कि क्रोध नहीं, करुणा से परिवर्तन संभव है। वे रुद्र हैं-दुःखों का हरण करने वाले। शिव भक्ति का चमत्कार यह है कि वह मनुष्य के भीतर करुणा, सहिष्णुता और क्षमा का विकास करती है। जब व्यक्ति बदलता है, तब समाज बदलता है और जब समाज बदलता है, तब विश्व में शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। शिव और शक्ति का मिलन भी आधुनिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा, विचार और क्रिया का समन्वय है। आज परिवारों में विघटन, संबंधों में दूरी और जीवन में असंतुलन इसलिए है क्योंकि यह समरसता टूट रही है। शिवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि संतुलन ही जीवन का आधार है। व्रत और उपवास का आध्यात्मिक महत्व भी आज समझने योग्य है। उपवास केवल भोजन त्याग नहीं, बल्कि इंद्रियों का संयम है। यह आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति एक दिन के लिए भी भोगों से दूर रहता है, तो उसे अपनी आवश्यकताओं का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है। उपभोक्तावादी संस्कृति में यह अत्यंत आवश्यक साधना है।
शिव भक्ति का सिद्ध प्रभाव उन असंख्य भक्तों के अनुभवों में दिखाई देता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी आस्था नहीं छोड़ी। सच्चे मन से की गई प्रार्थना व्यक्ति को आंतरिक शक्ति देती है। यह शक्ति उसे संकटों से जूझने का साहस देती है। चमत्कार बाहर नहीं, भीतर घटित होता है-जब निराशा आशा में बदलती है, भय विश्वास में और अशांति शांति में। आज आवश्यकता है कि शिव को केवल मंदिरों तक सीमित न रखा जाए। वे काठ, पत्थर या मूर्ति में नहीं, बल्कि भाव में निवास करते हैं। जब हम सत्य बोलते हैं, करुणा का व्यवहार करते हैं, प्रकृति की रक्षा करते हैं, तब हम शिव की आराधना करते हैं। पर्यावरण संरक्षण भी शिव भक्ति है, क्योंकि वे कैलाशवासी योगी हैं, प्रकृति के संरक्षक हैं। जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी के संतुलन की रक्षा करना ही शिव के प्रति सच्ची श्रद्धा है।
महाशिवरात्रि 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम अपने भीतर के विष को पहचानें और उसे शिवचेतना में रूपांतरित करें। हम अपने जीवन में संयम, संतुलन और साधना को स्थान दें। हम क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और अशांति के स्थान पर ध्यान को अपनाएं। शिवत्व की प्राप्ति कोई दूर की वस्तु नहीं। यह हमारे भीतर ही सुप्त है। आवश्यकता केवल जागरण की है। जब मनुष्य स्वयं को जीत लेता है, तभी वह सच्चे अर्थों में विजयी होता है। यही आत्मयुद्ध है, यही शिव की साधना है। इस महाशिवरात्रि पर हम सब मिलकर यह प्रार्थना करें-
“हे नीलकंठ! हमारे भीतर के विष को शांत करो।
हे महाकाल! हमें समय का सदुपयोग सिखाओ।
हे शंकर! हमारे जीवन में कल्याण का संचार करो।”
जब यह प्रार्थना सच्चे मन से होगी, तब निश्चित ही उसका प्रतिफल मिलेगा। क्योंकि शिव भाव के भूखे हैं। जहाँ निष्कपट श्रद्धा है, वहाँ शिव की कृपा अवश्य बरसती है। आधुनिक युग की जटिलताओं के बीच शिव भक्ति ही वह सेतु है, जो मनुष्य को स्वयं से, समाज को शांति से और विश्व को अमन से जोड़ सकती है। यही महाशिवरात्रि का सच्चा संदेश है-अंधकार से प्रकाश की ओर, अशांति से शांति की ओर, मृत्यु से अमृतत्व की ओर।
- ललित गर्ग
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आज महा शिवरात्रि है, यह भगवान भोलेनाथ की अराधना का सबसे बड़ा दिन होता है, इस दिन देवों के देव महादेव की उपासना की जाती है। यह शिव और पार्वती के मिलन का प्रतीक है और प्रभु की पूजा से भक्त सभी प्रकार के भय से मुक्त होते हैं तो आइए हम आपको महा शिवरात्रि व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें महा शिवरात्रि के बारे में
हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पावन पर्व महत्वपूर्ण माना जाता है। यह त्योहार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है, इसलिए इस तिथि पर पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि पर की गई शिव उपासना से साधक का भाग्योदय होता है और मन से सभी तरह का डर भय भी दूर होते हैं। महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर दान का भी विशेष महत्व माना गया है और इसके प्रभाव से पापों का नाश और दुर्भाग्य दूर होता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बना हुआ है, यह सबसे शुभ और सफलता का प्रतीक है। इस समय किए गए दान-पुण्य का फल साधक को अवश्य मिलता है। महा शिवरात्रि पर्व पर ये बात लागू नहीं होती क्योंकि इस पर्व में रात्रि की पूजा का महत्व होता है। ऐसे में जिस दिन शिवरात्रि की चतुर्दशी तिथि रात के समय मौजूद होती है उसी दिन शिवरात्रि पर्व मनाना ज्यादा उचित माना जाता है।
महा शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त
हिन्दू पंचांग के अनुसार महा शिवरात्रि की पावन तिथि 15 फरवरी 2026 की शाम 05:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 बजे तक रहेगी। चूंकि 15 फरवरी 2026 की रात में चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी इसलिए महा शिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी 2026, रविवार को मनाया जाएगा।
महा शिवरात्रि पर इस मुहूर्त में करें पूजा, होगा लाभ
