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आरबीआई ने बढ़ाई सख्ती : ब्रोकर फंडिंग के लिए अब 100% कोलेटरल अनिवार्य, प्रोप ट्रेडिंग के लिए बैंक फंडिंग पर रोक

मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने Commercial Banks–Credit Facilities Amendment Directions-2026 जारी करते हुए बैंकों द्वारा स्टॉक ब्रोकरों और अन्य पूंजी बाजार मध्यस्थों को दिए जाने वाले ऋण संबंधी नियमों में संशोधन किया है। ये संशोधित प्रावधान 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।  इस संशोधन के तहत सबसे अहम बदलाव यह है कि अब ब्रोकर्स को केवल 100% सुरक्षित (फुली सिक्योर्ड) फंडिंग की ही अनुमति होगी। आरबीआई का नया ढ़ांचा पूंजी बाजार तंत्र में फंडिंग संरचना, कोलेटरल मानदंडों और एक्सपोजर नियमों में बड़े बदलाव लेकर आया है। यह कदम स्टॉक ब्रोकर्स के कार्य करने के तरीके, उनकी लागत संरचना और पूंजी प्रबंधन पर सीधा प्रभाव डालने वाला है।
असुरक्षित फंडिंग स्वीकार नहीं की जाएगी
भविष्य में कोई आंशिक असुरक्षित फंडिंग स्वीकार नहीं की जाएगी, सिवाय इंट्रा-डे सेटलमेंट टाइमिंग सुविधा जैसे कुछ सीमित अपवादों के। पहले 100 रुपए की बैंक गारंटी में 50 रुपये फिक्स्ड डिपॉजिट से सुरक्षित किए जा सकते थे और शेष 50 रुपये व्यक्तिगत या कॉरपोरेट गारंटी जैसे असुरक्षित साधनों से समर्थित होते थे। आरबीआई के संशोधित नियम इस लचीलेपन को समाप्त करते हैं, जिससे ब्रोकर्स को पूरी राशि के बराबर ठोस सुरक्षा देनी होगी। 

बैंक गारंटी के नियम भी सख्त किए गए
स्टॉक एक्सचेंज या क्लियरिंग कॉरपोरेशन के पक्ष में जारी बैंक गारंटी के लिए भी नियम सख्त किए गए हैं। अब कम से कम 50% कोलेटरल अनिवार्य होगा, जिसमें से न्यूनतम 25% नकद होना चाहिए। इसके अलावा, यदि इक्विटी शेयरों को कोलेटरल के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो उन पर कम से कम 40% का हेयरकट लगाया जाएगा। नए नियमों में शेयरों के बाजार मूल्य का केवल 60% ही कोलेटरल मूल्य के रूप में गिना जाएगा। 

प्रोप ट्रेडिंग के प्रारूप में बड़ा बदलाव
प्रॉप्राइटरी ट्रेडिंग (प्रोप ट्रेडिंग) के मामले में भी बड़ा बदलाव किया गया है। अब बैंक ब्रोकर्स को उनकी स्वयं की ट्रेडिंग गतिविधियों के लिए फंडिंग उपलब्ध नहीं करा सकेंगे। केवल मार्केट मेकिंग और कुछ विशेष डेट वेयरहाउसिंग गतिविधियों को ही अपवाद के रूप में अनुमति दी जाएगी। साथ ही, अब सभी प्रकार के एक्सपोजर को पूंजी बाजार एक्सपोजर के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। 

ब्रोकर्स के लिए बढ़ेगा परिचालन दबाव 
इसका मतलब है कि बैंकों की कुल पूंजी बाजार एक्सपोजर सीमा इन फंडिंग पर भी लागू होगी, जिससे बैंकों की ऋण देने की क्षमता और रुचि प्रभावित हो सकती है। नए ढांचे में निरंतर कोलेटरल मॉनिटरिंग और मार्जिन कॉल की व्यवस्था भी अनिवार्य की गई है। ब्रोकर्स को हर समय पर्याप्त कोलेटरल कवर बनाए रखना होगा और किसी भी कमी की स्थिति में मार्जिन कॉल की स्पष्ट शर्तें समझौतों में शामिल करनी होंगी। इस बदलाव से वित्तीय प्रणाली में सुरक्षा बढ़ेगी, लेकिन ब्रोकर्स के लिए पूंजी की लागत बढ़ने और परिचालन दबाव बढ़ने की संभावना है। 

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