महा शिवरात्रि की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त 15 फरवरी 2026 की देर रात 12 बजकर 9 मिनट से रात 1 बजकर 1 मिनट तक रहेगा। ये निशिता काल है जो शिवरात्रि पूजन के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। इसके अलावा कई लोग रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा करते हैं।
महा शिवरात्रि पूजा में शामिल करें ये सामग्री
पंडितों के अनुसार महा शिवरात्रि की पूजा में बेलपत्र, अक्षत, गाय का दूध, पान के पत्ते, सुपारी, जनेऊ, चावल, शक्कर, सफेद बूरा, शहद, इलाइची, लौंग, गंगाजल, मदार के फूल, धतूरा, भांग, सफेद फूल, पांच प्रकार के मौसमी फल, फूल, माला, शमी के पत्ते, केसर, इत्र, सफेद चंदन, गन्ने का रस, मिठाई या चूरमा का भोग अवश्य शामिल करें।
महाशिवरात्रि पर ऐसे करें पूजा, होंगे लाभन्वित
शास्त्रों के अनुसार महा शिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लें। पूजा के लिए एक चौकी की स्थापना करें और उस पर पीला या लाल रंग का साफ कपड़ा बिछाएं। फिर इस चौकी पर थोड़े चावल रखें और भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करें। एक मिट्टी या तांबे का कलश लेकर उस पर स्वास्तिक बनाएं और उसमें थोड़ा गंगाजल और शुद्ध जल मिला लें। साथ ही इसमें सुपारी, सिक्का और हल्दी की गांठ डालें। शिव जी के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाएं और साथ ही एक छोटा शिवलिंग स्थापित करें। अगर घर में शिवलिंग नहीं है तो मिट्टी से इसे तैयार कर लें। शिवलिंग का जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करें। मन ही मन ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप करते रहें। इसके बाद शिवलिंग को साफ कपड़े से पोंछकर उस पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के फूल और फल-फूल आदि चढ़ाएं। फिर महा शिवरात्री की कथा पढ़ें और कपूर से भगवान शिव की आरती करें। इसके बाद मिठाई, खीर और फल का भोग लगाएं। पूजा संपन्न होने के बाद सभी में प्रसाद बांट दें।
महाशिवरात्रि के दिन इन चीजों का करें दान
शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि पर सफेद वस्तुओं का दान करना बेहद शुभ होता है। इससे मन को शांति मिलती है। साथ ही महादेव प्रसन्न होते हैं। इस दिन आप काले तिल का दान कर सकते हैं। यह सभी तरह के ग्रह दोषों को शांत करता है। काली दाल का दान करने से शनि और राहु से जुड़े दोष दूर होते हैं। वस्त्र दान सदैव श्रेष्ठ कर्म माना गया है। इसके प्रभाव से जीवन में शांति और संतोष बढ़ता है। आप महाशिवरात्रि के दिन घी और गुड़ का दान भी कर सकते हैं। इससे भाग्योदय होता है। इस दिन पर सुहागिन महिलाओं को श्रृंगार सामग्री का दान करना पुण्यदायी होता है। चावल का दान करने से घर में अन्न-धन बढ़ता है।
महाशिवरात्रि के दिन ये करें, शिव जी होंगे प्रसन्न
पंडितों के अनुसार व्रत रखने वालों को त्रयोदशी तिथि से ही नियमों का ख्याल रखना चाहिए। इस दिन केवल सात्विक भोजन करना चाहिए। और अगले दिन सुबह स्नानादि करके व्रत का संकल्प अवश्य करना चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा का विशेष महत्व होता है। ऐसे में व्रती को इस दिन चार पहर की पूजा अवश्य करनी चाहिए। साथ ही शिव जी के मंत्रों का जाप भी करें। व्रती को रात्रि के समय शिवजी की विशेष पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस दिन निशीथ काल तक भगवान शिव के भजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि का व्रत फलाहार करके रखना चाहिए। साथ ही, इस दिन शिवजी का अभिषेक भी अवश्य करें और उन्हें बेलपत्र, धतूरा आदि अर्पित करें। महिलाओं को शिवरात्रि के दिन माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करनी चाहिए। ऐसा करने से दांपत्य जीवन सुखद बना रहता है। महाशिवरात्रि व्रत के दिन शाम के समय सात्विक भोजन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए साधारण नमक की बजाए सेंधा नमक का प्रयोग करना चाहिए।
महाशिवरात्रि व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास
अग्निपुराण समेत कई शास्त्रों में महाशिवरात्रि व्रत कथा का उल्लेख है। कथा अनुसार, चिरकाल में निषादों के राजा सुंदरसेन ने अनजाने में फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान शिव की पूजा की। इस समय उनका अभिषेक किया और रात्रि जागरण कर शिव शक्ति की साधना की। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से निषादों के राजा सुंदरसेन को मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई। साथ ही यमलोक में उन्हें उच्च स्थान मिला। इस व्रत को करने से व्यक्ति विशेष को यम यातना से भी मुक्ति मिलती है।
महाशिवरात्रि व्रत पर ऐसे करें पारण
पंडितों के अनुसार रविवार 15 फरवरी को व्रत रख अपनी सुविधा अनुसार समय पर शिव शक्ति की पूजा करें। वहीं, महाशिवरात्रि व्रत का पारण 16 फरवरी को सुबह 06 बजकर 53 मिनट से लेकर दोपहर 03 बजकर 16 मिनट के मध्य कर सकते हैं। इस समय स्नान-ध्यान के बाद विधिवत शिव-शक्ति की पूजा करें। वहीं, पूजा के बाद अन्न-धन का दान कर पारण करें।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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